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सफ़र 'जिंदगी के पतंग से परिंदा हो जाने की कहानी'

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

सफ़र

ज़िंदगी के पतंग से परिंदा हो जाने की कहानी

"नई बाऊ जी मैं हजे विआह नई करवाऊणा, मैनू हजे पढ़ण देओ। मैं प्रोफैसर बनना आ।"

अंजान चेहरों पर लगी अंजान सी ज़ुबानों से निकलने वाली अंजान आवाज़ों के बीच निम्मी के दिमाग में बार बार यही शब्द घूम रहे थे। वो बार बार ठंड से लाल पड़ चुके अपने हाथों को अपनी टोपी के ऊपर से कानों पर दबा रही थी। मगर ये उन ज़ुबानों की आवाज़ नहीं थी जो कान बंद करने से दब जाती। ये उसकी यादों की आवाज़ थी जो चिल्लाती हैं शोर मचाती हैं और अपने सिवा किसी की नहीं सुनतीं ।

यादों की गति कितनी तेज़ होती है ना, आपको एक क्षण में कहाँ से कहाँ ला पटकती है। इन्हें परवाह नहीं होती कि आप इनके साथ सफ़र करने की हालत में हैं या नहीं, ये तो बस अपने आप ही गति में आ जाती हैं। परदेस के उस अंजान शहर में पार्क की एक बैंच पर बैठी निम्मी के साथ भी ये बदतमीज़ यादें यही कर रही थीं। निम्मी को नहीं जाना था वहाँ उन दिनों में वापिस, उसे बहुत कुछ सोचना था, आगे क्या करना है, अनसुलझी पहेली को सुलझाना था मगर ना यादें तो ज़िद्दी बच्चों की तरह हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि घर में शादी है या मातम उन्हें बस आपका हाथ पकड़ कर 'मेरे साथ खेलो' की ज़िद्द करनी होती है। ये यादों भी निम्मी की बाँह पकड़ कर ज़बरदस्ती उसे आठ महीने पहले पंजाब के उस गाँव पंडोरी राईयाँ में ले आईं थीं।

"ना पुत्तर ज़िद्द नई करते। मैने भला तेरी पहलां कोई बात टाली है? लेकिन बेटी ये रिश्ता बड़ा भागां वाला है। इंग्लैंड का रिश्ता आज अपने आप घर चल के आया है। इसे ना करना मतलब किस्मत को ठोकर मारणे जैसा है बेटी। उथे तू पढ़ेगी तो प्रोफेसर क्या डाॅक्टर भी पायलेट सब बन जाएगी।" स्वभाव से मजाकिया बापू जी यानी निम्मी के पिता जी सरदार हरदीप सिंह की आखरी बात ने हमेशा की तरह निम्मी को हँसने पर मजबूर कर दिया।

सरदार हरदीप सिंह वाटर सप्लाई विभाग में कार्यरत थे। पिछले साल ही सेवानिवृत हुए। अपनी दो बेटियों और एक बेटे की शादी के बाद निम्मी की शादी उनके सिर की आखरी ज़िम्मेदारी थी जिसे वो अपने पैरों पर रहते हुए अपनी देख रेख में अच्छे से निभा लेना चाहते थे। सरदार जी का भी अभी कुछ खास मन नहीं था निम्मी के हाथ पीले करने का। मन भी कैसे होता, सारे घर की रौनक जो थी निम्मी। सुबह से शाम तक अगर निम्मी अपनी हरकतों से माँ को परेशान बापू जी को खुश ना करे तो उस दिन को सरदार जी बेकार मानते थे।

एक दिन तो गुरद्वारे जाते हुए उसे एक पिल्ला दिख गया जो ना जाने कैसे नाले में जा फंसा था। उस रास्ते से आते जाते किसी की नज़र ना पड़ी उस पर, मगर निम्मी को उसकी च्याऊं च्याऊं की आवाज़ ने अपने पास बुला ही लिया । जनवरी की उस कड़कती ठंड में बेचारा बेज़ुबान ना जाने कब से पड़ा था।

"बिट्टो ये ले दस दा नोट, गुरद्वारे चढ़ा देना और मेरे हिस्से का माथा भी टेक देना।" दस का नोट उसने अपनी चचेरी बहन को पकड़ाते हुए कहा।

"और तू कहाँ चली?"

"मुझे तो बाबा जी ने यहीं से काम सौंप दिया। देख नई रही क्या, बाबा जी चाहते हैं कि मैं इसे घर ले जाऊं और इसे गरम गरम दूध पिलाऊं।" बिट्टो के लिए ये नई बात कहाँ थी जो वो आश्चर्य करती। उसने मुस्कुराते हुए अपना माथा पीटा और "जा मर" कह कर वहाँ से चली गयी।

कीचड़ में सने उस पिल्ले को निम्मी गोद में छुपाए घर पहुंच गई। माँ ने जब देखा तो माथा पीट लिया।

"ये क्या उठा लाई तू अब। नयी 'कोटी' पहनी थी, सारी किचड़ से भर ली। ऊपर से ये सेयापा भी उठा लाई। अब सारे घर में हगता फिरेगा और रात में चाऊं चाऊं कर के सोने नहीं देगा।" माँ बोलती गयी पर निम्मी ने सुना कुछ नहीं उसके लिये तो ये रोज़ का था। उसे पता था बाऊ जी जब आएंगे और वो उन्हें बताएगी कि कैसे वो ठंड में ठिठुरते इस बेज़ुबान को घर ले आई तो बाऊ जी "शाबाश मेरा पुत्तर" कह कर उसके सर पर स्नेह और आशीर्वाद भरा हाथ फेर देंगे। और होता भी ऐसा ही था। तब माँ सर पीटते हुए कहेगी "दोनों बाप बेटी पागल हैं।"

अब इतनी मासूम सी जान को कौन खुद से दूर करना चाहेगा। मगर बेगोवाल वाली बूआ ने ये रिश्ता बड़ी मुश्किल से ढूंढा था। पूरा परिवार इंग्लैंड में सैट था। वहाँ पर इनके अपने स्टोर थे जो लड़के के ज़िम्मे ही थे। बूआ ने बाऊ जी से बड़ा ज़ोर दे कर कहा था "पाजी अगर ये रिश्ता हाथ से छूटा ना तो समझो आप किस्मत को लात मार रहे।" ये बात सरदार हरदीप सिंह के दिमाग में बैठ गयी थी। इसीलिए उन्होंने लड़के वालों को बुला लिया।

आज लड़के वाले आ रहे थे और इधर निम्मी शादी ना करने की ज़िद्द ठाने बैठी थी मगर कितनी भी मासूम हो, कितनी भी लाडली हो, कितनी भी घर की रौनक हो मगर थी तो आखिर एक बेटी। जो एक पतंग की तरह होती है, जिसकी डोर किसी और के हाथ में होती है। पतंग को उस हाथ का सहारा ही होता है, वो हाथ जिधर तुनके का ईशारा देगा पतंग को उधर ही जाना है। ज़्यादा ज़िद्द करेगी तो टूट जाएगी और टूटने के बाद ना जाने वो कहाँ जाती है। बस उस पतंग की तरह ही निम्मी को ना चाहते हुए भी बाऊ जी के तुनके का इशारा मानना पड़ा।

लड़के वालों ने तो निम्मी को देखते ही पसंद कर लिया था। करते भी क्यों ना मरजानी निम्मी थी ही इतनी सुंदर। बिट्टो जलन के मारे उसे कहा करती थी "निम्मी मैं अगर मुंडा होती ना तो तुझे भगा के ले जाती। मरजानिए तू कितनी सुंदर है। निला सूट तुझ पर ऐसे लगता है जैसे चाँद ने नीले आसमान को अपना लिबास बना लिया हो। "उसके मोतियों जैसे दाँत जब मुस्कुराहट बिखेरते थे तो कुछ वक्त के लिए इंसान अपने सारे दुःख तकलीफ़ भूल जाता था। सरदार जी भी जब कभी ज़्यादा परेशान होते तो बहाने से निम्मी को पास बिठा कर उसे झूठी सच्ची कहानियाँ सुनाते हुए घंटों उसका मुखड़ा निहारते रहते। वो कहते थे इसके मुखड़े में सुकून भरा पड़ा है।

लड़के वालों ने निम्मी को पसंद करते ही शर्त रखी की शादी बीस दिन के अंदर में हो जानी चाहिए। दहेज हम एक पैसा नहीं लेंगे और शादी का सारा खर्चा भी हमारा होगा। हमे बस आपकी बेटी चाहिए, उसको हम ले भी अपने ही कपड़ों में जाएंगे, आपको चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं। "सरदार जी को तो जैसे रब मिल गया था। अब तो निम्मी भी खुश हो गयी थी बाऊ जी के सर का बोझ हल्का होते देख। या फिर शायद उसने अपने अरमानों को बाऊ जी की खुशी के नीचे खुशी खुशी दब जाने दिया था। जो भी था मगर थे सब बहुत खुश। माँ निम्मी की बलाएं लेती ना थकती थी। सारे गाँव में उसने निम्मी के भागोंवाली होने का ढ़िंढोरा पीट दिया था।

आज निम्मी की शादी का दिन भी आगया था। बाऊ जी अपने दुःख को अपनी झूठी मुस्कुराहटों के पीछे दबाए सारा काम कर रहे थे। घर रिश्तेदारों से भरा पड़ा था। शादी उम्मीद से कहीं ज़्यादा धूमधाम से हुई थी। सारे गाँव में चर्चा का विषय बन गयी थी निम्मी की शादी। लोग सरदार हरदीप सिंह के भाग्य की दाद देते नहीं थक रहे थे। शादी सम्पन्न हो गयी। निम्मी रोते रोते घर से विदा हो रही थी। बार बार कह रही थी "बाऊ जी मुझे रोक लो, मुझे अभी नहीं जाना। "मगर उसकी पहले ना किसी ने सुनी तो अब कौन सुनता। निम्मी अपने अरमान अपने सपने सब यहीं अपने बाबुल की इसी दहलीज़ पर छोड़े जा रही थी।

अब निम्मी की डोर उसके बाऊ जी के हाथ से छूट कर उसके ससुराल वालों के हाथ आगयी थी। शादी के कुछ ही महीनों के भीतर निम्मी का वीज़ा निकल आया और निम्मी अपने आप को मनाते समझाते हुए तुनके के इशारे के साथ पंजाब छोड़ इंग्लैंड की उड़ चली। इंग्लैंड उसके लिए सपने से कम नहीं था। अब अगर यहीं रहना है तो खुशी से क्यों नहीं यह सोच कर निम्मी खुश होने की कोशिश करने लगी थी। वहाँ से जब वो माँ को फोन करती तो उसे इस अजूबे देश की बातें बताती।

"मम्मी इधर ना इन्नी सफाई है कि चाहे ज़मीन पर रख कर खा लो। यहाँ सारा काम ऑटोमेटिक है, कपड़े धोने के लिए थापी नहीं चलानी पड़ती, मशीन में डालो कपड़े धुल कर बाहर, हर कमरे विच ऐ.सी लगा है, बड़ी बड़ी गाड़ियाँ हैं। मेरे को तो ये सपनों से कम नहीं लगता। और मम्मी इधर ना मेरी वो सबसे प्यारी गुड़िया थी ना ठिक वैसे ही बालों और चमड़ी वाले लोग हैं। "बेटी की बातें सुन कर माँ के चेहरे पर हैरानी वाली खुशी तैर जाती थी। वो उसकी बातों में दो अपनी तरफ से मिला कर सबको बड़े गर्व से सुनाती।

कुछ महीने इसी तरह बड़े आराम से बीते। निम्मी की सास उसका पूरा ख़याल रखती, उसका पति उसे बहुत मानता, हर संडे नई जगह घुमाने ले जाता जहाँ जा कर वो महसूस करती कि जैसे वो किसी दूसरी दुनिया में आगयी हो। निम्मी धीरे धीरे खुश होने की ओर बढ़ रही थी। इधर सरदार जी और निम्मी की माँ सब बहुत खुश थे ये सोच कर कि रब ने उनकी सुन ली। मगर उनकी खुशी से छुप कर किस्मत एक नये खेल के लिये मोहरे बिछा रही थी। जिसकी भनक निम्मी को तब लगी जब उसने अपने ससुराल वालों कि बातें छुप कर सुन लीं।

"माॅम निम्मी बाकि लड़कियों से अलग है, मैं तो कहता हूँ इसे रख लेते हैं। "निम्मी के पति शैंटी ने कहा

"तुझे बड़ा प्यार आ रहा है? बाकि सब भी ऐसी ही प्यारी थीं। हम क्लाईंट से पैसे ले चुके हैं। सबको प्यारी समझ कर रखते रहें तो अनाथाश्रम खोलना पड़ेगा। वैसे भी तेरी शादी कहीं अच्छी जगह करेंगे, इन जैसे भिखमंगों से कैसा नाता जोड़ना जिन्होंने दहेज ना देने और खर्चा बच जाए ये सोच कर बिना जाँच पड़ताल किये अपनी बेटी हमें सौंप दी। "शैंटी की माँ ने शैंटी को डांटते हुए कहा।

सारी बात सुनने के बाद निम्मी जान गयी थी कि वो अब इंग्लैंड कि सिटिजन है और ये लोग उसकी कोर्ट मैरिज़ किसी और से करवा कर उसे यहाँ की सिटिज़नशिप दिलवाना चाहते हैं जिसके बदले इन्होंने क्लाईंट से बहुत मोटी रकम ली है। और ये पहली बार नहीं है बल्कि इनका तो धंधा ही यही है कि पंजाब से लड़कियों से शादी कर के लाना और यहाँ किसी और के गले बांध देना फिर वो उन लड़कियों को रखे या आगे फिर किसी के हाथों बेच दे।

ये सब पता लगते ही निम्मी को ऐसा लगा जैसे उसके सुंदर सपने में अचानक से हज़ारों साँप और बिच्छू आगये जिन्होंने देखते ही देखते उसके सुंदर सपने का कोना कोना हड़प लिया और चंद पलों के भीतर ही खुश्बूदार सपनों में ज़हरीली गैस घुल गयी। जिससे निम्मी की नवजात खुशियों का दम घुटने लगा और देखते ही देखते उन नन्हीं खुशियों की लाशों पर उदासियाँ, भय, और चिंता अपना रुदन करने लगीं।

वो चाहती नहीं थी कि वह इस बात से अपने बाऊ जी और माँ को परेशान करे। आखिर बेटी थी ना और बेटी की बदनामी पूरे खानदान के माथे का अमिट कलंक बन जाती है। इसी भय ने उसका हाथ फोन के रिसीवर तक पहुंचने से पहले ही रोक लिया। रात के अंधेरे में जब परदेस का वो अंजान शहर ऊंघ रहा था तब बेचैन निम्मी ने ये फैसला ले लिया कि वो यहाँ से भाग जाएगी। हालांकि 'वो जाएगी कहाँ, रहेगी कहाँ, अंजान शहर के अंजान जानवरों से उसे कौन बचाता फिरेगा' जैसे बहुत से सवाल उसके सामने खड़े थे मगर उसने इन सब सवालों को फिलहाल चुपचाप अपने पीछे आने के लिए कहा। वो डोर जो बाऊ जी ने उसके ससुराल वालों को पकड़ाई थी उसे निम्मी ने आज खुद से ही तोड़ लिया। अब वो हवा में लहराती हुई ईश्वर के भरोसे बहे चली जा रही थी।

पिछले कुछ महीनों से शैंटी के साथ घूम कर उसे लंदन की थोड़ी बहुत जानकारी हो गयी थी। वह लंदन के यूस्टन स्टेशन से बर्मिंघम जाने वाली ट्रेन की टिकट ली और अपने अंजान और अंधेरे से भरे सफर के लिए निकल पड़ी। शायद वो टूट जाती, या फिर अपने आपको खत्म कर लेती क्योंकि ये अचानक से घिर आया अंधेरा उसे डरा रहा था, उसका मन बेचैन कर रहा था। मगर बाऊ जी कि ओ बात उसे हिम्मत देती रही जब उन्होंने कहा था "निम्मी पुत्तर, डर जो होता है ना वो गली के आवारा कुत्ते की तरह होता है। तुम जब तक डरोगे डर तुम्हें डराएगा, तुम पर चिल्लाएगा मगर जब तुम उसके सामने डट कर खड़े हो जाओगे उसका सामना करोगे तब वो अचानक से भाग खड़ा भोगा। अंधेरे से घबराओ मत, अंधेरा तुम्हें बताता है कि अब प्रकाश आने वाला है। पुत्तर हमेशा याद रखना हर चीज़ का अंत सिर्फ अंत नहीं बल्कि किसी नयी चीज़ की शुरुआत है।"

ट्रेन के बाहर खिड़की से दिख रहा अंधेरा हर घड़ी थोड़ा थोड़ा घट रहा था जिसने निम्मी को बताया कि ये अंधेरा तुम्हारे जीवन का है और ये रौशनी जो इस अंधेरे पर हावी हो रही है यह तुम्हारी हिम्मत है। यही सब सोचते सोचते सूरज की पहली किरण के साथ ही निम्मी बर्मिंघम पहुंच गयी थी। स्टेशन से बाहर निकलते ही वो तीन सवाल फिर से निम्मी के सामने आ खड़े हुये थे। निम्मी थोड़ी दूर चलने के बाद वहीं एक पार्क में जा बैठी थी जहाँ से उसकी यादें उसे ज़बरदस्ती खींच कर उसके अतीत में ले गयी थीं।

"तुसी ठीक हो ?"

"ये ये क्या ? ये कौन होगा, ये अंजान देश के इस अंजान शहर में अपनी सी ज़ुबान किसकी है, कहीं कोई मेरा पीछा तो नहीं कर रहा? "अचानक से आई उस अंजान पर अपनी सी आवाज़ को सुन कर निम्मी अपना सर घुटनों में दिये हुए ही सोचने लगी।

"मैं कब से आपको देख रहा हूँ। मुझे आप कुछ परेशान सी लगीं तो सोचा पूछ लूँ शायद कोई मदद चाहिए हो। "उस आवाज़ में एक ऐसा अपनापन था जो अहसास करा रहा था कि जैसे कोई अपना बरसों बाद मिला हो। निम्मी ने अब हिम्मत कर के चेहरा ऊपर उठाया और अपनी भीग चुकी आँखों को पोंछते हुए सामने देखा। सामने एक साढ़े पाँच फुट से कुछ बड़ा छब्बीस सत्ताईस साल का औसत सा दिखने वाला लड़का खड़ा था। जिसने भले अपने बालों को रंग कर और अपने चेहरे को मेक ओवर कर के विदेशी दिखने की कोशिश की थी मगर अपने में से पंजाब को बाहर निकाल नहीं पाया था। उस औसत से लड़के में सबसे खास थीं उसकी दो आँखें जिनमें एक अपनापन सा रहा था। बहुत से सवालों का जवाब थीं उसकी वो आँखें।

"नई कोई प्राब्लम नहीं, मैं ठीक हूँ। "निम्मी ने झूठ बोलने की नाकाम सी कोशिश की।

"खैर तुसी कितने ठीक हो ये तो आपकी शक्ल और आपके सामान से पता लग रहा है मगर मैं ज़्यादा पूछ भी नहीं सकता ना, कौन जाने मैं। मदद के लिए पूछूं और आप पुलिस बुला लें। "ये बाऊ जी का तरीका था किसी भी गंभीर माहौल में एक ऐसी बात कह जाना जो चेहरे को मुस्कुराने पर मजबूर कर दे।

निम्मी भी मुस्कुरा दी थी और उसकी मुस्कुराहट को मंज़ूरी समझ कर लड़का भी वहीं उसके बगह में बैठ गया। उसने बताया कि उसका नाम रमनीत सिंह गिल है। वो भी यहाँ आए लाखों पंजाबियों की तरह पौंड कमाने आया है। यहीं पास में ही उसका रूम है जहाँ वो अकेला रहता। है क्योंकि उसके रूममेट को लंदन शिफ्ट होना पड़ा। सुबह सुबह वह पार्क में जाॅगिंग करने आता है। निम्मी को उसकी बातें सच्ची लगीं उसे लगा कि अपनी सारी बात उसे बता देनी चाहिए और दूसरा कोई है भी नहीं जो उसकी बात सुने। इसीलिए उसने रमनीत को शुरू से आखिर तक सब बता दिया ।

रमनीत उसकी पूरी बात सुनने के बाद उठ खड़ा हुआ और चुपचाप वहाँ से चल पड़ा। निम्मी समझ गयी कि ये भला बंदा किसी तरह की मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता और वैसे भी वो उसे किस हक़ से रोक सकती है। निम्मी को अब पहले से भी ज़्यादा रोना आ रहा था। उसका डर अब बढ़ता जा रहा था।

"अंडे खा लेती हो ना? "अचानक से फिर वही आवाज़? पर रमनीत तो चला गया था। निम्मी ने सामने देखा तो रमनीत हाथ में अंडे दूध और खाने पीने का कुछ सामान ले कर खड़ा था।

"देखो मैं जैसा कि समझ रहा हूँ तुम पंजाब से अभी अभी आई हो और तुम्हे ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा कि तुम किसी अंजान लड़के के साथ अकेले उसके घर में रहो और मैं ऐसे पूछता भी नहीं मगर तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं इसलिए तुमें मेरे साथ ही रहना होगा। यही सोच कर मैं तुम्हारे और अपने लिए नाश्ते का सामान लाने गया था। बैचलर हूँ ना हमारा काम ऐसे ही खुदरे में चलता है। अब बताओ अंडे खा लेती हो ना। "निम्मी उसकी बात सुन कर हंस दी। रमनीत ने उसे थैली पकड़ा कर खुद उसका सामान उठा लिया।

रमनीत के घर पहुंच कर उसने देखा कि घर की हालत ऐसी है जैसी बहुत ही सुंदर लड़की ने बिना नहाये सजे संवरे अपनी हालत बंजारनों जैसी कर रखी हो। नाश्ते के बाद रमनीत ने उसे बता दिया कि खाना जो रात बनाया था वही फ्रिज में पड़ा है वो गर्म कर के खा ले और कहीं बाहर ना जाए क्योंकि यहाँ के बारे में उसे कुछ पता नहीं। वो एक स्टोर में स्टोर कीपर का काम करता है। आज कल उसकी दिन की ड्यूटी लगी है और वो शाम को घर आजाएगा। इतना कह कर रमनीत चला गया।

रमनीत के जाते ही निम्मी उस उजड़े घर को सजाने संवारने में लग गयी। शाम को जब रमनीत घर आया तो एक पल के लिए उसे लगा शायद वो किसी और घर में आ गया है। इतना साफ सुथरा घर उसका घर पहले कभी नहीं था। खाने बैठा तो आज चार साल बाद उसके सामने राजमा चावल पड़े थे जो उसने आखरी बार तब खाये थे जब वो पंजाब आ रहा था और माँ ने उससे पहले उसके लिए बनाए थे।

"क्या ज़रूरत थी इतना सब करने की। तुम पहले से इतना परेशान और थकी थी। "रमनीत को अच्छा लग रहा था मगर फिर भी उसने औपचारिक्ता निभाने के लिए कहा।

"लड़की और घर सजे संवरे ही अच्छे लगते हैं। ऐसे तो भूतों का डेरा लग रहा था। "इतना कह कर निम्मी हँस पड़ी और रमनीत शर्मिंदा हो गया।

"महीना यही सिलसिला चलता रहा। रमनीत साफ दिल लड़का था। कर्जे का बोझ उतारने में उसे तीन साल लग गये थे और अब वो अपने लिए कमा रहा था जिससे वो अपने घर खुशियाँ भेज सके। इसीलिए उसका सारा ध्यान काम में रहता था। इधर निम्मी को भी कुछ करना था अब क्योंकि उसने जब घर फोन किया और सारी बात बताई तो फोन में से ही ऐसी आवाज़ उसे महसूस हुई कि जैसे लगा कि बाऊ जी टूट रहे हैं। और निम्मी अपने बाऊ जी को टूटता कभी नहीं देख सकती थी। बाऊ जी ने कहा था कि" बेटा तू मुड़ आ। लोग चार बातें कर के चुप हो जाएंगे। मैं सह लूंगा मगर तेरा ये हाल ना सहा जाएगा मुझसे।"

इस पर निम्मी ने जवाब दे दिया कि "नई बाऊ जी किसी से कोई बात करने की ज़रूरत नहीं। शायद बाबा जी ने यही रास्ता मेरे लिए चुना है। मेरे साथ जो बुरा हुआ उसे ही मैं अपने लिए और आपके लिए अच्छा बनाऊंगी। अब मैं तब वापिस आऊंगी जब लोगों का मुंह बंद करने लायक हो जाऊंगी।"

इसी लिए अब उसे यहाँ कुछ करना था, जो मौका अंजाने में इतने दुःख सहने के बाद उसे मिला था उसका फायदा उठाना था। रमनीत यहाँ कच्चा था, उसके पास यहाँ की नागरिक्ता नहीं थी। अगर वह पुलिस के हाथ आ जाता तो उसे वापिस इंडिया भेज दिया जाता। यह डर उसे सोने नहीं देता था। निम्मी अक्सर उससे पूछती मगर वो बात टाल देता। एक दिन घर साफ करते हुए उसके हाथ रमनीत का पासपोर्ट लग गया और उसने देखा कि रमनीत का वीज़ा साल भर पहले ही खत्म हो चुका है। काफी देर तक निम्मी कुछ सोचती रही। वो अपनी सोच से बाहर तब आई जब डोर बैल बजी।

दरवाज़ा खोलने के बाद रमनीत जब अंदर आया तो उसे पानी देते हुए निमी ने कहा "वीज़ा खत्म है तुम्हारा ?"

एक पल को रमनीत हैरान हुआ फिर संभलते। हुए बोला "हाँ, साल भर पहले ही ।"

"पकड़े गये तो ?"

"डिपोर्ट कर देंगे ?"

"शादी करोगे मुझ से ?"

अचानक से निम्मी के मुंह से यह बात सुनते ही रमनीत के गले में उतर रहा। पानी नाक में जा पहुंचा। वो खांसने लगा। निम्मी ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा "इतना भी हैरान होने की क्या बात है ? तुमने मेरे लिए इतना किया तो मैं तुम्हारी इतनी मदद तो कर सकती हूँ। मैं यहाँ की सिटिज़न हो गयी हूँ। शैंटी से डिवोर्स के लिए कल ही फाईल कर देंगे और कुछ महीनों में केस क्लीयर होते ही शादी कर लेंगे। वापिस मैं भी नहीं जा सकती क्योंकि लोग फिर बाऊ जी को जीने नहीं देंगे और तुमें भी यहाँ रहना है तो क्यों ना?" निम्मी अपनी बात समझा कर चुप हो गयी।

"मेरे दिमाग में भी यह बात आई थी फिर मैं यह सोच कर चुप हो गया कि कहीं तुम ये ना समझो कि मैने तुम्हारी मदद की इसके बदले तुम्हारा फायदा उठा रहा हूँ। मेरे लिये ये बेहद खुशनसीबी की बात होगी। वैसे भी तुम जैसी सुंदर लड़की मुझे मिलेगी भी नहीं।" रमनीत की आखरी बात से निम्मी शर्मा गयी। शर्माती भी कैसे ना उसने पहली बार जो उसकी तारीफ की थी।

सब कुछ सोचे के हिसाब से हुआ। शैंटी के परिवार ने रमनीत और निम्मी को धमकाने की कोशिश की मगर निम्मी अब कमज़ोर नहीं रह गयी थी उसने उनके धमकी का जवाब देते हुए कहा "डिवोर्स का केस लगाया है। चुपचाप मान लो और अपने रास्ते निकलो वरना अगर मैने हरासमेंट और फ्रार्ड का केस भी डाल दिया तो कहीं के ना रहोगे। और हाँ मैने फिर कभी सुना कि तुमने किसी और लड़की के साथ ऐसा किया है तो पूरे परिवार को यहाँ की जेल में सड़ा दूंगी।" निम्मी की हिम्मत से डिवोर्स मंज़ूर हो गया। इधर रमनीत और निम्मी ने शादी कर ली।

कुछ महीनों में रमनीत को भी वहाँ की नागरिक्ता मिल गयी। नागरिक्ता मिलने के कुछ दिन बाद ही दोनों पंजाब आ गये। रमनीत को भी अपने परिवार से मिले सालों बीत गये थे इधर निम्मी को भी अपने घर जा कर दिखाना था कि बाऊ जी जैसे आपने भेजा था मैं वैसी ही हूँ। वैसे तो निम्मी के घर में और खास रिश्तेदारों को पता था कि निम्मी के साथ क्या हुआ मगर बाहरी रिश्तेदार ये नहीं जानते थे। जब बार बार बुलाने के बाद निम्मी रमनीत के साथ अपनी मासी के यहाँ गयी तो मासी ने थोड़ा ग़ौर से रमनीत को देखते हुए कहा "निम्मी क्या ये वही मुंडा है जिससे तेरी शादी हुई थी ? मुझे कुछ अलग सा लग रहा है।"

मौसी की बात सुन कर रमनीत थोड़ा सा सहम गया मगर निम्मी ने उसका हाथ दबा कर शांत रहने को कहा और बोली "हाँ मासी वही तो है, और मैने कौन सा चार चार व्याह करा रखे। वो काम ज़्यादा होता है ना इसलिए थोड़े कमज़ोर हो गये। अच्छा मासी मैं आपके लिए देखो क्या क्या ले के आई।" बात घुमाने के लिए निम्मी ने मासी के आगे तोहफों वाला बैग खोल दिया। मासी सब भूल कर तोहफे देखने लगी। इधर रमनीत और निम्मी एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिये। निम्मी के जीवन रूपी पतंग की डोर जो बाऊ जी के हाथों से उसके ससुराल वालों के हाथों में गयी और फिर निम्मी ने खुद से हीउस डोर को तोड़ लिया वो अब हवा में लहराते हुए रमनीत के हाथ में जा पहुंची और रमनीत ने उसे पंख लगा कर पतंग से परिंदा बना दिया। अब निम्मी की कोई डोर नहीं जिससे कोई भी उसे तुनकों का इशारा दे कर अपनी मर्ज़ी से उड़ाये। अब निम्मी आज़ाद गगन का परिंदा है जो अपनी मर्ज़ी से उड़ती है और रमनीत उसे देख कर खुश होता है।

धीरज झा



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