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@dawriter

मेरे अपने मेरे दुश्मन

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मेरे अपने मेरे दुश्मन 

किसी की बेटी बनती है, तो किसी की बहन बनती है, एक औरत ही है, जो पुरुष को जन्म देती है।

कहते है लड़किया लक्ष्मी का रूप होती है,और वो भी अपने परिवार में उसी लक्ष्मी का रूप बनकर आयी थी। उस परिवार मे थी वो सबसे छोटी और उसका एक बड़ा भाई और उसके माता पिता।

अभी अभी  तो उसकी उम्र 18 वर्ष की हुई थी और अभी से रिश्तेदारों की आँखो मे वो चुभने लगी थी

क्या उसका बड़ता शरीर यह बता रहा था कि उसकी शादी कर देनी चाहिए।

क्या दोष है उसमें उसका यदि मोहल्ले के लड़के उसे छेड़ते है,क्यों मोहल्ले वाले उसकी मदद नही करते, बल्कि उस लड़की के घर वालो को कहते है कि अब आपको अपनी बेटी के हाथ पीले कर देना चाहिए।

क्यों वह अपने उम्र के लड़को के साथ हँस हँस कर बाते नही कर सकती। क्या हुआ यदि कभी किसी दोस्त ने घर तक छोड़ दिया क्यों उसका भाई उस पर शक करने लगता है।

क्या हुआ यदि वो जींस पहनना चाहती है,क्या हुआ यदि किसी लड़के का उसे रात को फोन आ गया उसे जरूरी काम भी तो हो सकता है।

क्या हुआ यदि वह ऐक परीक्षा मे फेल हो गई तो, क्यों उसके घर वाले उसकी शादी के बारे में सोचने लगते है, क्यों आखिर उसी के घर वाले उस पर शक करने लगते है, ओर उसकी शादी तय करने लगते है।

जब सुनती है वह बात अपनी शादी की तो उसके सारे सपने टूट जाते है, उसके अपने ही उसके दुश्मन बन जाते है।

जब कहती है वो अपने भाई से कि मुझे शादी नही करनी तो क्यों उसका भाई उसके दर्द को नही समझ पाता, तेरी जिदंगी के लिए यही सही होगा बोलकर चला जाता है।

क्यों वह उस धागे को भूल जाता है,जो हर साल उसकी कलाई पर इसलिए बांधा करती थी, ताकि मुसीबत के समय वह उसकी मदद करे।

कहते है माँ ममता का रूप होती है, तो क्यों उसकी माँ अपनी बेटी की ममता को समझ नही पाती और जब वह  शादी करने से इंकार करती है, तो क्यों वो माँ उसे मरने की धमकी देती है।

एक पिता तो अपने बच्चो की हर ख्वाहिश पूरी करता है ना तो, क्यों वह अपनी बेटी की ख्वाहिश समझ नही पाता, क्यों उसके पिता अपने कृत्वय  को समझ नही पाते। जबकि लड़किया तो पिता का गुरूर होती है ना।

जंहा एक तरफ सहँनाईयो की गुंज गूंज रही थी,तो दूसरी ओर उसके कानों में उसके अरमानों की मय्यत की गुंज गूंज रही थी।

जो लोग उसे हल्दी यह सोच कर लगा रहे थे, कि शादी के लिए हल्दी शुभ होती है,वह क्यों भूल रहे थे कि  शादी अपनी खुशी से करो तो ही शुभ होती है।

उसकी आँखो में वो दर्द साफ साफ दिख रहा था, लेकिन दुल्हे को तो सिर्फ दहेज दिख रहा था।

वहा उस मंडप की अग्नि मे लकड़ियां नही जल रहीं थी ,बल्कि उसकी तकदीर भी जल रही थी।

वह एक ऐसी आग थी जो सिर्फ उसे दिखाई दे रही थी, रिश्तेदारों को तो सिर्फ मंडप की सजावट दिखाई दे रही थी।

उसके हाथो में वो चूड़ियां नहीं, बल्कि आजादी की हथकड़ियां पहना रहे थे।

उसके गले में वो मंगलसूत्र नही बांध रहे थे,बल्कि उसके सपनों का गला घोट रहे थे।

उसके पाव में वो पायल नही बल्कि बेड़ियाँ डाल रहे थे।

उसकी माँग में जो सिंदूर था ,वो सुहागन का संदेश नही बल्कि वहाँ खड़े अनपढ़ समाज का संदेश था।

उसने उन सात फेरों के साथ सात कसमें नहीं खाई थी, उसके तो खुद परिवार वालो ने उसकी किस्मत में आग लगाई थी।

वह ऐक रिश्ता नही जोड़ रहे थे, बल्कि उसके ख्वाब तोड़ रहे थे, जो खुद अभी एक बच्ची है,वो कैसे संभालेगी रिश्तेदारी को।

उसकी आँखो में जो अश्कथे,वो उसकी विदाई के नही थे, बल्कि उसके ख्वाब के टूटने के थे।

आखिर क्यों जुबान होकर भी गूंगी बनी रही वो,आखिर क्यों निगाहे होते हुए भी अंधी बनी रही वो आखिर क्यों अपने परिवार के लिए खुशी खुशी सूली चड़ गई वो।

वो सात फेरों के साथ जो सात कसमे खाई थी,वो सात महीने मे टूट गई आखिर उसका रिश्ता कामयाब होता भी कैसे,वो तो ऐसे इंसान के साथ जिंदगी बिता रही थी,जिसे वो जानती भी नही।

आखिर क्यों सिर्फ एक मुलाकात में परिवार वाले एक अंजान इंसान के साथ हमारी जिंदगी तय कर देते है,जिसे हम जानते ही नही, बल्कि हमें तो बचपन से हमें यही सिखाया जाता है कि अंजान इंसान पर भरोसा नही करना चाहिए।

आखिर क्यों मोहल्ले वाले और रिश्तेदारों के कारण परिवार वाले खुद अपने बच्चों के मन की आवाज नही सुन पाते और उन पर शक करने लगते है।

हैरानी होती है मुझे,ऐसे समाज को देखकर जहाँ यदि आप अपने घर वालों की सहमति से शादी करो तो आप सबसे अच्छे बेटा / बेटी और यदि उनके खिलाफ शादी की तो समाज वाले आपको ऐसी नजरो से देखते है जैसे आपने बहोत बड़ा गुनाह किया है।

आज भी हम ऐसे समाज मे जी रहे है,जहाँ यदि एक लड़का चाहे तो अपनी मर्जी से शादी कर सकता है लेकिन लड़की नही क्यों आज के समय मे भी इतना अंतर।

क्यों किसी लड़की के सपने को पूरा नही होने दिया जाता आखिर उसके ख्वाब मे भी तो कोई राजकुमार आता होगा, उसके भी कुछ अरमान होते है क्यों वह अपने परिवार के लिए अपने ख्वाब का गला घोट देती है।

वह भी अपने ख्वाबों को पूरा कर सकती है,सपनो को मंजिल दे सकती है यह तभी मुमकिन है, जब परिवार वाले, मोहल्ले वाले और रिश्तेदारों की नही बल्कि अपने बल्कि अपने बच्चों की मन की आवाज सुने ओर उन पर विश्वास रखे।

#saynotoforcedmarriage



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