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@dawriter

हाय रे मोटापा..

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कुछ सुना क्या.... अरे देखा राजू की बहू को दो साल के अंदर ही कितना फैल गयी है...भैंस कहीं की...और राजू कैसे सूखता जा रहा है। कितनी निर्लज्ज है..शर्म नही आती पति से ज्यादा मोटी होते हुए। जाने कितना खाती होगी....राजू तो लगता चिंता में दुबला हुआ जा रहा है...बड़ी ही ढीठ किस्म की लगती है..उसकी बहू। राम राम..कोई पति से ज्यादा मोटा होता है...क्या??(पड़ोस वाली काकी अपने पति से कह रही थी)

अरे रे...लगता है..मोटी बुद्धि की है..किसी बात का कोई असर न होता है.. इस पर(जैसे ही कोई महिला मोटी होती है..अचानक से उसकी बौद्धिक क्षमताओं पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिए जाते है)वैसे राजू की बहू कोई इतनी मोटी नहीं है..हाँ आप उसे हेल्दी कह सकते है। वह क्या करे,,दिनभर काम करती है..राजू से आधा खाती है..फिर भी मोटी हो जाती है..राजू वैसा ही रखा है। इसमें उसकी क्या गलती है।

अब ये देखिए ना..बहू मोटी हो गई.. ये खबर ननदिया को पहुंच गई। कैसे..और कौन.. सासुजी ने बताया होगा बस फिर क्या था..ननदिया ने फोन घुमाया.. थोड़ा भाई से बतियाई..अपनी भलमनसाहत दिखाई.. और फिर बोली..लाओ जरा भाभी को फोन दो। बड़ी ही खुश हुई.. लक्ष्मी.. अरे आज तो ननदिया  खुद ही बात करना चाहे है..और जैसे ही फोन लिया..उधर से आवाज आई..थोड़ा कम खाया करो। काम खूब किया करो..(जैसे सारे घर का काम नौकरानी करने आती हो)। हमारी इज्ज़त की परवाह है..या नहीं.. मोटी हुई जा रही हो। बाप रे ये मोटापा तो अपराध हो गया रे..लक्ष्मी। उस दिन लक्ष्मी खूब रोई। बस यही कहना था फोन पर। एक बार हालचाल तो पूछ लेती.. 

सारा काम हंस के करती है..लक्ष्मी। फालतू की चिंता करते उसे कभी नहीं देखा। इसीलिए वह स्वस्थ है..कोई उसे देखता है..तो हमेशा हँसते ही दिखती है..खिन्नता या नाराजगी तो कभी किसी ने उसके चेहरे पर नहीं देखी।

जब भी उसकी ननद यहां आती है..तो एक एक कपड़े धुलवाती है..सबके..आपका फर्ज है..सारा काम करना नहीं तो पाप लगता है। बस यही देखती रहती है..कि कोई काम रह ना जाए..और लक्ष्मी बैठ ना जाए। सास से न करवाया करो..पाप लगता है। ये पाप हमेशा बहुओं को ही क्यों लगता है। सास ननद के लिए विधान लिखते समय आपकी कलम की स्याही खत्म हो गई थी..क्या भगवान जी..लक्ष्मी हमेशा सोचा करती..ये जो सास ननद मिलकर जो निरपराध बहुओं का दिल दुखाती है..उसका क्या पाप नहीं लगता?

वैसे राजू को उससे कोई शिकायत न थी..वह अपने काम से काम रखता था..पर थोड़ा तो सरोकार रखों.. घर से..कम से कम बहन को ही समझा दो।

एक दिन सास को न जाने क्या सूझी..सुबह सुबह छत पर चली गई.. बिना चश्में के। फिर जब सीढियां उतर रही थी..तभी शायद ठीक से दिखा नहीं और गलत पैर रख दिया.. गिर पड़ी..सीधी नीचे...वो तो गनीमत थी कि बस फ्रेक्चर हुआ.. ज्यादा कुछ हो जाता तो..हाँ बस परिणाम ये हुआ कि चलफिर नहीं पाती है तो वही मोटी बहू उठा उठाकर ले जाती है...सारे दैनिक कर्मों के लिए।

अब सास सोचती है..कि सच में राजू तो मुझे उठा नहीं पाता..दुबला पतला जो ठहरा...अगर ये मोटी ताजी लक्ष्मी न होती तो क्या होता??ननदिया के मुंह पर भी ताला लग गया है। मोटी लक्ष्मी अब नहीं खटकती इन्हें।

 

  (कविता नागर)

    



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