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@dawriter

मैं बिकूँगा नहीं

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rajesh by  
rajesh

"अब कैसी तबियत है, तापसी!" वह चौकी उसे क्या हुआ है? वह तो सो गई थी। दो घंटे से अधिक बेहोश रही हो, तुम!... डॉक्टर अभी-अभी गये हैं, कह रहे थे तुम्हें कोई मानसिक आघात लगा है।" पलंग के पास कुर्सी पर बैठते हुए भास्कर ने कहा, तापसी चुप थी, भास्कर कहे जा रहा था- तुम बीच-बीच में जाने क्या-क्या बड़बड़ा रही थी धीरे-धीरे जैसे स्वयं से बातें कर रही हो...कुछो शब्द जो तेज स्वर के थे ..मैं सुन पाया..... जैसे ..मैं तापसी हूँ भास्कर ....किरणों का ताप... तमसा के स्याह अंधेरों में मैं उन्हें खोने न दूँगी... वो देखो तूफान आने वाला है.... विध्वंस की आँधियाँ चलने लगी है .....ठहरो भास्कर... नीचे हैवानियत की गहरी खाई है ..वे.. वे तुम्हें धक्का दे देंगें.....और भी बहुत कुछ.. स्मरण ..नहीं रहा।... तापसी क्या तुम ...कोई बुरा ख्वाब देख रही थीं ।"पूछा भास्कर ने, दृष्टि में अनुराग सा थ, तापसी को उसकी मीठी दृष्टि से सांत्वना मिली पर वह सुनती रही और अनुभव करती रही उसकी छटपटाहट को।

उसनें चाहा, वह खोलदे मन की ग्रंथियाँ भास्कर के सामने, पर गले में कुछ अटक सा गया। भास्कर कह रहा था,"मैं बहुत नर्वस हो गया था।" तापसी ने अन्वेषक की भाँति उसे देखा और फिर पलकें बन्द करली, मानों स्वयं में आत्म-साहस एकित्र कर रही हो। इसी प्रयास में यकायक फिरसे सुबह का उन लोगो का वार्तालाप उसके मस्तिष्क में उभर आया।

भास्कर " बाँध-निर्माण-परियोजना-विभाग मे चीफ इन्जीनियर था। अपने आफिस को उसने कभी अपने घर से नहीं जोड़ा था, किन्तु आजकल विदेशी से लगने वाले कुछ अजनबी लोग उसके घर पर मिलने आने लगे थे विशेष बात तो यह थी कि जब भी वे लोग आते तो उनके लौटने तक उसे तो क्या नौकरों तक को ड्राइंगरुम में जाने की मनाही थी इसी कारण उसके अन्दर की शंकालु नारी व्याकुल थी, रहस्यमयी प्रसंग के अपठित परिच्छेद को पढ़ने के लिये।

असमंजस के भरे मनोभावों के उद्वेगों को रोक पाना उसके लिये कठिन सा हो गया था। अपने ही घर में आज चोरों की भांति छिपकर तापसी ने उन लोगों की बातें सुनी।

"यह नीली फाईल उसके स्थान पर रखकर उस फाईल को उड़ा लेना।"आगन्तुक की आवाज में आदेश से अधिक धमकी थी। "जरा सोचो,.... करोड़ों रुपये की योजना विध्वंस के वीभत्स रक्तिम खेल में बदल जायेगी।"भास्कर आशंकित था।"हाँ यही तो हमारा लक्ष्य है ।" बड़ा ही घिनौना और अमानवीय .....।" भास्कर के स्वरमें घृणा घुली थी।"पर बेशकीमती .......तुम्हें भी तो इससे लाखों का फायदा होगा।" "नहीं चाहिए मुझे ऐसा फायदा "भास्कर ने चीखते से स्वर में स्पष्ट इन्कार किया

हूँ...ऊँ....ऊ ....उस अजनबी का स्वर यकायक हिसंक हो उठा----"क्या अपनी पत्नी को भी दाँव पर.......... ।"

"तापसी...।" भास्कर का तेज स्वर सुनकर एकाएक वह तिक्त स्मृतिसे बाहर निकाल गई। उसनें कातर दृष्टि से भास्कर का मुंह देखा, जो उसे कुछ हो जाने के डर से पीला पड़ गया था।

"तापसी, तुम्हे क्या कष्ट है,बत़ाओ न ...तुम्हारा यह मौन असह्य है..।" भावातिरेक से तापसी का कण्ठ अवरुद्ध सा हो गया किन्तु दूसरी ओर उसका रोम-रोम चीख रहा था," तूफनी रात के सैलाबी झंझावातों में मानवीय नौका के डूब जाने की दुराशा ही मेरा दुख है, भास्कर," तापसी ने पुन: बोलने के लिए सयत्न प्रयास किया पर वाणी के स्थान पर मन का ताप पिघलने लगा।

नहीं! नहीं!! तुम रो मत, तापसी ! तुम्हें मेरी सौगंध.... तुम नहीं जानती...तुम्हारे अचेतन क्षणों में मैने स्वयं को कितना अकेला और पंगु अनुभव किया है...तुम्हारी स्निग्ध मुस्कान के लिये मै अपने-आपको मिटा दूँगा।"

"विध्वंस नहीं, निर्माण की बात करो, भास्कर! " भास्कर के मुंह पर अपनी हथेली रखते हुए अचानक तापसी नेअपनी लम्बी चुप्पी तोड़ी।

"विध्वंस ?..कैसा विध्वंस ??........तुम्हारी दृष्टि में आज विचित्रता का सा भाव क्यों है.....और हाँ ,तापसी तुम्हारे सिर में यह चोट .केसे लगी???? "

एक साथ ढेर से प्रश्न थे भास्कर के, किसका प्रत्युत्तर दे ....और चोट सो तो वह स्वयं उसके कारण से अभी तक अनिभिज्ञ थी..शायद अन्तर्मन की छटपटाहट की ही यह परिणति कि चक्कर खाकर गिरी हो.....। खैर..... उसे भास्कर की उत्तेजित उद्वेलिता अपने प्रति प्यार की परिचायिका से सम्बल मिला और उसके टूटते विश्वास को बल उसे लगा अब अपने मनकी कह देनी चाहिये,.. तापसी ने भी प्रश्नों का अवलम्बन लिया- "मेरे जीवन के माध्यम से यह नरभक्षी तुम्हारी नैतिकता को कबतक खरीदते रहेंगे ?..कबतक चलता रहेगा फाईलों के बदलने का यह रक्तिम क्रम और तुम्हारी संकीर्ण स्वार्थपरता का यह घिनौना प्रयोग ??" भास्कर सहम गया, तापसी सबकुछ जान गई है। वह भी रुकी नहीं, एक पैना दृष्टिपात करते हुए उसका प्रश्नप्रवाह कुछ और तेज हो गया।

"ठगी और तस्करी से भी निम्नतर .... अंधेरे सन्नाटे में कराहते कफनों का आहत क्रन्दन..... मानवता के इस रुदन में भास्कर के अस्तित्व का क्या होगा? तुम्हारे इस सुन्दर स्वस्थ सुडौल आकर्षक व्यक्तित्व में छिपे भीरु और दुर्बल मानव को शायद मैं पहले समझ सकती।" भास्कर के प्रति ताडना का पुट तापसी में और गहरा हो चला, कुछ थमकर थोड़े धीमे सुर में बोली- "भास्कर ! ये विषैलेनाग हमारी पीढ़ियों में दासता का विष भर देंंगेंं, हमारे-तुम्हारे आने वाले कलको गहन कालिमा से रंग देंगे, मेरा अपना न सही अतीत और वर्तमान का न सही,आने वाले कल का सौदा इन कफन के सौदागरों से मत करो।

ये तेरा-मेरा नन्हा सा अहं-प्रश्न मिट जाने दो सन्ततियों के निमित्त। यूं भी विध्वंस के बाद व्यास नदी की रक्तिम जल कड़वाग्नि हमारी किसी की भी प्यास न बुझा सकेगी और हम सभी अपनी प्यास में मिट जायेंगे।"एक भरपूर दृष्टि सम्मोहित से बैठे भास्कर की ओर डाली और कहा,"मत भूलें भास्कर, जिन व्यापारियों की पाशविकता से भयभीत तुमनें अपनी तापसी की जिन्दगी बन्धक बना रखी है, उनकी नियति कल तुम्हारी तापसी को भी अस्पृश्य नहीं छोड़ेगी और तब तुम्हारी तापसी का भी सौदा होगा ...फिर यह बिका इन्सान अपनी तापसी की रक्षा कैसे कर पायेगा? .... ?...एक पराजित युधिष्ठर की तरह बेबस, लाचार अपनी द्रोपदी का चीर-हरण देखता रह जायेगा....... और दुर्योधन से भी क्रूर विश्वविलासियों की सभा में भारत की तापसी निर्वस्त्र कर दी जायेगी....

"बसकरो, तापसी ! ...बस अब बस...।"वह चीखा, तापसी का व्यंग तीक्ष्ण बाण सा उसे बींध रहा था ,पर वह रुकी नहीं, जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं-यह तो केवल मेरी आवाज है, जब असंख्य नर-कंकालों की अवश, आवरणहीन तापसियाँ शमशान के अंधेरे में कफन के टुकडों को भी न पा सकेगी........? उसके प्रश्न आर्द और बोझिल हो गये, वाणी अवरुद्ध. ......खुश्क कुछ खरकरे रुंघे गले से निकलती रुआँसी आवाज को सयंत सा करती हुई बोली,"विध्वंस के रेखाचित्र के इस खोखलेपन से घबरा रहे हो,भास्कर ! इनमें जरा वीभत्सता के रंग भरकर तो देखो कुरुप, लुंजपुंज, अपाहिज तापसियाँ तुम्हारी स्मृतियों में उभर आयेगी और फिर सौन्दर्यप्रियता का कौन सा प्रेरणास्रोत्र रहेगा।"

"चुप हो जाओ तापसी ।" इसबार भरपूर शक्ति से वह चीखा, अब उसकी सहनशीलता की सभी सीमाएं टूट गयी थी। 'तुम्हारे मानस पर मेरा यह घृणित रुप...?भास्कर छटपटा उठा।
"काश ! ऐसा न होता ।" तापसी के स्वर में वेदना भरी थी।

"ऐसा नहीं होगा ।" दृढता से भास्कर बोला

क्या ...? तापसी पुलक कर बोली, संकल्प से भरा भास्कर का प्रत्युत्तर उसे सुखद आश्चर्य से भर गया।

"हाँ ,तापसी !..... पर तुम्हें इसके लिए आहूति देनी होगी.. बोलो स्वीकार है ।"

हाँ.. हाँ ... मुझे क्या करना होगा... मैं हर बलिदान के लिये सहर्ष तैयार हूँ ।"तापसी की आवाज में उत्साह उछाले ले रहा था।

"अधिक कुछ नहीं, तुम्हें आहूति देनी ह़ोगी ,मेरी...... और अपने सुख, अपने प्यार, अपनी कामनाओं और अभिलाषाओं की....... वे मुझे मार भी सकते हैं.......।"भय विहीन दृष्टि से भास्कर ने तापसी की ओर देखते हुए कहा। तापसी के होठ जरा काँपे पर चेहरे पर वही अड़िगता थी, ठीक पहले जैसी...। वह देखता रहा उस लावण्यमयी को जो थी उसकी प्रिय पत्नी।

"वैसे भी, तापसी ! मान्यता और सिद्धांत हीन व्यक्तित्व, प्रभावहीन, निस्तेज, जड़ता मृतक की स्थिति से भिन्न नही ....मैं तुम्हारी उपेक्षा के खण्डहरों में अभिशप्त आत्मा के सदृश जीवित रहना नहीं चाहता.... । मरकर तुम्हारी भावनाओं में जी तो सकूंगा।" भास्कर का स्वर भीज रहा था," पिछले दो माह से मैं आत्म-दोलन की नारकीय पीड़ा को भोग रहा हूँ, तुम्हारे जीवन के बन्धक रखें जाने के बाद भी आशंका और भयावह कल्पनाओं से मैं हमेशा आतंकित रहता था। मानसिक दुर्बलता ने मेरा मनोबल तोड़कर मुझे बना दिया था भीरु,कायर और नपुंसक, मैं अपने विरुद्ध जी रहा था, जीकर भी तो मृत्यु सी यातना के बीच तुम्हारे मोह के नाम पर,..मेरा निर्माणक व्यक्तित्व विध्वंसक के हाथ बिक गया था....... वह रुका क्षणभर को,एक लम्बी श्वांस ली।

"तुम्हारा स्वर भीग रहा है, भास्कर! तापसी की संवेदना फूट पड़ी। "

"यह मेरे मन का क्षारता है जो बाहर उफन रही है, अब मुझे मत टोको, मैं दुराव की रेखा मिटा देना चाहता हूँ।" वह उत्तेजित होकर बोला, आवाज में भावुकता थी और संकल्प का ठहराव भी ।

" तुम्हारा ही तो प्रश्न था, तापसी, अब वह प्रमेय सुलझ गई है। तुम्हारे आत्मबल ने मुझे आन्तरिक यंत्रणा से मुक्ति देदी है, तुम जितनी सुन्दर हो उतनी ही विलक्षण भी।"सत्यम् शिवम् सुन्दरम् " स्वरूप तापसी को अंंधेंरे अब कभी न छू सकेंगे .... तुम निश्चित रहो, मैं अब बिकूँगा नहीं।"

अब तापसी सन्तुष्ट थी, भास्कर का आत्म साहस लैटते देखकर, उसने भास्कर के शब्दों में संकल्प के ठोसपन का सुखद अनुभव किया।
"मैं जा रहा हूँ डी. आई. जी के पास।"

दूर तक देखती रही तापसी, भास्कर जा रहा था ....ऊँचा ,लम्बा और विशाल ...भास्कर ....,वह मंत्रमुग्ध और आश्वस्त थी..... बार -बार जैसे भास्कर का संकल्प उसके कानों में कह रहा था ........मैं बिकूँगा नहीं .............मैं बिकूँगा नहीं ................मैं अब बिकूँगा नहीं.....

डा. राजेश रस्तोगी

Image Source: amazingindiablog



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