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@dawriter

महकती हिना -१

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hema by  
hema

पराग की चहकती हुई आवाज़ से चुलबुलापन गायब था और आँखों से शैतानी…. अल्हड़, बिंदास, लहरों सा लहराता, बेफ़िक्र, बेपरवाह और अलमस्त ख़ुदा आज बड़े अदब, एहतियात, सजदे में झुके, ख़ैर माँगते हुए बन्दे में बदल गया…. यह क्या हो गया ? हिना चुपचाप यह सब हैरत से देख रही थी…कि यकायक पराग ने सवाल सामने रखा, “मुझसे शादी करोगी, हिना?” “क्या?..!!.. ओह! अब समझ आया..मैं जिसके रंग में सालों से रंगी हूँ, आज वो मेरे रंग में रंग गया है… वाह री कुदरत! मैं अपना रंग भुला कर बस पराग-रंग हो जाना चाहती थी पर तूने मेरा रंग भी गायब न होने दिया… बस दो रंगों का ठिकाना बदल दिया….” हिना ख़ामोशी से खुद में यह कह रही थी और उसके होंठों पर हल्की सी हँसी दौड़ गयी…शायद अपने रंग को इतने खूबसूरत ठिकाने पर देखकर या फिर सालों बाद अपने रंग से दोबारा मिलकर ! पराग को उस हल्की हँसी से थोड़ी हिम्मत और थोड़ी आस मिली और वो हिना की आँखों में ऑंखें डालकर आँखों ही आँखों में जवाब की ज़िद्द करने लगा…. हिना ने धीरे से कहा, “पहले शुक्रियादा करो” और हँस दी….. कैसा होता है ना प्यार में!! राधा कान्हा बन जाती है और श्याम राधिका…. आज भी वही हो रहा है… पराग हिना हो गया और हिना पराग…. वरना हिना में कब यह शरारती अदा थी…यह तो पराग का अंदाज़ था…..हिना की आँखें बोल रही थी, “तुम्हें अदब सिखा दिया, शुक्रिया नहीं करोगे”…..पराग चहका, “शुक्रिया कर दूँ तो क्या तुम हाँ कर दोगी ?” हिना ने इतराकर कहा, “सोचूँगी”…. पराग ने झटपट शुक्रिया कहा और हिना सोच में डूब गयी…..

वो प्रेम-बावरी, पराग-नशे में गहरी उतरती सोच रही थी “यह पराग ने आज कौन सा नशा किया है जो यह पूछा…भला यह भी कोई पूछने की बात थी! हिना को तो सालों से पराग के सिवा कुछ न सूझता है…पास हो या दूर हो हिना पराग के सुरूर में चूर रहती है.. पराग जो हिना से जबरन भी शादी की कोशिश करता तो हिना ख़ुद को समेटे उसकी बाँहों में सिमट जाती…..पराग-नशे में तो हिना किसी को भी शर्मिंदा कर जाये फिर यह जबरदस्ती तो कोई जबरदस्ती भी नहीं होती….शायद हिना की बेपनाह मोहब्बत ने उसकी ख़ुदी को इतना बुलंद कर दिया कि ख़ुदा ख़ुद उससे पूछ रहा है.. बंदी, बोल तेरी रज़ा क्या है?” धत्त! अपने इश्क़ पर इतना गुमां! अरे, यह मेरा ख़ुदा ख़ुद ही अपने रुतबे से बेख़बर है….इसमें भी ख़तावार मैं ही हूँ…मजबूरी थी जो कभी तुम्हें एहसास ही न होने दिया कि तुम्हें एक झलक देख लेने से मेर जन्मों का हज हो जाता है, तुम्हारा नाम मेरी इबादत है… जब मैं तुम्हारे सामने होती हूँ तो तुम्हारे क़रीब होती हूँ और जब हमारे दरमियाँ दूरियां होती हैं तो मैं मिट जाती हूँ बस “पराग” रह जाता है… तुम्हारी नवाज़िश पर इस क़दर यकीन था कि मेरी हर जुर्रत, हर क़ुसूर को माफ़ी मिलेगी….फिर भले ही वो ख़ता तुमसे इतना कुछ छुपाकर रखने की हो….



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