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@dawriter

पश्चाताप की ज्वाला पार्ट-2

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sunita by  
sunita

…“ मम्मा पापा कब वापस आयेगे ...अपने खिलौने फैला रिन्कू ने माँ से पूछा,“ क्यो ? यह खिलौने क्यों फैलाये तुमने …”

जीया ने रिन्कू को डाँटा।

“इसमें एक भी बड़ी वाली गुड़िया नही है मुझे भी बड़ी गुड़िया चाहिए। पापा को लैटर लिखों बोलो मेरे लिए बहुत बड़ी गुड़िया लाये जिसे मै नहलाऊंगी। जैसे मौसी नहलाती है अपने बेबी को मै बिलकुल वैसे ही नहलाऊंगी ,” रिन्कू ने अपनी रौ में जवाब दिया लेकिन माँ सोच में पड गयी  ! तो यह अपनी मौसी की देखा देखी नकल कर रही है मौसी का असर बच्चों पर पड रहा है। यह जीया से अनदेखा न हुआ वह समझ गयी। अब तो रिन्कू को समझा भी नही सकती क्योकि वह एक नम्बर की जिद्दी लड़की थी , छोटी थी इसलिए जीया ने फिर भी कोशिश की , “ अच्छे बच्चे जिद नही करते। ”

रिन्कू चीखने लगी, “ मुझे बड़ी वाली डॉल चाहिए बस पापा को अभी लेटर लिखों मेरे लिए डॉल लेकर आये ”और नाराज़ हो मौसी के कमरे में चली गयी जीया उसको बुलाती रही वह नही आयी छोटे बच्चें के साथ खेलने लगी। जीया उसे कैसे समझा़ये कि  उसके पापा विदेश गये है। जहाँ से वापस आने में अभी बहुत समय बाकी है, जीया का मन वैसे भी नही लग रहा था वह पहली बार पति से दूर हुई है छोटी बहन को अब फुर्सत ही कहाँ है कि वह जो उसकी परवाह करे जबसे दीपक यहाँ रहने उसके तो रंग ढंग ही बदल गये माँ पिताजी भी उसी के रंग में रंगते जा रहे थे। क्यो न हो , था तो वह  छोटा दमाद ! अपनी कोई कसर न छोड़ता ससुर के इर्द गिर्द ही नाचता रहता जब से उसके पति व बड़ा दमाद काम के सिलसिले में विदेश चले गये रीया व माँ बड़े खुश रहते नये दमाद दीपक की आवभगत में कोई कमी न रहती।

पिताजी ही हालचाल पूछते माँ को तो उसकी परवाह ही नही रही बच्चे साथ थे फिर भी अकेलापन काटने को दौडता। नन्नू चिडचिडा हो रहा था , मौसा को देखता तो अपने पिता को और अधिक याद करता जबसे रीया व उसका पति यहाँ आकर रहने लगे थे  तब से जीया के बच्चे खुद को अकेला पाते लेकिन उनके नाना इस बात को भलि भाँति समझते थे , वह कोशिश करते दोनो बेटियों के परिवारों में तालमेल बैठाने की किन्तु बड़े दामाद के बाहर जाने से बच्चों का मन  नही लगता ..वह कहते थोड़े दिन की ही तो बात है जब उनका बड़ा दामाद वापस आ जायेगा तो पूरा परिवार भैरों बाबा पर माथा टिकाने जायेगा जिनकों वह बहुत मानते थे उन्ही की कृपा से दो नाती मिले …. अब तो नाना -नानी  बच्चों के साथ समय बिताते। कारोबार व बाहरी कामों की बागडोर दीपक के हाथों में आ चुकी थी।

अपने घर शहर वापस लौटने का वह नाम भी न  लेता उस पर रीया कहती फिरती….. “ जीजा जी के घर में न होने से उसके पति दीपक ने परिवार की जिम्मेदारी अच्छे से संभाल ली है। ” माँ को कहती,  “ क्यो न उसे व दीपक को भी हमेशा के लिए यही रख लिया जाये जैसे दीदी-जीजाजी व उनके बच्चों को इसी घर में रखा हुआ है शादी के बाद से दीदी तो अपने ससुराल मेहमानों की तरह जाती है उल्टे वही लोग यहाँ आते है। ”

जीया सारी बातें सुन के भी अनसुना करती रही यही सोच यह अभी समझदार नही है शायद रीया को याद नही  उसके शादी के बाद से ही पति को पिता ने दमाद नही बेटा बना कर अपने पास रखा था।

…….

जीया की तबियत बहुत खराब थी उस दिन , सभी उसके ईर्द गिर्द थे रीया भी बड़ी बहन की देखरेख में जुटी थी। रिन्कू भी अपनी माँ के पास थी माँ की आँखे खुल ही नही थी। डॉ0ने वी.पी लो बताया साथ ही बुखार से जीया का पूरा शरीर अकडा हुआ था बच्चे परेशान थे ...रिन्कू रोने लगी, “ अब कभी बड़ी वाली गुड़िया नही माँगुगी  भैया पापा को कर लेटर लिख मम्मा की तबियत खराब उनसे कहना जल्द आ जाना चाहे गुड़िया भी न लाना पर जल्द आना मै भी  गुस्सा नही करूंगी। ” मौसी समझाती है, “ तुम्हारी मम्मा ठीक हो जायेगी। ”

जीया की तबियत बिगड रही थी तो दीपक सलाह देता है मेरे शहर अच्छे व बड़े बड़े डॉ0 है दीदी को वही दिखला देते है यहाँ के डॉक्टरों के इलाज से कुछ फायदा नही हो रहा । पिताजी मना करते है लेकिन माँ अनुमति दे देती है , जीया ,

रीया, दीपक रिन्कू नन्नू व छोटा बच्चा सभी जीया के इलाज के लिए रवाना हो जाते है। पिताजी ने इसके लिए दीपक को बहुत बड़ी रकम दी ताकि जीया के इलाज में किसी तरह की रूकावट न आये।

रीया काफी दिनों बाद अपने ससुराल के घर में पंहुची रीया को सब समेटना पडा। घर गन्दा था व बन्द था क्योकि वहाँ कोई न था सभी वहाँ से जा चुके थे रीया दीपक से पूछती है तुम्हारे भैया भाभी कहँ गये तो वह टाल देता है कहता वह नये मकान में शिफ्ट हो गये है।

अगले दिन दीपक जीया को एक प्राईवेट डॉ0 के पास ले जाता है।

वह जीया का मुआयना कर कहता है इन्हे कोई बीमारी नही है बस मानसिक तनाव है जिस वजह से इनकी यह हालत है इन्हे किसी भी तरह का तनाव न दे साथ ही वह कुछ दवायें भी लिखता है कहता यदि  आराम न हो तो वह दुबारा आ सकते है।

रीया अपनी बहन की पूरी देखभाल करती है वह थोड़े ही समय में बिलकुल ठीक हो जाती है रीया अब दीपक का अहसान मानने लगी कि उसकी वजह से दीदी की तबियत ठीक हो गयी।

जीया की तबियत संभलनी लगी तो सभी घर वापस आ गये।

जिस व्यक्ति को कोई पंसद नही करते था वह एकदम से हीरो बन गया जीया के बच्चे भी मौसा मौसा करते उसके आगे पीछे घुमते परिवार में वह रोल मॉडल बन चुका था वजह जीया की इलाज उसने अच्छे से कराया , पिताजी भी उस पर निर्भर रहने लगे  नन्नू भी मौसा मौसा करता पिता के अभाव की पूर्ति कर रहा था। उसके इन सभी कोशिशों के पीछे कितना बड़ा फरेब था नियति देख रही थी..

बुढे हो चले नाना को को उस पर इतबार करना ही होता लेकिन न जाने क्यों कुछ था जो उन्हे खटक रहा था। दीपक अब पूरी तरह परिवार का हिस्सा बन चुका था जीया के बच्चों को अपनी रिश्तेदारी में घुमाता जो नही करने चाहिए वही  जान बूझ कर गलत काम करना सिखाते बच्चों कों नन्नू गन्दी-गन्दी किताबें पढता ...रिन्कू मौसी की तरह बनती  जा रही थी।

जीया यह सब देख घुट रही थी लेकिन कमजोर शरीर और पति की अनुस्पथिति ने उसे तोड कर रख दिया अभी उसे वापस आने में समय था पत्र व फोन से वह सबके हाल चाल पूछते रहते।

वक्त अपनी रफ्तार से दौड रहा था दीपक नये शहर में खुद को अच्छे स्थापित कर चुका था अपना खुद का काम भी वही जमा लिया।  

जब बड़ा दामाद विदेश से वापस घर पंहुच गया

बच्चे बहुत खुश हुए जीया भी काफी खुश थी आखिर इतने दिनों के बाद उसका पति वापस आया, लेकिन रीया व दीपक के माथे के बल साफ नजर आ रहे थे जिसे पिताजी की बूढी अनुभवी ने साफ पहचान लि़या। वह बहुत खुश थे उनका दामाद या बेटा आ चुका था।

पापा मेरे लिए क्या लाये रिन्कू दौड कर पापा के गले लग गयी अभी बताता हूं सबने घेर लिया सबके चेहरे पर हंसी थी ….रीया अपने बच्चे के साथ एक कोने में खड़ी थी ...दीपक कही घुमने निकल गया पिताजी का चेहरा देखने लायक था इतने दिन उन्होने अपने प्रिय के अभाव में कैसे बिताये वही जानते थे वह प्रसन्न थे  “ अरे कालू कहां मर गया ” ! नौकर को आवाज लगाने लगे , … “ जा पूरे मौहल्ले में लड्डू बाँट आ मेरा बेटा घर आया है इतने दिनों बाद ”!

पापा ने नन्नू को अपने पास बुलाया  पछा, “ तुमने पढाई की न ढंग से ?” ‘हां पापा ’ उसने सर झुका लिया !

“ रिन्कू यह लो तुम्हारी बड़ी वाली गुड़िया !”

“ओह ! यह तो बहुत बड़ी है बिल्कुल मौसी के बेबी जैसी अब मै इसको रोज नहलाऊंगी” !

“नानी  , मौसी हंसने लगे फिर माँ जीया से जा लिपटी  “ मम्मा तुमने मेरे लिए गुड़िया मंगवा दी पापा को लैटर में लिखा मेरी प्यारी मम्मा तुम बहुत अच्छी हो!”

फिर अपनी डॉल से खेलने लगी। “ अरे रीया तुम वहाँ क्यो खड़ी यहाँ आओ यह देखों मुन्ना के लिए  !” फिर उन्होने बहुत से कपड़े खिलौने के पैकेट रीया को पकडा दिये। “ माँ , पिताजी यह तुम्हारे लिए !”, “ इसकी क्या जरूरत थी दामाद जी ”

“जो मुझे समझ आया,  मै ले आया समय का अभाव था , कुछ समय बाद फिर जाना होगा वहाँ एक ओर नया प्रोजेक्ट शुरू होगा। ”

जीया की तरफ देखा फिर उसका हाथ पकड कमरे में ले गये,  “तुम्हारी तबियत ठीक है मै तुम्हे अपने साथ ले जाऊंगा अबकी बार ” , “ मै ठीक हूं ” जीया मुस्कुरा दी उस मुस्कान में दर्द था।

बड़े दामाद के विदेश से वापस आने के बाद घर में उत्सव का माहौल था ...उनके बाहर जाते ही परिवार में बहुत बदलाव आ चुका था जिसे वह महसुस कर रहे थे।

रीया का बच्चा बोलना सीख रहा था बड़े मौसा उसे बहुत प्यार करते समय मिलने पर उसके साथ खेलते व घुमाते वह उनका लाडला बन चुका था  , वही नन्नू उनका खुद का बेटा पढाई में निरन्तर पिछड रहा था छोटे मौसा-मौसी ने नन्नू और रिन्कू को अपने प्रभाव में लिया हुआ था दोनो बच्चे पिता के पास कम व छोटे मौसा के साथ अधिक समय बिताते  थे।

जीया छोटी बहन का पति होने के कारण कुछ कह न पाती उस पर मां को वही पंसद था ! मां के आस-पास रहने की कोशिश करता। सासुमां खुश रहती उससे जबकि ससुर को बड़ा दामाद ही प्रिय था उसके आने के बाद जब दोनो ने कामकाज की खबर ली तो उसकी कारगुजारियां सामने आयी। बाजार में अपना काम जमाने के लिए बहुत से लोगो से कर्ज लिया था जो लोग उनके विरूद्ध रहते थे। वह सब समझ रहे थे पर बेटी नाती और पत्नी ने बेबस बना दिया कि वह चाह के भी कुछ न कर पाते ...एक बार पत्नी को बताने की कोशिश की तो उसने बड़े की तरफदारी व छोटे को स्वीकार न करने का लांछन लगा दिया पति पर ! निपट गंवार स्त्री उसकी धूर्तता को भी नही देख पा रही थी बस अपनी छोटी बेटी-दामाद के प्यार में अंधी बनी रही।

जीया को कभी -कभी पश्चाताप होता कि  उसने छोटी बहन व उसके परिवार को अपने घर में रख कही गलत तो नही कर दिया।

##

जारी है 

शेष कहानी  ...पश्चाताप की ज्वाला पार्ट-3 

Part I- पश्चाताप की ज्वाला

पश्चाताप की ज्वाला -3

सुनीता शर्मा खत्री©



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