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@dawriter

परछाईं

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अक्टूबर 2015
शाम का समय था, 5 - 6 के बीच का समय रहा होगा। मैं अपने दोस्त विप्लव के साथ दीघा घाट  के नीचे सिगरेट पी रहा था। तभी मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया। मैसेज मेरे यूनिवर्सिटी “नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी” से था। मैसेज में कॉउंसलिंग क्लास के बारे में जानकरी दी गयी थी। मैंने मैसेज पढ़ कर मोबाइल को अपनी जेब में रख लिया।
.........
किसका मैसेज था ? - विप्लव ने सिगरेट के अंतिम छोर को अपने पैरों से रगड़ते हुए मुझसे सवाल किया।
नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के तरफ से था। कल से “जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन” के सेकंड ईयर की कॉउंसलिंग क्लासेज शुरू हो रही है - मैंने विप्लव को मैसेज के बारे में बता दिया।
अरे हाँ अरुणेश तू तो पत्रकारिता कर रहा है न ओपन यूनिवर्सिटी से। मेडिकल छोड़ने के बाद एक साल यूँही बैठे रहे तुम, उसके बाद तुमने इसमें नाम लिखवाया था ना - विप्लव ने कहा।
हाँ यार, फर्स्ट ईयर तो पास कर गए थे बिना कॉउंसलिंग क्लास के।  देखो इस बार क्या होता है - मैंने मुँह बनाते हुए कहा।
भाई तो तुम जाते क्यों नहीं कॉउंसलिंग क्लास में ? वहाँ जाओगे तो कुछ तो सीखोगे ही। जनरल कम्पटीशन की तैयारी कर रहा है वह ठीक है। लेकिन साथ में कुछ अलग भी करना चाहिए। यह जरूरी थोड़े ही है कि तुम्हारे लिए सरकारी नौकरी रखी हुई हो ? क्या पता तुम क्लासेज के लिए जाओ तो कोई नया रास्ता खुल जाए तुम्हारे लिए। वैसे कितने दिन का कॉउंसलिंग क्लास है ? - विप्लव ने सवाल किया।
चार दिन, रोज़ चार घण्टे - मैंने कहा।
अरे भाई केवल चार दिन की ही बात है तो क्यों नहीं जाते हो। बिल्कुल जाओ - विप्लव ने कहा।
पर विप्लव मुझे यह नहीं पता है कि कॉउंसलिंग क्लास में होता क्या है ? - मैंने कहा।
अरे कॉउंसलिंग क्लास का मतलब होता परामर्श कक्षाएं। इसमें  जो भी टीचर आए, तुम उनसे अपने कोर्स से जुड़े सवाल या समस्याओं के बारे में बात कर सकते हो - विप्लव ने मुझे समझाते हुए कहा।
लेकिन मैंने अभी तक अपनी किताबों को एकबार भी खोल के नहीं देखा है, तो सवाल क्या करेंगे ? - मैंने अपनी परेशानी विप्लव को बताया।
अबे इतना मत सोचो और चुप- चाप कल चले जाओ। क्या पता कुछ अच्छा हो जाए। कहानी और उपन्यास तो तुम लिख ही रहे हो, पत्रकारिता में भी शायद लिखना - पढ़ना होता है - विप्लव के पास पत्रकारिता की जितनी जानकारी थी उसने मुझे दे दी।
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दूसरे दिन सुबह सात बजे घर से निकल गया। होनॉर्स की दोनों किताबें बैग में रख चुका था। आठ बजे से क्लास शुरू होने वाली थी।
बिस्कोउमान भवन, तीसरा तल्ला।
नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी, बिस्कोउमान भवन में दूसरे और तीसरे तल्ला पर स्थित है। दूसरे तल्ले पर एडमिनिस्ट्रेटिव आफिस और तीसरे तल्ले पर क्लास और एग्जाम लेने के लिए बनाए गए सोलह कमरे।
ऊपर जा कर देखा तो कुछ स्टूडेंट्स दिखाई दिए। सब कॉउंसलिंग क्लास के लिए ही आए हुए थे। सात बज के पचास मिनट पर तीसरे तल्ले का गेट खुला। नोटिस बोर्ड पर देख कर पता चला कि पत्रकारिता के दूसरे वर्ष की कॉउंसलिंग क्लास रूम नंबर 4 में होने वाली थी। मैं रूम नंबर 4 में जा कर बैठ गया।
कुछ देर बाद मेरे अलावा उस कमरे में बारह लोग और थे। तीन लड़कियां और दस लड़के। थोड़ी देर बाद एक सर आए, उनका नाम अजय कुमार था, प्रभात ख़बर पटना संस्करण के चीफ रिपोर्टर थे। उन्होंने बताया कि वह दो घण्टे का क्लास लेंगे, उसके बाद दूसरे होनॉर्स पेपर का क्लास लेने दूसरे सर आएंगे।
पहले होनॉर्स पेपर का नाम था “रिपोर्टिंग एंड एडिटिंग”। क्लास शुरू होने से पहले सबने अपना-अपना परिचय सर को दिया। उसके बाद सर ने हम सब से पूछा कि कोई सवाल हो तो पूछो किताब से। पर किसी भी स्टूडेंट ने सवाल नहीं किया, ऐसा लग रहा था सब मानो मेरे जैसे थे। कोई कुछ भी पढ़ के नहीं आया था। सर ने कहा चार महीने बाद तुम सब के एग्जाम शुरू होने वाले हैं और तुम सब अभी तक किताब तक खोल के नहीं देखे हो। खैर छोड़ो, लाओ मैं ही कुछ बेसिक चीज़े तुम सब को बता देता हूँ। दो घण्टे तक पता नहीं सर क्या - क्या पढ़ाते रहे ? क्लास खत्म होने के बाद उन्होंने अपना नंबर बोर्ड पर लिखा। जाते समय उन्होंने कहा कि जिन सब को मीडिया के क्षेत्र में आगे बढ़ना है वह मेरे कांटेक्ट में रहे। अगर आपमें से किसी को  कुछ भी पूछना हो या कोई खबर हो तो आप सब मेरे नंबर पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।
अभी दो घण्टे का क्लास बचा हुआ था। दूसरा क्लास लेने संजय मिश्रा नाम के शिक्षक का आगमन हुआ।  उनका विषय था “कंप्यूटर एंड मास कम्युनिकेशन”। पहले वाले विषय की तरह इस विषय में भी कोई पढ़ के नहीं आया था।  इस कारण इस क्लास में भी संजय सर ने पत्रकारिता की मूल तत्व के बारे में बात करना उचित समझा। क्लास के अतं में  सभी का व्हाट्सएप्प नंबर लेकर सर ने एक “BJMC NOU” के नाम से ग्रुप बना दिए, ताकि सब उस ग्रुप के जरिए सब एक जगह जुड़े रहे। क्लास से निकलते वक्त सर ने बताया की वह भारतीय संवाद केंद्र के संपादक है। हर शनिवार को उनके कार्यालय में शाम तीन बजे से प्रोजेक्टर पर अच्छी - अच्छी फ़िल्मो का प्रसारण होता है। तो जो भी इच्छुक है वह हर शनिवार को फ़िल्म देखने के लिए आ सकते हैं। फ़िल्म देखने का कोई टिकट नहीं लगता है, बल्कि संवाद केंद्र की तरफ से आगंतुकों के लिए चाय बिस्कुट की व्यवस्था रखी जाती है।
दोनों क्लास खत्म हो चुका था। कुछ लड़के - लड़कियों से बात हुई, अभिषेक, राकेश, अवंतिका जी ... और एक - दो जन। कुछ लोग पहले से मीडिया में कार्यरत थे, कुछ पहली बार इस लाइन में आ रहे थे।
चार दिन कैसे खत्म हो गया पता नहीं चला। सब से अच्छी जान - पहचान हो चुकी थी। संजय सर के बनाएं गए व्हाट्सएप्प ग्रुप में अब सब एक दूसरे से जुड़ रहे थे। मैं हर शनिवार भारतीय संवाद केंद्र फ़िल्म देखने के लिए जा रहा था। हर शनिवार जाने से संजय सर और संवाद केंद्र आने वाले बाकी लोगों से जान - पहचान बढ़ने लगी। एक दिन सर ने कहा, आप हर शनिवार को फ़िल्म देखने आते है तो फ़िल्म देखने के बाद उसकी समीक्षा लिखने की कोशिश किया कीजिए। जब तक लिखने की आदत नहीं डालिएगा, पत्रकारिता में कोई स्कोप नहीं बनेगा।
सर की बात मान कर मैं हर शनिवार फ़िल्मो की समीक्षा लिखने लगा।
इधर हमारे व्हाट्सएप्प ग्रुप में पाँच और नए लोग आ चुके थे।  दो लड़की औऱ तीन लड़के वह सभी भी नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता के द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी थे। अब तो हर रोज़ ग्रुप में किसी - न - किसी बात पर चर्चा, बहस सब होने लगा था। संजय सर रात को ग्रुप का सारा चैट पढ़ते थे। वह ग्रुप में तभी मैसेज करते जब पत्रकारिता से जुड़ी कोई सूचना उन्हें देना रहता था।

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जनवरी 2016,
भारतीय संवाद केंद्र में हर साल जनवरी में 12 दिन की पत्रकारिता की कार्यशाला आयोजित की जाती है। इस साल भी कार्यशाला का आयोजन होने वाला था।
बारह दिन की पत्रकारिता कार्यशाला में मैने पत्रकारिता के गूढ़ बातों को जाना।

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मार्च के पहले सप्ताह से हमलोगों की पत्रकारिता के दूसरे वर्ष की परीक्षा शुरू होने वाली थी। व्हाट्सएप ग्रुप में रोज़ इस बात को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म था। पहले तीन परीक्षाओं की तारीख सभी के लिए एक सामान थी। बाकी के दो परीक्षाओं की तारीख अलग - अलग ( सब्सिडियरी पेपर के कारण )।
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पहली परीक्षा चार मार्च को थी। सुबह आठ बजे से परीक्षा शुरू होने वाली थी। ग्रुप के सभी लोग सात बजे ही पहुँच गए थे। सब एक दूसरे से मिले, हँसी मजाक का दौर चला। कुछ लोग तो पहली बार मिल रहे थे। खुशबू, श्वेता, प्रवीण जी, आशीष जी  और भी कुछ लोग। परीक्षा शुरू होने से पहले सभी लोगों ने मिल ग्रुप फ़ोटो लिया, और उसे अपने व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर कर दिया।
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शुरू के तीन एग्जाम खत्म हो चुके थे। अब केवल सब्सिडियरी पेपर की परीक्षाएं बची हुई थी। इसी बीच होली की छुट्टी थी। होली वाले दिन BJMC NOU वाले ग्रुप में होली मुबारक वाले मैसेज आ रहे थे। ग्रुप में बातचीत जारी था, तभी श्वेता ने अपनी फोटो बियर की कैन के साथ खींच के भेज दी। उसके बाद तो मानो ग्रुप में भूचाल आ गया। बिना देरी किए सभी लड़के श्वेता में दिलचस्पी लेने लगे। होली का दिन मान कर सभी मज़ाक करने लगे। लेकिन श्वेता के इस हरकत उसकी छवि दूसरों के सामने खराब हो चुकी थी।
सभी एग्जाम खत्म हो चुके थे। अब सिर्फ कंप्यूटर की प्रायोगिक परीक्षा बची हुई थी। परीक्षा होने से पहले प्रायोगिक कक्षाओं का आयोजन बिस्कोमॉन भवन के 16वें तल्ला पर किया गया। पाँच दिन का क्लास था, इन पाँच दिनों में श्वेता से मेरी अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। हम दोनों एक ही कास्ट ( जाती) के थे। बिहार में कास्ट एक बहुत बड़ा फैक्टर माना जाता है।
खैर क्लासेज खत्म हो चुके थे। अब प्रायोगिक परीक्षा का दिन था। दो घण्टे में एग्जाम हो चुका था। एग्जाम के बाद ग्रुप के सभी लोग हँसी मजाक कर रहे थे। सबको पता था इसके बाद सबसे मुलाकात या तो 3rd ईयर के एग्जाम के समय होगी या अगले साल एग्जाम में। सब ने एक दूसरे से वादा किया कि एग्जाम का रिजल्ट ग्रुप में शेयर नहीं करेंगे। फिर कुछ देर बाद सब चले गए।
मैं भी वहां से सीधे भारतीय संवाद केंद्र चला गया। शाम में 5 बजे के आसपास श्वेता का फ़ोन आया। वह गाँधी मैदान में थी। मैं भारतीय संवाद केंद्र से निकल सीधे गांधी मैदान की ओर चला गया।
यहाँ क्या कर रही है ? एग्जाम तो 12 बजे ही खत्म हो गया था - मैंने श्वेता से पूछा।
अरे मैं कल वापस मधुबनी जा रही हूँ, तो सोचा आज शाम घूम लेती हूँ। वैसे भी मेरे घरवाले मुझे जल्दी बाहर निकलने नहीं देते है।  पटना में तुम्हारे सिवा मैं किसी को जानती भी नहीं हूँ - श्वेता ने कहा।
ऐसा क्यों? - मैंने पूछा।
फिर कभी बताऊंगी। अभी कहीं चलो न घूमने- श्वेता ने कहा।
एन.आई.टी घाट चलो। गंगा किनारे चलते है- मैंने कहा।
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मैंने स्कूटी स्टार्ट कर के  श्वेता को पीछे बैठाया और निकल पड़ा पटना एन.आई.टी घाट। कुछ ही देर में हम दोनों एन. आई.टी घाट के पास थे। तकरीबन दो घण्टे हम दोनों वहाँ बैठे रहे। शाम हो चुकी थी। सूरज आधा डूब चुका था, आसमान अब नारंगी से गहरे नीले रंग में बदलना शुरू कर दिया था।
तभी श्वेता ने चलने को कहा। हम दोनों थोड़ी दूर आगे बढ़े ही थे, की सामने एक पान की गुमटी थी। वहाँ जा कर श्वेता रुक गयी।
क्या हुआ, यहाँ क्यों रुक गयी ? - मैंने श्वेता से पूछा।
अरुणेश मुझे सिगरेट पीना है- श्वेता ने कहा।
एक लड़की के मुँह से सिगरेट का नाम सुन कर मुझे थोड़ा अजीब  लगा। लेकिन बंगाल में तीन साल रहने के कारण यह चीज़ मेरे लिए सामान्य थी। लेकिन पटना में खुले में एक लड़की का सिगरेट पीना बहुत बड़ी बात थी।
एक गोल्ड फ्लैक किंग साइज - श्वेता ने कहा।
तुम क्या पियोगे अरुणेश?- श्वेता ने मुझसे पूछा।
वही गोल्ड फ्लैक किंग साइज - मैंने कहा।
उसके सिगरेट पीने के तरीके से बहुत कुछ समझ आ रहा था। हर कस को एकदम महसूस कर के पी रही थी।
सिगरेट पीने के बाद हमलोग वहां से निकल गए। उसको कुर्जी मोड़ पर छोड़ कर मैं अपने घर चला गया।
मैं अपनी कोई भी बात विप्लव से नहीं छुपाता हूँ, इसलिए मैंने उसको फ़ोन लगाया। उसे श्वेता के बारे में बताया। विप्लव ने कहा, “भाई ऐसी लड़कियों से दूर रहा करो, ऐसी लड़कियां शुरू में खुद दोस्ती करती है। बाद में रोज़ तुमसे ही सिगरेट और बाकी चीज़ों का पैसा मांगना शुरू कर देगी। मैं इस तरह की लड़कियों को अच्छे से जानता हूँ"।
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खैर विप्लव की बातों का मुझपर अधिक असर नहीं हुआ। पूरी रात मुझे नींद नहीं आयी। पूरी रात यही सोचने में लग गया कि क्या कारण रहा होगा कि श्वेता को सिगरेट की आदत लगी।
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श्वेता के बारे में जानने के लिए उत्सुकता बढ़ते जा रही थी। इसी उत्सुकता ने मुझे उसके अधिक करीब ला दिया था। अब रोज़ किसी न किसी मुद्दे पर व्हाट्सएप पर बात हो जाती थी। वह शब्दों में कम गालियों में अधिक बात करती थी। उसके बारे में सब कुछ जानने के लिए मैं बेचैन हो रहा था। मैंने ठान लिया था उसकी कहानी उसी के मुँह से सुननी है। इसी क्रम में एक बार रात में 2 बजे के लगभग, मैं व्हाट्सएप पर ऑनलाइन था। श्वेता भी ऑनलाइन थी, पर मैं उस वक़्त उससे बात नही कर रहा था। लेकिन तभी श्वेता ने अपना व्हाट्सएप स्टेटस लगाई.... “गोली नहीं मारेंगे उसे, उसकी कह के लेंगे”।
यह स्टेटस फ़िल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर 1 का बहुचर्चित संवाद है। गैंग्स ऑफ वासेपुर से मेरा एक अलग ही रिश्ता है। स्टेटस को देखकर मैंने उसे व्हाट्सएप पर मैसेज किया।
क्या श्वेता आज क्या मारी हो ?
रुक बताती हूँ।
कुछ ही देर में उसने एक फोटो सेंड किया। फ़ोटो डाऊनलोड कर के मैंने देखा। फ़ोटो देख कर मैं समझ गया कि ये क्या चीज़ है। फिर भी मैंने उससे पूछा क्या है ये?
अरे यार ये गाँजा है- श्वेता ने कहा।
ओह तो तुम ये भी पीती हो- मैंने अनजान बनते हुए पूछा।
हाँ पीती हूँ।
और क्या - क्या नशा करती हो? - मैंने श्वेता से पूछा।
सिगरेट, दारू, भांग, गाँजा, अफ़ीम, और भी बहुत कुछ जो मिल जाए, एक बार तो ब्रेड पर विक्स लगा के भी खाई हुई हूँ- श्वेता ने बताया।
यह सब सुन के मुझे डर लग रहा था। फिर भी हिम्मत कर के मैंने  पूछा - इतने अधिक मात्रा में नशा करने का क्या कारण है?

अभी मेरा मूड नहीं है बताने का, वैसे भी पूरा जॉइंट बचा हुआ है। जॉइंट पिये बिना मुझे नींद नहीं आती है - श्वेता ने कहा।

मैंने आगे उससे कुछ भी नहीं पूछा। मुझे उसकी बातें सुन कर डर लगने लगा था। तीन साल पहले जो मेरे साथ हुआ था वह सभी दृश्य दुबारा मेरे सामने घूमने लगे थे।

मैं उस रात काफी डर  गया।

मुझे श्वेता के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ चुकी थी। मैं जानना चाहता था आखिर ऐसी क्या बात है जो वह इतने अधिक मात्रा में नशे के गिरफ्त में है।

इन सभी चीज़ों की जानकारी सिर्फ एक इंसान से मिल सकती थी। वह थी खुद श्वेता। श्वेता के बारे में जानने के लिए मैं रोज़ उससे व्हाट्सएप पर बात करना शुरू कर दिया। इसी बातचीत के दौरान मैंने उसे बताया कि मैं भी गाँजा पीता हूँ। यह जानकर वह काफी खुश हुई।

कोई भी गाँजा पीने वाला इंसान यह जानकर बहुत खुश होता है कि सामने वाला भी गाँजा पीता हो। अब उसके मन में यह डालना था कि साथ में एक दिन गाँजा पिया जाए। इसके लिए मैं रोज़ उसे व्हाट्सएप पर मैसेज करता था कि पटना आ जाओ। मुझे पूरा विश्वास था श्वेता जल्दी ही पटना आएगी। मेरी सोच बिल्कुल सही थी। दो महीने के अंदर श्वेता पटना में थी।

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शाम में मिलने का तय हुआ। जगह पटना का वैकुण्ठ धाम यानी गुलबी घाट। गुलबी घाट के डोमन राजा के भतीजे राजा भगत के दुकान पर गाँजा, रिजला पेपर में डाल कर मिलता था।

शाम के 5:00 - 5:30 के बीच हम दोनों गुलबी घाट पहुँच चुके थे। मैं जा कर राजा भगत के दुकान से एक जॉइंट खरीद के ले आया। हम लोग गुलबी घाट के बगल वाले एन. आई. टी. घाट पर चले गए। एक लड़की को लेकर गुलबी घाट जाना उचित नहीं था ( वहां चौबीस घण्टे लाश जलते रहता है )।

श्वेता ने जॉइंट जलाया, दो कस लेने के बाद उसने जॉइंट को मेरी तरफ बढ़ा दिया। दो कस मैंने भी लिया, उसके बाद मैंने जॉइंट श्वेता की ओर बढ़ा दिया। दुबारा दो कस लेने के बाद श्वेता ने जॉइंट को मेरी ओर बढ़ाया। इस बार मैं जॉइंट लेने के स्थिति में भी नहीं था। गांजे ने अपना असर मेरे दिमाग पर शुरू कर दिया था। मेरी आँखें लाल और छोटी हुई जा रही थी। मैं अपनी आँखें खोलने में भी असमर्थ था। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल  रही थी। मुँह अंदर से सूख रहा था, प्यास लग रही थी। श्वेता एक बोतल पानी खरीद के लायी। मैं एक बार में ही आधा बोतल पानी पी लिया।

लगभग 40-45 मिनट के बाद मुझे होश आया। श्वेता नाराज़ लग रही थी। क्या हुआ? - मैंने पूछा।

तुमने झूठ क्यों बोला?- श्वेता ने कहा।

कैसा झूठ?

यही की तुम भी गाँजा पीते हो। अगर गाँजा पीने की आदत होती तो ऐसे बेहोश नहीं होते - श्वेता ने कहा।

श्वेता सही कह रही थी। मुझे इस नशे की आदत नहीं थी।

मैं सिर्फ तुम्हारी सच्चाई जानना चाह रहा था। मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसा क्या कारण था की तुम ये सब करती हो - मैंने श्वेता से कहा।

तुम पागल हो। मेरी कहानी जानने के लिए तुम इतना बड़ा रिस्क लेने के लिए तैयार क्यों हुए ? - श्वेता ने कहा।

ऐसा नहीं है कि मैंने कभी गाँजा नहीं पिया। एक जमाने में 24 घण्टे मैं गाँजा के नशे में रहता था। लेकिन तीन साल से इसको हाथ नहीं लगाया हूँ - मैंने कहा।

तुमने क्यों छोड़ा था ? - श्वेता ने सवाल किया।

मैं गाँजा, शराब, अफीम,सिगरेट, फॉर्ट्वीं की सुई सब लेता था। लेकिन तीन साल पहले मैंने आत्महत्या की कोशिश की थी। लेकिन मैं बच गया और उसके बाद इन सभी गलत आदतों को छोड़ दिया। उसके बाद संघर्ष को अपने जीवन का मकसद बनाया।

जिस दिन मुझे पता चला की तुम गाँजा, शराब, सिगरेट सब तरह का नशा करती हो। तब से  मैं ये जानने के लिए बेचैन हूँ कि ऐसा क्या कारण रहा होगा कि ज़िन्दगी जीने के लिए नशा का सहारा लेना पड़ा ?

अरे यार, आत्महत्या का प्रयास तो मैं भी कर चुकी हूँ।  यह देखो मेरा बायाँ हाथ, मैंने अपना नस काटा था- श्वेता अपना बायाँ हाथ दिखाते हुए मुझे बोली।

मैं उसके हाथ को देख रहा था। उसपर लंबे - लंबे निशान दिखाई दे रहे थे।

क्यों किया था तुमने ऐसा ? - श्वेता के हाथ को मैंने देखते हुए कहा।

पहले तुम बताओ। और अपनी पूरी कहानी भी बताना की ऐसी क्या नौबत आ गयी थी तुमने सुसाइड करने की सोची- श्वेता ने मुझसे कहा।

ठीक है मैं अपनी कहानी सुनाता हूँ। लेकिन वादा करो मेरी आपबीती सुनने के बाद तुम अपनी कहानी जरूर बताओगी- मैंने कहा।

हाँ मैं वादा करती हूँ- श्वेता ने कहा।

तो ठीक हैं मैं अपनी आपबीती तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ- मैंने कहा।

“मैट्रिक का एग्जाम मैंने  सी. बी. एस. ई बोर्ड से दिया था। इंटर में आर्ट्स स्ट्रीम में बिहार बोर्ड में एडमिशन ले लिया।

मैं एक संयुक्त परिवार में पला बढ़ा था। पापा सरकारी मुलाजिम थे तो वह हमेशा बाहर - बाहर ही रहते थे। इसलिए सभी बच्चें पटना में चाचा - चाची के साथ रहा करते  थे। 22 साल साथ रहने के बाद घर में बंटवारा का समय आया। वह बहुत भारी समय था मेरे लिए।

पापा मुझे लेकर अपने साथ बंगाल चले गए। वहाँ धनबाद के छोटे से इंस्टिट्यूट में उन्होंने मुझे डिप्लोमा करवाया मेडिकल लैब टेक्नीशियन के कोर्स में। मैट्रिक के सर्टिफिकेट पर इस कोर्स में मेरा एडमिशन हुआ था। वहीं धनबाद में रह कर मैंने नशा करना शुरू किया। परिवार का बंटवारा मैं सहन नहीं कर सका। नशे को सहारा बना चुका था। शराब से होते हुए सिगरेट, भांग, चरस और भी न जाने क्या - क्या? उन दिनों मैं हर रात भांग की गोली खा कर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ फ़िल्म का दोनों भाग बिना सीन भगाए देखता था। उस फिल्म का एक-एक डायलॉग मुझे याद था।

शुरू में मुझे यह कोर्स पसन्द नहीं था। आर्ट्स का स्टूडेंट हो कर साइंस की पढ़ाई कर रहा था। लेकिन समय के साथ मुझे कोर्स पसन्द आने लगा था, साथ में नशे की क्वांटिटी बढ़ने लगी थी।

दो साल बाद डिप्लोमा का कोर्स खत्म हो चुका था। इसी कोर्स का बैचलर डिग्री के लिए दुर्गापुर के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने का सोचा। लेकिन एडमिशन में एक दिक्कत आ चुकी थी। एडमिशन उसी को मिल सकता था जिसके पास इंटर में साइंस की सर्टिफिकेट हो। तब एक रिश्तेदार ने मुझे इंटर साइंस का सर्टिफिकेट जुगाड़ कर के दे दिया। उसी के आधार पर मेरा एडमिशन कॉलेज में हो गया। एक साल पढ़ने के बाद मुझे कॉलेज से निकाल दिया गया, क्योंकि मेरा इंटर साइंस वाला सर्टिफिकेट  नकली था। कॉलेज वालों ने मुझे जालसाजी के आरोप निकाल दिया था। वह तो शुक्र था मैं जेल नहीं गया। कुल मिला के मेरे तीन साल बर्बाद हो चुके थे। उसके बाद घरवालों ने कहा आई.टी.आई कर लो। पर मैं कोई नया कोर्स करने के लिए तैयार नहीं था। उन दिनों मैं बहुत अवसाद में रहने लगा था। इसी अवसाद के दौर में,एक दिन अपने मेस में रात के समय शराब की बोतल में बहुत ही हाई पावर की नींद की गोली मिला के मैंने पी लिया। मेस के बाकी साथियों ने मुझे सही समय पर हॉस्पिटल पहुँचाया और मैं बच गया।

उसके बाद मैं पटना चला आया। एक साल बेकार बैठा रहा उसके बाद देख रही हो की तुम्हारे साथ पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूँ। पटना आने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेरे माँ- बाप को देखने वाला कोई नहीं है। इसलिए मुझे ज़िंदा रहना होगा। इसी सोच के साथ मैंने नशे को त्याग दिया। हाँ कभी कभी सिगरेट जरूर पी लेता हूँ ”।

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नींद की गोली कैसे मिली थी ? - पूरी कहानी सुनने के बाद श्वेता का पहला सवाल यही था।

मेडिकल कॉलेज में नींद की गोली मिलनी बहुत आसान है- मैंने कहा।

अच्छा अब वादे के अनुसार तुम अपनी आपबीती सुनाओ - मैंने कहा।

उसके बोलने से पहले बादल बोल पड़े। बारिश आ चुकी थी। हम दोनों बारिश से बचने के लिए एक बैठने वाली जगह, जो ऊपर से ढकी हुई थी उसके अंदर चले गए।

अब सुनाओ - मैंने कहा।

ठीक है सुनाती हूँ, लेकिन एक और वादा करो मेरी कहानी सुनने के बाद तुम मुझसे दोस्ती नहीं तोड़ोगे। मेरी कहानी सुनने के बाद लोग मुझसे दूर हो जाते हैं- श्वेता ने कहा।

मेरा वादा है, तुम्हारा और पक्का वाला दोस्त बन जाऊँगा- मैंने श्वेता से वादा करते हुए कहा।

हा हा हा, ऐसा सभी कहते हैं- श्वेता ने कहा।

“चलो छोड़ो, कहानी पर आते है। 2007में जब मैं 6th क्लास में थी। तब मेरा रेप हुआ था। उस समय गर्मी की छुट्टी में, मेरा पूरा परिवार मामा के यहाँ समस्तीपुर गया हुआ था। वहाँ मेरी अपनी मौसी के बेटे यानी कि मेरा मौसेरा भाई ने मेरा रेप किया था। उन दिनों मुझे कुछ नहीं पता था अपने शारारिक बदलाव के बारे में। मैं रात को उनके कमरे में सो जाती थी। रात को वह मेरे साथ एक खेल खेलते और उस खेल का नाम था ‘सुहागरात’। वह खेल मुझे उस समय समझ में नही आया। लेकिन एक रात मेरे शरीर के निचले हिस्से से खून आने लगा। मैंने जा कर मामी को सब सच बता दिया। मामी ने मुझसे कहा कि जाओ जा कर नहा लो, और कल के बाद से भैया के साथ नहीं सोना। मैं नहाने चली गयी, नहाने के बाद मामी ने कुछ मरहम पट्टी की, जिससे मेरा खून निकलना बंद हुआ। ये सब होने के बाद मुझे यह अंदाजा लग चुका था कि कुछ गलत हुआ है। दूसरे दिन मौसी के बेटे को उसके घर भेज दिया गया। मैं उस दिन से काफी उदास रहने लगी। ये बात मैंने अपने माँ - पापा दोनों को बताया। लेकिन उन दोनों ने कहा की अरे कुछ नहीं हुआ है।

छुट्टी के बाद मैं जब दुबारा स्कूल गयी तो ये सारी बातें मैंने अपने बेस्ट फ्रेंड शीना को बताया। तब शीना ने मुझे सारी सच्चाई बताई की मेरे साथ क्या हुआ था। उसके बाद से मेरा विश्वास अपने माँ - पापा से उठ गया। उन्हें पता था मेरे साथ क्या हुआ था फिर भी वह दोनों चुप रहे। धीरे - धीरे यह विश्वास और कमजोर होते चला गया। मैं नशे के गिरफ्त में आ चुकी थी। जब आपकी कोई नहीं सुनता तो आपको नशा सुनता है। नशे की आदत कितनी दिन छिपी हुई रह सकती है ? माँ को पता चल चुका था। उसने मुझे डाँटा, लेकिन उसके बदले मैंने उसे उससे ज्यादा सुना दिया। मेरा वह रूप देखकर वह शायद डर गई थी। उसके बाद तो रोज़ गाँजा, शराब चलने लगा।

2013 में मेरे अपने भाई की शादी थी। सब शादी वाले स्थल पर मौजूद थे, इसी का फायदा उठा कर मैं घर आ गयी। मुझे सुट्टे की तलब लग रही थी। मैं अपने कमरे में आ कर सुट्टा जलाई ही थी, कि किसी ने पीछे से आकर मेरे ब्लाउज की डोरी खोल दी और अपने हाथ मेरे स्तन की ओर बढ़ा दिए। मैं उसे धक्का देकर गिरा दिया। यह मेरे बड़े बुआ का बेटा था, यह भी मेरा भाई लगता था। उसने शर्ट नहीं पहना था, और मेरी भी ब्लाउज खुल चुकी थी। उसने मुझसे कहा कि वह मेरे साथ सेक्स करना चाहता है। मैंने उसे माँ लगा के गाली दी। ठीक उसी वक़्त मेरी माँ कमरे के अंदर आ चुकी थी। मेरी माँ को देखते ही मेरे बुआ का बेटा ने मेरी माँ से कहा कि मैं ही उसे यहाँ लेकर आई हूँ, मैं खुद अपना ब्लाउज खोल के उसके पास आई हूँ। ये देखिए इसके पास कोई सिगरेट जिसे पी कर मेरे पास आई यह हरकत करने के लिए। उसके बाद माँ ने उसी के सामने मुझे जोरदार तप्पड़ मारा। मुझसे कुछ पूछा भी नहीं। मेरे हाथ में ब्लाउज देते हुए बोली कि जब रंडी ही बनना है, तो मेरे घर मे क्यों जन्मी?

मेरे आँखों मे आँसू थे।

भैया की शादी हो चुकी थी। भाभी के आने का समय हो रहा था। और मेरे बेहोश शरीर को हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था। अपने बायें हाथ के नस पर 5-6 जगह  हलवाई वाले चाकू से काट चुकी थी।

दो दिन बाद मुझे होश आया। सबके चेहरे देख कर मुझे ऐसा लगा की कोई भी खुश नहीं है मुझको होश में आया देखकर।

उसके बाद से लेकर आजतक मैं अपनी माँ से बात नहीं की। मेरे सभी भाई- बहनों सख्त हिदायत है कि वह सब मुझसे दूर रहे। इन सब चीज़ों ने मुझे नशे के और अधिक करीब ला दिया। अब मैं हर तरह का नशा करने लगी हूँ। ये ज़ाहिल दुनिया और ये बेकार लोग को देखने में भी घिन्न आती है। अब तो बिंदास रोज़ शराब पी के घर जाती हूँ। हर रात दो बजे उठ के गाँजा पीती हूँ। मुझे किसी की परवाह नहीं है ”।

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श्वेता अपनी बात खत्म कर चुकी थी। बोलते - बोलते उसका गला रुंध गया था। मैं एकदम निस्तब्ध हो चुका था। मैं इस तरह की कहानी के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोलूं ?

क्या हुआ अरुणेश ? कुछ बोल क्यों नहीं रह है ? क्या तुम्हें भी मैं गलत लगती हूँ- श्वेता ने कहा।

उसकी आवाज़ से मैं दुबारा होश में आया। उसकी कहानी सुन के मैं उसी में खोया हुआ था।

नहीं- नहीं, तुम गलत नहीं हो। लेकिन तुम सही भी नहीं हो। इतने अधिक मात्रा में नशा का क्या भविष्य होगा कभीसोचा है ?- मैंने श्वेता से कहा।

एक बात बोलूं, मैं ये सब छोड़ना चाहती हूँ। कुछ करना चाहती हूँ, लेकिन फिर मेरे घर के लोग याद आ जाते हैं। उसके बाद मैं और अधिक मात्रा में नशा कर लेना चाहती रहती हूँ। ताकि उन सब का चेहरा भूल सकूँ।

श्वेता की बातों में गुस्सा साफ दिखाई दे रही थी।

अच्छा ये बताओ यहाँ पटना में तुम्हारा कोई रिश्तेदार रहता है क्या?- मैंने पूछा।

हाँ मेरी नानी यहीं पुनाईचक में रहती है।

तो ऐसा करो मधुबनी छोड़ दो। यहाँ आ कर रहना शुरू कर दो और भारतीय संवाद केंद्र में आकर पत्रकारिता की परीक्षण लो। भारतीय संवाद केंद्र और संजय सर के साथ रह कर एक अच्छा इंसान और एक अच्छी पत्रकार बन जाओगी- मैंने श्वेता को समझाते हुए कहा।

पर,,, घरवाले मेरी शादी के लिए लड़का खोज रहे हैं- श्वेता ने कहा।

तो एक बार बात करो अपने घर में। तुम सीधे अपने पापा से बात करो- मैंने उसे समझाया।

ठीक है मैं कोशिश करती हूँ - श्वेता ने कहा।

और नशा छोड़ने का क्या सोची हो ? - मैंने पूछा।

नहीं छूटता अब ! एक बार चार दिन के लिए गाँजा छोड़ी थी पूरा शरीर में लगा वाइब्रेशन आ गया हो। पेट लग रहा था जल के फट जाएगा। उल्टियां भी हुई थी। फिर पाँचवे दिन मैं हार के गाँजा को अपने होठों से लगा लिया - श्वेता ने कहा।

शाम हो चुकी थी। शायद 7 बजे के आसपास का समय रहा होगा।

अब वापस चले बहुत देर हो चुकी है- श्वेता ने कहा।

उसके बाद हम दोनों वहाँ से निकल गए।।।

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मैं उस रात ठीक से सो नहीं सका। यह सोच के परेशान था कि श्वेता की ज़िंदगी मे इतने तूफान। पहले उसका आत्मसम्मान वापस दिलाऊँ, या उसके परिवार से उसकी दूरियां खत्म करवाऊं या उसका नशे की आदत खत्म करवाऊं?

खैर अब सब कुछ श्वेता को करना था। अगर वह पटना आ जाती है रहने को तो सबसे पहले उसको भारतीय संवाद केंद्र से जोड़ दूँगा। उसके बाद उसके नशे का इलाज देखा जाएगा। बाकी चीज़े बाद में।

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अगले दिन श्वेता वापस मधुबनी चली गयी थी। मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो चुका था। फिर भी श्वेता से व्हाट्सएप पर रोजाना बात होती थी। जिस दिन वह मेरे मैसेज का जवाब नहीं देती उस दिन मुझे अजीब सी बेचैनी होने लगती थी। मुझे पता नहीं चल पा रहा था यह किस तरह का लगाव है?

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दो महीने के बाद श्वेता पटना आ चुकी थी। दूसरे दिन वह भारतीय संवाद केंद्र में अपने पापा के साथ आई।  उसके पापा ने संजय सर से बात किया, उसके बाद उन्होंने संवाद केंद्र का निरक्षण किया। फिर उन्होंने मुझसे बात की। उनसे मैंने मैथली में बात की। अपनी भाषा में बात करने पर सामने वाले पर अच्छी छाप छूटती है।

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अगले दिन से श्वेता से भारतीय संवाद केंद्र आने लगी। पत्रकारिता का परीक्षण लेना शुरू कर चुकी थी। एक दिन सर ने उसे आफिस के नीचे सिगरेट पीते हुए देख लिया। उन्होंने श्वेता को अपने केबिन में बुलाया। कुछ देर बाद मुझे भी बुलाया गया। हम दोनों दो घण्टे सर के पास बैठे रहे। उस दो घण्टे में श्वेता ने अपनी सारी आपबीती सर को बता दी। शाम में सर हम दोनों को डॉक्टर विनोद पांडेय से मिलवाने हनुमान नगर ले गए। डॉक्टर विनोद पांडेय जाने माने मनोचिकित्सक है, उन्होंने श्वेता का लगभग दो घण्टे तक कॉउंसलिंग किया।

दो घण्टे के कॉउंसलिंग के बाद हमें यह पता चला, श्वेता में नकारत्मकता बहुत अधिक मात्रा में है। सकारात्मकता के भी लक्षण दिखे, लेकिन बहुत कम मात्रा में। सबसे पहले नशा से मुक्ति के बारे में सोचा गया। सारी गलत आदतें छोड़ने के लिए श्वेता भी तैयार थी।

इसके लिए श्वेता को नशा मुक्ति केंद्र में रहना था। बिना अभिभावक को बताए यह संभव नहीं था। दो दिन बाद श्वेता के माँ- पापा पटना में थे।

विनोद पांडेय और संजय सर की बात श्वेता के माँ- पापा से हुआ। सब कुछ समझाने पर वह भी तैयार हो गए। नशा मुक्ति केंद्र की सभी कागजी कार्यवाही पूरी की गई। उसके बाद श्वेता को नशा मुक्ति केंद्र में छोड़ा गया। इस पूरे घटनाक्रम में श्वेता की माँ एक बार भी श्वेता से बात तक नहीं की। श्वेता के पापा ने संजय सर को यह जरूर कहा कि उनकी बेटी अब अच्छे लोगों के बीच में है।

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नशा मुक्ति केंद्र के नियम बहुत कठिन थे। जब तक व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए। जब तक उसका दिमाग नशे की ओर न भागे। और जब तक डॉक्टरों को ऐसा न लगे कि बीमार व्यक्ति ठीक हो चुका है, उसे बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। इलाज के दौरान कोई भी रिश्तेदार, मित्र इत्यादि पेशेंट से मिलने नहीं आ सकता था।

पूरे पाँच महीने के कड़े परीक्षण के बाद श्वेता नशा मुक्ति केंद्र से बाहर आ चुकी थी। इन पाँच महीनों में हर रोज़ मैं उसे याद करता  था।

पहले से काफी अच्छी, सकारात्मक विचार से भरी हुई श्वेता बाहर आयी थी। उसने बताया कि नशा मुक्ति केंद्र में एकदम पागल हो चुकी थी। शुरू में रोज़ उल्टियां कर रह थी। पर वह कभी हिम्मत नही हारी।  इसके बाद भी वह अपने माँ को माफ नहीं की थी। विनोद पांडेय सर ने बताया कि श्वेता अभी तो ठीक है, लेकिन कोई भी गलत घटना उसके साथ हुई तो वह दुबारा ज़िंदा रहने लायक नहीं बचेगी।

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अप्रैल 2017 में पत्रकारिता के अंतिम वर्ष की परीक्षा शुरू होने वाली थी। हमारे पास अभी चार महीने बचे हुए थे। हम दोनों ने साथ में पढ़ना शुरू किया। हमने फाइनल ईयर का एग्जाम दिया। उसके बाद दुबारा भारतीय संवाद केंद्र में परीक्षण में लग गए। जुलाई के पहले हफ्ते हमारा रिजल्ट आया, मेरे ग्रुप के सभी लोग फर्स्ट डिवीज़न से पास हुए थे। रिजल्ट आने के बाद श्वेता ने संजय सर को बोला कि वह नोएडा जाना चाहती है। वहाँ वह किसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जॉइन करेगी। वहाँ पर उसका एक चैनल में पैरवी है। सर ने उसे जाने का परमिशन दे दिया। श्वेता ने मुझे भी कहा चलने को, लेकिन मम्मी - पापा को छोड़ कर जाने का मेरा दिल नहीं हुआ।

श्वेता नोएडा जा चुकी थी। उसके जाने का मुझे दुख हुआ। रोज़ एक बार उसे जरूर याद करता था। पर अब हमारी बातें पहले जितनी नहीं हो रही थी। वह भी नोएडा में अपने जीवन में व्यस्त हो चुकी थी। मैं भी यहाँ पटना में प्रिंट मीडिया और अपनी किताब लिखने में व्यस्त था।

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मेरी किताब मई 2018 में आने वाली थी। किताब के सिलसिले में दिसंबर महीने में दिल्ली गया। किताब के काम के बाद श्वेता से मिलने नोएडा गया। मैंने सोचा इस बार उसे अपनी दिल की बात बता दूँगा। लेकिन जब उसके फ्लैट पर गया तो पता चला वह एक लड़के के साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रह रही है। श्वेता ने बताया कि उस लड़के को वह  पिछले दो साल से जानती है, और पिछले छः महीने से दोनों साथ में है। उस लड़के का नाम रोशन था, नोएडा के एमिटी यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग किया था। अपने दिल की बात श्वेता को बताने का कोई फायदा नहीं था। मैं तो खुश था कि चलो श्वेता को कोई प्यार करने वाला मिल गया।

रात में मैंने देखा श्वेता और रोशन शराब पी रहे थे। उसके बाद श्वेता ने सिगरेट भी जलाया। ये देख मैं आश्चर्यचकित रह गया। जो नशा मुक्ति केंद्र से बाहर आई थी, वह आज फिर नशे के गिरफ्त में है।

मैंने श्वेता को टोका- ये क्या कर रही हो?

देख अरुणेश मेरे बाप बनने की कोशिश मत करो। ये दुनिया चूतियों से भरी पड़ी है। मैं भी चूतिया हूँ, तुम भी चूतिये हो हम सब चूतिये है। इसलिए अपने काम से काम रखा कर- श्वेता ने नशे के हाल में मुझसे कहा।

रोशन चुपचाप सुन रहा था। अब मेरा वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं था। श्वेता अपने ज़िन्दगी में आगे बढ़ चुकी थी।

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दूसरे दिन मैं वापस पटना आ गया। अपने आप से वादा किया आज के बाद श्वेता की ज़िंदगी में नहीं जाना है। वह खुश है अपने ज़िन्दगी में। मैं पटना अपने काम में व्यस्त हो गया।

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5 मई 2018 को मेरी कहानी संग्रह का विमोचन हुआ। मैंने श्वेता को मैसेज कर दिया था विमोचन में आने के लिए। लेकिन वह नहीं आयी। सुबह सात बजे संजय सर का फ़ोन आया। सर ने मुझे तुरंत अपने घर आने को कहा।

मैंने अपना स्कूटी स्टार्ट कर के संजय सर के घर राजवंशी नगर के लिए निकल गया।

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क्या हुआ सर? - मैंने सवाल किया।

श्वेता ने आत्महत्या कर लिया कल रात में। उसने अपने सर पर गोली मार लिया। उसने एक पेन ड्राइव छोड़ा था मरने से पहले। उसमें तुम्हारे लिए कुछ सन्देश है। मुझे कल रात में ही इसकी जानकारी मिल गयी थी। वह पेन ड्राइव का संदेश मैं अपने मोबाइल पर मंगवा चुका हूँ। तुम देख लो- संजय सर ने कहा।

मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैं कुछ देर के लिए मूर्ति बन गया था। सर के दुबारा टोकने पर मुझे होश आया।

सर उसका एक बॉयफ्रेंड था, रोशन। वह कहाँ है- मैंने पूछा।

हाँ मैंने उसके बारे में भी पता कर लिया है। वह तीन महीने पहले ही भारत से बाहर जा चुका है। वह तंज़ानिया देश मे काम करता है। हाँ श्वेता की डेड बॉडी दोपहर के बारह बजे तक पटना पहुँचेगी। आज शाम 5-6 के बीच गुलबी घाट पर उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा- सर ने सारी बातें मुझे बता कर अपना मोबाइल मेरे हाथों में दिया। मैंने मोबाइल का वीडियो प्ले कर दिया।

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“हाई अरुणेश ! बहुत बड़ा वाला कांग्रेट्स तुम्हें तुम्हारी किताब आ रही है। लेकिन सॉरी यार मैं तुम्हारे किताब विमोचन में नहीं आ पाऊंगी। क्योंकि मुझे कहीं दूर जाना है, तुम सब से दूर। जब तक तुम्हें ये वीडियो मिलेगा मैं बहुत दूर निकल गयी रहूँगी।

तुमने, संजय सर और बाकी सब ने मुझे मिल के सुधार दिया था। पर ये दुनिया आपको सुधरने नहीं देती है। रोशन को मैं प्यार करती थी, पर वह मुझे वैश्या समझता था। उसे बहुत रोकने की कोशिश की पर वह नहीं रुका। उसने तो ये तक कहा कि मैं न जाने कितने मर्दों के साथ सो चुकी हूँ। मैं नादानी में या प्यार के अंधेपन में उसे अपनी सारी बीती घटनाओं के बारे में बता दिया था।

तुम्हारे कारण मैं पत्रकार बनी। पत्रकार बनने के बाद सबसे पहली जासूसी मैंने तुम पर किया। मुझे पता लग चुका था कि तुम मुझे पसन्द करने लगे हो। इसलिए जब तुम दिल्ली आए तो मैंने जानबूझकर वह सारा नाटक किया। ताकि मेरी छवि तुम्हारे सामने खराब हो जाए।

मैं दुनिया से लड़ने चली थी। अब मेरे घर के लोग खुश रहेंगे। मेरी माँ खुश रहेगी, मेरे भाई- बहन घर में खुल के बात कर सकेंगे।

बाई अरुणेश”।

बस इतना सा था वीडियो….

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शाम छः बजे के करीब श्वेता का शव गुलबी घाट आ चुका था। मैं भी गुलबी घाट पर ही मौजूद था। हाफ चेक शर्ट, भूरे रंग की पेंट पहन कर। हवा में अजीब सी बेचैनी थी।

श्वेता का चेहरा देखने लायक भी नहीं बचा था। मुखाग्नि की तैयारी हो रही थी। मेरा दिमाग भारी हो रहा था। मैं राजा भगत के दुकान पर जा कर दो जॉइंट खरीद लाया। उधर श्वेता के बड़े भाई ने चिता को मुखाग्नि दिए, इधर मैंने जॉइंट पर माचिस जलाया। उसकी चिता जलने लगी, मेरा जॉइंट धीरे- धीरे खत्म होने लगा। आज केवल आँखे लाल हुई थी। आज न मुँह सुख रहा था, न मेरी आँखें छोटी हो रही थी। गाँजे और चिता में से निकलने वाली धुआं मैं श्वेता की परछाई नज़र आ रही थी।

कौन था श्वेता के मौत का जिम्मेदार?

श्वेता के मौसी का बेटा, श्वेता की मामी, श्वेता के बुआ का बेटा, श्वेता की अपनी माँ, उसका अपना परिवार, मैं, भारतीय संवाद केंद्र, रोशन या वह खुद?

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श्वेता धीरे- धीरे पंचतत्व में विलीन हो रही थी। मैं अपना दोनों जॉइंट खत्म कर चुका था। मेरे दिमाग में केवल एक बात चल रही थी। श्वेता जहाँ रहो खुश रहो, कभी लौट कर इस दुनिया में मत आना। ये दुनिया, यह गंदा समाज तुम्हारे लिए नहीं था।

अभिलाष दत्त

ईमेल- dutta.abhilash92@gmail.com

फेसबुक - dutta.abhilash@facebook.com



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