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@dawriter

कृतज्ञता

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कृतज्ञता

“कपूर साहब अब विनीत खतरे से बाहर है।” भोर के समय डॉक्टर के इन शब्दों ने पल पल निष्प्राण होते सुरेन्द्र कपूर के शरीर में जान फूंक दी उन्होंने अपने मित्र डॉ प्रवीण को गले से लगा लिया। तभी उन्हें याद आया कि विनीत के ग्रुप का ब्लड कहीं उपलब्ध नहीं था।

“विनीत के लिए ब्लड का इंतजाम कहाँ से हुआ?” सुरेन्द्र के इस प्रश्न के जवाब में डॉ ने मोहन की ओर इशारा कर दिया। पत्नी तो धन्यवाद देने मोहन की ओर बढ़ गयी मगर वे अपनी ही शर्मिंदगी के बोझ तले दबे वहीँ खड़े रह गए। सुरेन्द्र को बेटे की जिंदगी का अनमोल तौहफा देने वाले मोहन को सुरेन्द्र ने कभी परिचितों की श्रेणी में भी नहीं रखा। वह तो उनके लिए केवल उनकी सोसाईटी का वॉचमेन भर था जो वक्त बेवक्त उनके छोटे मोटे काम भी कर दिया करता था।

डॉ प्रवीण ने जब मोहन को कुछ इनाम देना चाहा तो उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि, “दोनों समय साहब के घर ही तो खाना खाता हूँ बेटे राजा को खून दे कर कोई अहसान थोड़े ही किया है।” अवाक् रह गए सुरेन्द्र, इस आदमी का उन्होंने हमेशा गंवार और अनपढ़ कहकर मजाक उड़ाया था। उन्हें याद है जब भी उनकी पत्नी उसे खाना देती थी उनका अपनी पत्नी से झगड़ा हो जाता था और यह है की उसी अन्न का वास्ता दे रहा था। सुरेन्द्र धीरे धीरे आगे बढे और उसे गले से लगा लिया।

“अच्छा बदलाव है।” पत्नी ने धीरे से कहा। वह मुस्कुरा दिए किन्तु वह जानते थे यह बदलाव नहीं अपितु उस नयी सुबह के लिए कृतज्ञता थी जो उनके जीवन में मोहन लाया था अन्यथा तो.... सोच कर भी रूह कांप जाती है।

Image Source: dailymoss



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