DOMESTIC VIOLENCE

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Defence

ashwanikumartiwari3   11 views   1 year ago

It's a story thats best savoured when unfolded without having any prior information about it.

लघुकथा- रिश्तों की नीलामी

rashmi   370 views   1 year ago

पैसों से खरीदकर बनाए गए रिश्तें और उन पर हुकुमियत की दास्तां

घरेलू हिंसा: एक संकीर्ण सोच

utkrishtshukla   759 views   1 year ago

........हमें महिलाओं के प्रति अपनी संकीर्ण सोच बदलनी होगी और बाहर निकलना होगा ऐसी रूढ़िवादी परम्पराओं से जो उन्हें सम्मान व बराबरी का दर्जा नहीं दे सकती हैं।..........

A stamped on Rose

misswordsmith   133 views   1 year ago

A small article where I have tried to picturise the scenario of a woman facing domestic violence in both physical and mental form.

Men: The Perpetrators (A Reality or a Mindset)

abhinav   87 views   1 year ago

Violence against men do breathe in our very society. Men are always contemplated as perpetrators and women as sufferer.But is it always so?

बेजुबान

udyalkarai   24 views   1 year ago

आज सवाल उठाने का मन में ख्याल है आया

I OBJECT

Rajeev Pundir   16 views   1 year ago

How shameful it is that we the men take our lovely and delicate better halves for granted and use and abuse them at our will !! This poem is inspired from a news of a boy who murdered his beloved brutally. We've to stand against this beastly mentality to stop violence against women.

YOUR HATEFUL SURVIVOR

aesha   241 views   1 year ago

A very short open letter to my ex abuser. You were a mistake I choose. But I have found peace away from you

नाम

sonikedia12   55 views   1 year ago

कभी कभी इंसान उन गलतियों का बोझ ढोता हैं जो उसने किया ही नहीं ।

Me and me and a war

variantme   20 views   1 year ago

In the agony of the days spent, she Crys.... She talks to her self and laments. She calls it a war. Yes! A WAR.

Finding solace in the most tragic way.

writerinmaking0   368 views   1 year ago

An attempt to modify the society through my thoughts that aim to question the dynamics of domestic violence. My main concern is to talk about how domestic violence works in a place we least expect it to.

गोपाल फ़िर से जी उठा stopdomesticviolence

hema   73 views   1 year ago

कभी कभी स्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं कि कहानी के सभी पात्र किसी न किसी वजह से कमज़ोर और मजबूर दिखते हैं ..लेकिन नियति सबको एक मौका ज़रूर देती है अपनी भूल का प्रायश्चित करने का ... यह कहानी है उस घरेलू हिंसा की जिसकी जड़ है बेमेल विवाह...

सुलोचना....( सच्ची कहानी )

dhirajjha123   127 views   1 year ago

बदलाव का अधिकार हर किसी के पास है । पर इस अधिकार का पूरा फायदा उसी को मिलता है जिसमें लड़ने की ताकत है, जिसमे हक़ छीन लेने की हिम्मत है । जो लड़ सकता है अपनों के ख़िलाफ, जो चुनौती दे सकता है सनातन से चले आ रहे बेकार के रिवाज़ों को

अनकहा दर्द ।

chandrasingh   315 views   1 year ago

आखिर ये नयी सदी मे जी रहे लोगो की मानसिकता कब तक ये दहेज रूपी गुलामी की जंजीरों को झेलेगी इसे तोड़ना होगा और शुरुवात करनी होगी एक दहेज मानसिकता मुक्त समाज की । ताकि किसी तनिशा का फिर से अन्त न हो । अब हमे लड़ना हो, जागना होना नही तो अगली तनिशा हमारे घर से भी हो सकती है ।

श्रेणी- Story/Domestic Violence

sonikedia12   112 views   1 year ago

हाँ ये शब्द कई बार सुना । कई चोट और निशान भी देखे। पर उन चोटों और निशानों का क्या जो बड़े प्यार से दिए जाते हैं पर हम कई बार पहचान नहीं पाते और अंदर ही अंदर घुटते है एक जिंदा लाश की तरह जिसमें सिर्फ़ साँसे होती है पर खुद के लिए नहीं । इसमें गलती किसकी ये तय करना भी कठिन होता है ।