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@dawriter

498A कितना सफल कितना असफल

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swati21

"498A कितना सफल कितना असफल"

जैसा कि आप लोग शीर्षक से समझ गए होंगे कि में भारतीय दंड सहिंता (IPC) की धारा 498अ के बारे में बात कर रहीं हूँ, यह धारा वैसे तो महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए बनाई गई थी जो अक्सर इस देश मे ज्यादातर विवाहित लड़कियों के साथ देश के हर कोने में होते ही है।

इस धारा में शादी के बाद विवाहित लडक़ी या उसके परिवार वालो से किसी भी प्रकार की दहेज की मांग या शादी में कम दहेज लाने पे बहु को ताने मारना, बहु का स्त्री-धन हड़पना आदि सभी प्रतिबंधित हैं साथ ही अभियुक्तों को गैर-जमानती अपराध में जैल जाना पड़ता है।

जिसमे कम से कम 3 साल की सजा का प्रावधान है।
यह कानून 1983 में अस्तित्व में आया था जिसके अनुसार किसी भी महिला का पति या पति के रिश्तेदार अगर उस महिला के साथ किसी भी तरह की cruelty करते है चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक इस धारा में दोषी पाए जाएंगे।


इस क़ानून को बनाने का मुख्य उद्देश्य विवाहित महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों को रोकना था

34 साल हो गए इस कानून को बने, यह कितना सफल रहा?
क्या इस कानून के बाद ऐसे अपराधों में कमी आयी???

नहीं रत्ती भर भी कमी नहीं आयी, दहेज की नाजायज माँगे, दहेज-हत्याएं, आत्महत्याएं और महिलाओं का मानसिक शारीरिक शोषण आज भी ससुराल वालों के द्वारा बदस्तूर जारी है।

बावजूद इसके यह कानून आज भारत का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया जाने वाला कानून बन गया हैं। कुछ महिलाएं और महिला संगठन इसका अनुचित फायदा उठा रहे है और कुछ तो व्यापार तक कर रहें है।
पहले बेटी की शादी फिर एक महीने के अंदर ही लड़ाई और 498अ की धमकी फिर समझौते के नाम पे लाखो रुपये ऐंठ के अगला शिकार ढूंढना।
कई लड़कियां ससुराल में जरा जरा सी बात पे ससुराल वालों को 498अ में फ़साने की धमकियां देती है, मैं यह नहीं कहती के सभी केस झूठे होते है पर

एक सर्वे के अनुसार 498अ के 70% केस झूठे निकलें और ये हर हाल में गलत है पर एक सच यह भी हैं कि अधिकतर असली केस किसी थाने में रजिस्टर्ड ही नही होते, कही ससुराल की जूठी शान तो कही अपने माता-पिता की वजह से लड़की सब चुपचाप सहती रहती हैं।

खुद मैंने भी यही किया चाहे ससुराल में रोज "माँ-बाप ने खाली हाथ धक्का दे दिया के ताने हो या मेरा स्त्री धन वापस लेने की या रोज की खाने-पीने, पहनावे की बंदिशो के साथ रोज का मानसिक अत्याचार जब तक बर्दाश्त करने की हिम्मत रही किया और जब नही रही तो बिना कुछ लिए ससुराल छोड़ दिया। शोषित होने के बावजूद भी ससुराल वालों पे कभी केस करने का नहीं सोचा क्योंकि मेरी सोच थी कि जो लोग मुझे कभी अपना नहीं पाए, कभी प्यार न दे पाए उन लोगो से कुछ भी लेना मेरे आत्म सम्मान को चोट पहुँचाना होगा। जानती हूँ ऐसी बहुत सी लड़कियां है जो किसी न किसी वजह से समझौता कर ही लेती है।

अगर सर्वे में झूठे केसेज का प्रतिशत 70% है तो ऐसे unregistered केस भी 90% है जिन्हें लडकिया किसी FIR में लिखवाने के बजाय अपने दिल मे दफन कर लेती है।
निष्कर्ष यहीं है कि चाहे झूठे केस हो या सच्चे ये कानून अपने मकसद में बिल्कुल भी सफल नहीं है।

मैं किसी भी ऐसे कानून को सफल तब माँनुगी जब इस तरह के अपराध होना ही। बंद हो जाएंगे। आज नही तो कल कभी तो लोगो मे अक्ल आएगी की "बहू ही दहेज हैं"
मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य यह नहीं कि लड़कियों को अपने ससुराल वालों पे केस नहीं करना चाहिए, अगर आप शोषित है तो अपने हक़ के लिए अवश्य आवाज उठाये, यह कानून आपके लिए है इसका सही व उचित फायदा उठाये।

मैं खुद भी एक वकील हूँ इसलिये मुझे लगा कि महिलाओं को खुद के लिए बने कानूनों को समुचित जानकारी होना आवश्यक है।

आप सबके विचार आमंत्रित हैं, मेरे और ब्लॉग पढ़ने के लिए कृपया आप मुझे फॉलो कर सकते हैं।
😊 धन्यवाद।



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