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@dawriter

सुलोचना....( सच्ची कहानी )

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

सुलोचना....( सच्ची कहानी )
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बदलाव का अधिकार हर किसी के पास है। पर इस अधिकार का पूरा फायदा उसी को मिलता है जिसमें लड़ने की ताकत है, जिसमे हक़ छीन लेने की हिम्मत है। जो लड़ सकता है अपनों के ख़िलाफ, जो चुनौती दे सकता है सनातन से चले आ रहे बेकार के रिवाज़ों को, जिसमें लोगों की फ़ालतू बातों को अपने राह मे रोड़ा ना बनने देने की आदत हो, जो जानी जाती हो चुप चाप ज़ुल्म सहने के लिये पर एक दिन उसी ज़ुल्म की लाठी से ज़ालिमों का सर फोड़ दे। ये कुछ ज़्यादा ही काल्पनिक बातें लग रही होंगी ना आप सब को ? तो चलिये एक किस्से की ओर ले चलता हूं , जिसे सुन कर और महसूस कर के आपको शायद यकीन हो के बदलाव महज़ काल्पनिक बात नही। पर शर्त है मेरी एक, ये जो किस्से में होगा ये सही है या गलत इसका फैसला करने का अधिकार आपको तभी होगा जब आप किस्से की नायिका पर हुए हर ज़ुल्म को अन्दर तक महसूस करेंगे। पढ़ते हुए उसे जब जब चोटें आयेंगी आप उस दर्द को खुद में उठता देख कर सही गलत का फैसला करेंगे।
 
19 साल 6 महिने कुछ दिन की सुलोचना की आँखों में भी उसकी उम्र की लड़कियों की तरह अनगिनत सपने तैर रहे थे। तैरें भी कैसे ना एक बड़े और समृद्ध सामूहिक परिवार की लाडली बड़ी बेटी जो थी। पढ़ने में होशियार , चुलबुली सी, रूप भी जैसे भीगी रात की बाहों से ताज़ा ताज़ा नींद से जागी भोर का मदमाता सौंदर्य हो। चहकती महकती इधर उधर भागती हुई खुद में एक बच्चे को अभी तक संभाल कर रखा था सुलोचना ने। प्रेम भी तो करती थी त्रिभुवन से और इस प्रेम ने और भी चार चाँद लगा दिये थे उसके सौंदर्य में। हर दम खिलखिलाता चेहरा, आँखों में नदी की मदमस्त लहरों सा हिलोरे खाता पर वो प्रेम महज़ उसके मन की हद तक ही था। उसे देख कर , उसके संग थोड़ा बतिया कर ही त्रृप्त हो जाया करती सुलोचना। संस्कार इससे आगे बढ़ने की इजाज़त भी तो नही देते थे उसे। वह चाह कर भी मन की बात को उजागर नही कर सकती थी। पर वो खुश थी उसे ज़िंदगी को बखूबी जीने का हुनर था।
 
मगर खुशियों के पैर टिकते कहाँ हैं। ये भी चंचल सी हैं कुछ ही दिनों में उब जाती हैं और फिर चल देती हैं ज़िंदगी से किनारा कर के। गाँव की परम्परा , झूठे रिवाज़ , अपने बेकार के तानों से परेशान करता समाज कब आ खड़ा हुआ सुलोचना की खुशियों का हरण करने सुलोचना जान भी ना पाई। बस बाबू जी ने एक दिन आ कर कह दिया के "अब तैयारियां करो सुलोचना की शादी की, हम लड़का देख आये हैं। 20 की होने जा रही है कब तक घर में बिठाएंगे ? सब सवाल करते हैं त्रिपाठी जी कब कर रहे हैं बेटी का बियाह ? अभी और बेटियां भी ब्याहनी हैं। " चुपके से सुन रहे सुलोचना के कानों ने जब ये बात उसकी आँखों तक पहुंचाई तो सारे सपने आँसू बन कर बहने लगे। पर कोई ज़ोर भी तो नही था ना सुलोचना का नियती पर। आखिर संस्कारी लड़की जो थी। उसने चुपके से ज़हर के कुछ घूंट अपने सपनों को पिला दिए और फिर हर रोज़ वो धीरे धीरे उसके सामने ही तड़प तड़प कर मरते गए। 
 
लड़के वाले आये लड़की पसन्द आ गई, सगाई हो गई। सुलोचना ने अपने प्यार के भ्रूण की हत्या अपने मन की कोख में ही कर दी। लड़के की फर्माइश पर फोन पे ना चाहते हुए भी बातें होने लगीं सुलोचना की। पर लड़के की मीठी बातों से सुलोचना का सारा डर जाता रहा। जो हो रहा था , जिस पर कोई ज़ोर नही था उसी में खुश रहना सीख रही थी।  पुराने बह गये थे अब नये सपने सजने लगे। सजाने वाला सुलोचना का भावि पति था। उसने वादा किया शादी के बाद भी वो पढ़ेगी। उसे सब अधिकार होगा अपने हिसाब से करने का , कोई रोक टोक नही होगी। उसकी बातों से सुलोचना के ख़्वाबों को नये पंख लगने लगे। सजाने लगी सपने साजन के। शादी भी हो गई। अब गौना के बाद बड़े तिलक और ढेर सारे दहेज के साथ सुलोचना कुछ सपने भी ले गई थी। पर ये क्या वहाँ जा कर तो पाया के इन सपनों की यहाँ जगह ही कोई नही। वो सब जो कहा गया था वो सब मानों मछली फसाने के लिये बंसी मे लगे आटे के टुकड़े जैसा था। और सुलोचना अब फंस भी गई थी। 
 
जिसे माँ ने कभी ज़्यादा काम ना करने दिया था उसे चुल्हे की आँच से उठ रहे धुऐं मे अपनी सांसे जलानी पड़ रही थीं। पर ये उसके लिये बड़ी बात नही थी ये तो काम है और काम से भला क्यों पीछे हटे। पर अभी बड़ी बात तो तब सामने आनी थी जब पति की फोन की मिठी बातों के नीचे से उसका कड़वा स्वभाव उभर के निकलना था। और वही हुआ। हर रात हैवानियत का नंगा नाच और सारा दिन छोटी छोटी बातों पर बरसने वाली गालियां अब सुलोचना की ज़िंदगी का हिस्सा बन गईं। साड़ी को ऐसे नही ऐसे पहनो। शरीर का एक अंग नही दिखना चाहिये। बाल बढ़ा कर नही रखो, खुले मत छोड़ो। सजो संवरो नही और ना सजने पर कह देता तुम अब उतनी सुन्दर नही हो। इस पर भी चार गालियां। गालियों की हद बढ़ कर अब हाथ उठाने पर आ गयी थी। 
 
एक बार ऐसा मारा के कान में दर्द पैदा कर दिया। बाद में पता लगा के पर्दा फट गया है कान का। सर में इतनी चोटें आयीं के आज भी वो दर्द जब जब उठता है तो सारा अतीत सामने आ खड़ा होता है। घर के बड़े इसे पति पत्नी का मामूली झगड़ा बता कर बात को अनसुनी कर देते। बाबू जी भी नही ग़ौर करते कभी इन सब पर। सुलोचना घन्टों किस्मत को कोस्ती रहती। एक राजकुमारी की तरह पली बड़ी बेटी की ये दुर्गती थी के ना वो मर सकती थी ना चैन से जीना नसीब था। उसके पति का बस चलता तो कह देता सांस मत लो ये हवा दूसरों को छू कर आयी है। कहा गया था लड़का पढ़ा लिखा है। सुलोचना सोचती अगर ये पढ़ा लिखा है तो इस से अच्छा बाबू जी गंवार से शादी करा देते। हद तो तब होती जब इन बंदिशों का पालन उसे पति के साथ कई बार अपने घर जा कर भी करना पड़ता। जहाँ उसे अपना बच्चपन बिताया उन लोगों के बीच बड़ी हुई उनसे भी पर्दा करने को कहा जाता।
 
अब बर्दाश्त से बाहर हो गया था सुलोचना का अपने पति के साथ रहना। बाबू जी को फ़ोन कर के कह दिया " या तो मुझे अभी ले जाइये या कुछ दिन में मेरी लाश को लेने आइयेगा। और आपकी कसम मै सच में मर जाऊंगी।" 
 
इस फोन करने के लिये भी मार खाई सुलोचना ने। ये वो बात थी के मारेंगे भी और चिल्लाने भी नही देंगे। पर सुलोचना की माँ के ज़ोर डालने पर सुलोचना के बाबू उसे ले आये। पर रखने की मंशा से नही बस इसलिये के समझा बुझा कर फिर भेज देंगे। उसकी हालत अब भी नही समझी जा रही थी। और हुआ भी तो ऐसा ही। उसका पति आया सारा दोष इसी पर मढ़ के फिर ले गया। अब हर बार ऐसा ही होने लगा वो खूब मारता , ताने देता , फिर सुलोचना चली आती और वो फिर रो धो कर ले जाता। इसी सब के बीच सुलोचना के पेट में एक मासूम के पलने की ख़बर भी आ गयी। अब इस पर भी धमकियां मिलने लगीं के बेटा ना हुआ तो देख लेना। जैसे सब उसी के हाथ में हो। जब टैस्ट हुये तो भगवान नें कुछ और सितम लिख दिये , उसकी कोख में बेटी ही निकली। अब तो जैसे दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो उसने , ऐसे सब टूट पड़े उस पर। बच्चा गिराने को कहा जाने लगा पर सुलोचना नही मानी किसी हाल में। 
 
सुलोचना के पिता उसे ले गये अपने साथ और उसने वहीं अपनी बेटी को जन्म दिया। पति हाल तक पूछने नही गया पत्नी और अपनी बच्ची का। पर सुलोचना को ग़म नही था अब। उसे तो बेटी ने जैसे जीने की नयी उम्मीद और हिम्मत दी हो। कुछ महीनों बाद फिर उसका पति उसे अपने साथ ले गया। अब तो उस पर जुल्मों की मात्रा को दुगना कर दिया गया। पर एक बार जब बाबू जी बेटी को ससुराल पहुंचे तो देखा बेटी मार खा रही है और उसके ससुर बाहर अखबार पढ़ने में व्यस्त हैं जैसे कुछ हो ही नही रहा। बस सुलोचना के पिता उसे ले आये। बेटी के आने से सुलोचना में अब हिम्मत आ गई थी। फैसला कर लिया के अब वापस नही जायेगी। तलाक लेगी और मुआव्ज़ा भी। अब चाहे जो हो जाये। यही सोच कर उसने केस कर दिया ससुराल वालों पर। घर से फिर मना किया गया। समझौता करने के लिये मनाया गया। पर अब सुलोचना का फैसला नही बदलने वाला था। सुलोचना के घर वालों को वो बोझ ना लगे इस लिये उसने नौकरी भी कर ली सबके मना करने के बाद भी। केस की हर सुनवाई पर उस पे समझौते का दवाब डाला गया। 
 
पति शुरू में फोन करता खूब गालियां देता पर बाद में गिड़गिड़ाने लगा जब उसे अहसास हुआ के मुआव्ज़े में उसे काफी पैसे देने पड़ेंगे। कहने लगा हर शर्त मानेगा। सुलोचना के बाबू जी ने भी कह दिया के समझौता करना ही पड़ेगा तुम्हे। हमारी और भी बेटियाँ हैं इस तरह कौन अच्छा परिवार इन्हे बहू बनाने को तैयार होगा। सुलोचना बाबू जी की बात से टूटने लगी। उसे लगने लगा अब वो अपनो से ही हार जायेगी। अब उसे उसी नर्क में लौटना होगा। सारे ज़ख्मो की टिसें फिर से उठने लगी थीं। फिर उसने बाबू जी से कह दिया " ठीक है मे चली जाऊंगी फिर से वहाँ पर एक शर्त पर के वो मेरी सारी शर्तें मानें। अगर ना मानी तो नही जाऊंगी फिर चाहे मुझे अपनी बेटी को ले कर कहीं दूर ना चले जाना पड़े। कह दीजियेगा सब से के मर गई आपकी बड़ी बेटी। " सुलोचना ने वैसा ही किया। सुलोचना ने शर्तें लिख के कोर्ट में पेश कर दीं। शर्तों में उसने बस अपना और बेटी का अधिकार माँगा जिस पर उनका पूरा अधिकार था। 
 
वो पढ़ना चाहती थी नौकरी करना चाहती थी। उसे मारा ना जाये , गंदी गालियाँ ना दी जायें। बेटी को हीन भावना से ना देखा जाये , उसकी और बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाया जाये। सब ऐसी ही शर्तें थी। पर ये सब सुनते उसका पति एक दम से मुकर गया के वो ये सब नही कर सकता। बस फिर क्या था फैसला सुलोचना के हक में रहा। केस अब आगे बढ़ेगा। या तो सुलोचना को उसका हक्क मिलेगा या इनको अपनो किये की सज़ा। सुलोचना खुश थी। 
 
अब बाबू जी को भी समझ आ गया था के उसका फैसला गलत नही था। सुलोचना का आत्मविश्वास और बढ़ गया है। वो लड़ती रहेगी। उसने हार नही मानी किसी मुश्किल के आगे। पर अभी लड़ाई बाकी है  उसे अपना अधिकार लेना है। पर उसे अब यकीन है के जो सोचा वो कर लेगी। ये कहानी नही सच्चाई है। ऐसी सच्चाई जो यहाँ आम तौर पर देखने को मिल जाती है। पर अफ़सोस कितनी बहनें ये हिम्मत नही जुटा पातीं जो सुलोचना ने जुटा ली। संस्कारी बनाना बहुत अच्छी बात है पर वहाँ पर जहाँ इनकी कदर हो वहाँ नही जहाँ इनका फायदा उठाया जाता हो। 
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#Stopdomesticviolance


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