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@dawriter

साढ़े तीन ऑंखें

0 299       
dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

#साढ़े_तीन_ऑंखें (लंबी कहानी)

रास्ते अलग थे मगर एक ठहराव सा था जहाँ दोनों की साढ़े तीन आँखें अक़सर मिल जाया करती थीं। हाँ, साढ़े तीन ही तो । सबके लिए तो चार थीं मगर मेघा को उसकी बाईं आँख से धुंधला सा दिखता था । इधर धनंजय की दो आँखें और मेघा की दो में से आधी धुंधली यानी डेढ आँखें कुछ क्षणों के लिए एक हो ही जाती थीं । वही कुछ एक क्षण होते जो धनंजय के पिछले दिन की मनहूसियत को कुछ समय के लिए एक अंजाने अहसास से ढक देते थे ।

मेघा की वो बाईं आँख जो धुंधला देखती थी, के पास एक काला सा निशान था। धनंजय की आँखें जब उसकी आँखों से मिलती तो धनंजय का मन ज़ोर से इस बात के लिए धड़कता कि वो जाए और उसके उस काले निशान को अपनी नज़रों से सहला कर पूछे कि "ये निशान कैसा ?" मगर इधर मेघा ये सोच कर उस निशान से डरती कि कहीं धनंजय उससे पूछ ना ले कि ये निशान कैसा है ? वह भला क्या बताएगी उसे? कैसे कहेगी कि उसके किसी अपने के बेहद प्रेम और दुलार की निशानी है वो निशान और उसकी आँख का धुंधलापन।

इधर एक सवाल मेघा के मन में भी रोज़ उठता जब वह धनंजय के अधमैले कपड़े और हर रोज़ उसका सूखते परवल की तरह पीला पड़ता जा रहा चेहरा देखती तो। धनंजय भी यह सोच कर डर जाता कि कैसे वह उसे बता पाएगा कि उसकी हालत ऐसी किस कारण होती जा रही है ।

ख़ैर इन दोनों के डर बेवजह थे क्योंकि ना धनंजय इतनी हिम्मत कर पाता कि वह मेघा के पास जा कर उससे कुछ बात करे और मेघा तो ख़ैर थी ही औरत, उसका तो सवाल ही नहीं उठता । तो रास्ता एक ही बचता था और वो ये कि दोनों उस बस स्टाॅप पर बस एक दूसरे को क्षण भर के लिए देखा करें और फिर कुछ देर के लिए सब कुछ भूल जाएं ।

इस तरह दोनों को एक दूसरे को देखते आज तकरीबन साढ़े पाँच महीने हो गये हैं। मगर कुछ ऐसा संयोग कभी बना नहीं कि दोनों एक दूसरे से कभी हाल ख़बर भी पूछ सके हों। दोनों को तो एक दूसरे के बारे में इतना तक नहीं पता था के वो रहते कहाँ हैं और यहाँ से बस ले कर जाते कहाँ हैं । आज दोनों छुट्टियों के कारण तीन दिन बाद एक दूसरे को देख रहे थे । धनंजय का चेहरा पहले से ज़्यादा सूख चुका था और इधर मेघा का चेहरा ऐसे सूजा हुआ था जैसे पूरा चेहरा एक मवाद से भरा घाव हो । मेघा ने अपने दुपट्टे से अपना चेहरा ढक रखा था मगर आज दर्द पहले से कहीं ज़्यादा था इसलिए चेहरा दुपट्टे का बोझ बर्दाश्त ना कर पा रहा था ।

आज धनंजय ने इन महीनों में पहली बार इतनी ग़ौर से मेघा के चेहरे का दीदार किया था। और जितनी देर वह उसके चेहरे को निहारता रहा उतनी देर आज उसके कलेजे में दरार पड़ती रही । ऐसा हो रहा था मानों जैसे धनंजय की आँखें मेघा के चेहरे के घावों का सारा दर्द चूस कर अपने कलेजे में जमा कर रहा हो । आज नियती कोई नया खेल दिखाने का सोच रही थी शायद इसीलिए दोनों की दो दो बसें निकल गयीं मगर दोनों ने उस तरफ़ ग़ौर ना किया। इधर शायद मेघा आज किसी कंधे की तलाश में थी जो उसके चेहरे में जमे सारे मवाद को अपना सहारा दे कर उसकी आँखों के रस्ते बह जाने मे मदद करे। मगर शायद उसके दर्द की चोट में अभी इतना दम नहीं था कि अपनी हया की बेड़ियों को तोड़ सके इसीलिए उसने अपनी तीसरी बस में चढ़ गयी । कुछ देर तक धनंजय सोचता रहा कि आखिर उसके साथ क्या हुआ होगा और सोचते सोचते उसे ख़याल आया कि आज मेघा जिस में चढ़ी वो बस उसके रोज़ वाली बस नहीं थी ।

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इतना सोचते ही उसका मन ना जाने क्यों घबराने लगा और वो बिना देर किये मेघा की बस के पीछे भागने लगा जो अभी बस स्टाॅप से निकल ही रही थी । मेघा आगे से तीसरी सीट पर बैठी थी और धनंजय मेघा से छुप कर सबसे पीछे वाली खिड़की के पास खड़े कुछ यात्रियों के पीछे छुप गया। पैंतालिस मिनट के उस सफ़र के दौरान धनंजय दिल और दिमाग की बहस में उलझा रहा। दिमाग कह रहा था कि ये सब सही नहीं तुझे रुक जाना चाहिए और दिल कह रहा था कि अगर आज रुक गया तो कुछ ना कुछ बुरा ज़रूर हो जाएगा। सफ़र का अंत होते होते हमेशा की तरह दिल अपने भावुकता भरे तर्कों के कारण जीत गया और दिमाग को उसके आँसू पोंछते हुए उसकी बात माननी पड़ी।

स्टाॅप आ चुका था मगर यह तो घाट का स्टाॅप था यहाँ भला मेघा क्या करने आएगी। मेघा उतर चुकी थी और धनंजय बस की ओट में उसके आगे बढ़ने का इंतज़ार कर रहा था। मेघा ने घाट का रास्ता पकड़ लिया मगर ये उस तरफ़ नहीं जा रही थी जहाँ सब लोग जाते हैं, ये तो जंगल वाला रास्ता था। धनंजय धड़कते हुए मन के साथ उसके पीछे पीछे चल पड़ा। ना जाने क्यों उसे एक तरफ लग रहा था कि ये गलत कर रहा है वो और दूसरी तरफ उसे लग रहा था कि हाँ ये गलत है मगर इस गलत में ही कुछ सही भी छुपा है। दस मिनट चलने के बाद मेघा एक जगह पर पहुंची जहाँ से नदी की धार बहुत तेज़ और गहरी थी। धनंजय का मन दहल उठा, वो समझ गया हो ना हो मेघा कुछ गलत करने जा रही है। मेघा कुछ आगे बढ़ी और एक बड़े से पीपल के नीचे ज़मीन पर बैठ कर रोने लगी। वो ज़मीन का टुकड़ा जहाँ मेघा बैठी थी वो बाकी हिस्से से अलग था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वहाँ से मिट्टी खोदी गयी और फिर उस गड्ढे को भर दिया गया हो ।

धनंजय थोड़ी दूर से ये सब देखता रहा। मेघा के आँसू देख कर उसका मन फट रहा था और कह रहा था कि वो जाए और उसके आँसू पोंछ ले मगर धनंजय पहले ही उसका पीछा कर के गलत कर रहा था और अब और गलत नहीं करना चाहता था इसलिए उसने यहीं इंतज़ार करना सही समझा। कुछ देर मेघा वहाँ बैठी रोते हुए कुछ कुछ बुदबुदाती रही और फिर उठ कर घाट की तरफ बढ़ गयी जहाँ से नदी की धार एक दम तेज़ थी। अब धनंजय को सब चुपचाप देखते रहना ग़वारा ना हुआ इसीलिए वो भागते हुए मेघा की तरफ बढ़ा। मेघा नदी के नज़दीक पहुंचने ही वाली थी कि धनंजय ने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया।

"क्या कर रही हैं आप?" दिमाग तो नहीं ख़राब हो गया आपका?"उसने हाँफते हुए कहा। धनंजय कमज़ोर होता जा रहा था इसलिए उसकी साँस जल्दी फूलने लगती थी।

"आप तो वो बस स्टाॅप वाले हैं ना?" एक क्षण के लिए धनंजय वो सब भूल गया जो यहाँ हो रहा था उसके मन में कुछ देर के लिए ये सोच कर खुशी छा गयी कि मेघा उसे पहचानती है।

"वो सब छोड़िए, ये बताईए कि ये क्या पागलपन है?" धनंजय अपनी खुशी को किनारे करता हुआ बोला

"मतलब आप मेरा पीछा कर रहे थे?" रणभूमी जैसे क्षतविक्षत अपने चेहरे में से उसकी दो घायल आँखें हिम्मत कर के आश्चर्यभाव के कारण थोड़ी बड़ी हो गयीं। उसके दर्द से भरे चेहरे में अभी सबसे प्यारी उसकी दो चमकती हुई आँखें ही लग रही थीं। भले ही मेघा की एक आंख भीतर से कमज़ोर थी मगर बाहर से वो उतनी ही सुन्दर थीं जितनी सुन्दर आँखों का अधिकारी था मेघा का मुख।

"आप बात को घुमाईए नहीं। आपको पता नहीं आत्महत्या करना हत्या करने जितना ही बड़ा पाप है।" उसकी बड़ी और गहरी आँखों में खुद को डूबने से बचाते हुए धनंजय थोड़ा तैश में बोला।

"आत्महत्या? आपसे किसने कहा मैं आत्महत्या करने जा रही थी?" जितना आश्चर्य बढ़ रहा था उतनी ही मेघा की आँखें फैलती जा रही थीं।

"तो नदी में मछली पकड़ने जा रही थीं आप?" वैसे ऐसा बोलने के बाद धनंजय को अहसास हुआ कि उसने काफी घटिया उदाहरण दिया है।

"जल लेने जा रही थी। नदी में बस कूदा ही नहीं जाता। और मैं चाह कर भी आत्महत्या नहीं कर सकती।" मेघा की आँखें फिर से सुकुड़ गयी थीं और अपने अंदर के बचे खुचे आँसुओं को निचोड़ने लगी थीं।

"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मैने तो यही देखा कि आप उस भरे हुए गड्ढे के पास.....।" आधी बात धनंजय के मुंह में ही शर्म से गल गयी जब मेघा ने उसकी बात काट कर बोलना शुरू किया तो।

"गड्ढा नहीं है वो। मेरी बेटी सोयी है वहां। जिसे मेरे सामने ही मार कर दफ़नाया गया और मैं अभागिन सिर्फ देखती रह गयी। दो दिन की थी वो सिर्फ दो दिन की। जैसे तैसे पैदा किया था उसे, शरीर से कमज़ोर पैदा हुई मगर दिल से मजबूत थी। जीना चाहती थी मगर उसे जीने नहीं दिया गया क्योंकि उसे बचाने में खर्चा लगने वाला था और वो बेटी थी उस पर खर्चा भला क्यों करता मेरा पति।" नदी की धार ने अपना रास्ता बदल कर मेघा की आँखों से बहना शुरू कर दिया था। इधर धनंजय ज़मीन में गड़ा जा रहा था।

"मेरा नाम मेघा दीक्षित है। छोटे से शहर की बड़े सपने देखने वाली लड़की थी मैं। सपना भी कुछ ऐसा जो बच्चपन से दिखा दिया गया, अच्छे लड़के से शादी का, अच्छे से घर सजाने का, अपने पति से बहुत सा प्यार पाने का। सपने तो थे मगर उम्र नहीं थी शादी की अभी, मगर कर दी गयी ये कह कर कि रिश्ता अच्छा है, लड़का सरकारी नौकरी में है, अच्छा कमाता है, देर की तो हाथ से निकल जाएगा और वैसे भी एक ना एक दिन तो शादी करनी ही है फिर समय पर क्यों न कर दें? मैं संस्कारी थी कैसे टालती बात को, कर ली शादी। अपने पिता के घर से अच्छी पत्नी, अच्छी माँ बनने का सपना ले कर विदा हुई थी, मगर मेरा सपना तब टूट गया जब पहली ही रात मुझे पति नहीं बल्कि हवस के नशे में धुत एक हैवान मिला। जिसने शायद जिस्म की भूख मिटाने के लिए ही शादी की थी। मगर मैं तब भी गलत साबित हुई क्योंकि वो बस जिस्म का भूखा ही नहीं बल्कि पैसों का भूखा भी था। दहेज के बाक़ी पैसे समय पर ना मिलने की वजह से रोज़ गंदी गालियाँ देता। गालियाँ ही थीं, उनसे क्या फर्क पड़ता है, यही सोच सुनती रही। मगर फर्क पड़ा, तब पड़ा जब गालियाँ मार में बदल गयीं। हर बात पर मार। दहेज मिल गया तब भी मार। खाना अच्छा नहीं लगा तब भी मार, ऑफिस में कुछ हुआ तब भी मार, यहाँ तक की बेटी पैदा हुई तो उस हाल में जब शरीर अपनी सारी ताक़त खो देता है तब भी मुझे दो थप्पड़ एनर्जी डोज़ लेना पड़ा। ऊपर से बेटी का इलाज किये बिना उस मासूम को मरने दिया और मैं देखती रही।" आज मेघा नहीं बोल रही थी, वो किसी अंजान के सामने इतना बोल भी नहीं सकती थी। आज तो बस उसका दर्द बोल रहा था। वो दर्द जो निकलना चाहता था मगर कभी कोई मिला ही नहीं जिसके सामने निकल सके।

"मैं माफ़ी चाहता हूँ। मुझे लगा कुछ गलत ना हो जाए मैने बस इसीलिए आपका पीछा किया। और यहाँ आकर मुझे मेरा अंदेशा सच में बदलते हुए दिखा तो मैं आपको रोकने सामने आगया।" धनंजय का मन पहले ही अपने कारणों से दुःखी था और अब तो अपराधबोध भी उसके मन का एक कोना हड़पने लगा था।

"नहीं माफ़ी मत माँगिए। आपने जाने अंजाने में मेरी मदद ही की है। मैं अपना ये दुःख और पश्चाताप अपने मन में ही दबा कर चली जाती इस दुनिया से। मगर आपने मेरा दुःख बहुत कम कर दिया। वैसे तो आपको कुछ कहने का मेरा कोई अधिकार नहीं मगर मेरे पास कोई और नहीं है जिससे मैं मदद माँग सकूँ।" मेघा ने हिचकिचाते हुए धनंजय से कहा।

"आप निसंकोच कहिए। मुझे खुशी होगी अगर मैं आपके किसी काम आ सकू।" धनंजय ने उसे यकीन दिलाया।

"मेरा मन तब तक शांत नहीं होगा जब तक मैं अपनी बच्ची का अंतिम संस्कार ना कर दूँ। मगर मैं ये सब अकेले नहीं कर सकती, अगर आप मेरी मदद कर देंगे तो आपकी आभारी रहूँगी हमेशा।" धनंजय के मन की कहें तो एक क्षण उसने सोचा कि वह खुद इतना परेशान है ऊपर से ये सब मगर फिर उसके मन ने उसे कहा कि ये बेसहारा है क्या पता इसकी मदद से तेरा दुःख कुछ कम हो जाए।

"जी ठीक है, मैं आपकी हर तरह से मदद करूंगा।"

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मेघा ने धनंजय से कहा कि वह आज ही सब करना चाहती है क्योंकि फिर उसे इधर आने का मौका ना जाने कब मिले और वो तब साथ हो ना हो। काफ़ी सोचने के बाद धनंजय मान गया और यथा संभव जो सामग्री उसे पता थी वो सब और साथ में खोदने के लिए फावड़ा किसी ना किसी तरह वह घाट पर बनी दुकानों से इकट्ठी कर लाया। लकड़ियाँ उसने जंगल से इकट्ठी कर लीं। अब उसने खोदना शुरू किया। दिन बीतता जा रहा था। बस एक आध घंटे में शाम घिर आने वाली थी। धनंजय को ज़्यादा नहीं खोदना पड़ा क्योंकि जिस हैवान ने शरीर को दफनाया था उसने ज़्यादा खुदाई नहीं की थी। यह तो चमत्कार ही था कि अभी तक उस शरीर की गंध जानवरों तक कैसे नहीं पहुंची थी। शरीर कंकाल में बदल चुका था मगर देखने वाली बात थी कि कंकाल आकार में बड़ा था। पर इस समय धनंजय का ध्यान सिर्फ उसका अंतिम संस्कार पूरा करने पर था । जितना समय वो ये सब करता रहा उतनी देर मेघा एक तरफ़ बैठी रोती रही।

इंसान का मन बहुत पवित्र होता है, कठोर या कोमल होना ये बस उस इंसान के वातावरण और परिस्थियों पर निर्भर करता है जिसमें वो पला और बड़ा हुआ। हम सब ने इतिहास पढ़ा है और हमने यह भी देखा कि कितने डाकू संन्यास ले कर प्रभु भक्ति में लीन हो गये तो कितने कोमल ह्रदय वाले इंसानों को भी हथियार उठाने पड़े। यह सब परिस्थियाँ तय करती हैं और आप उनके अनुसार अपने मन को कठोर या कोमल बना देते हो। धनंजय बेश्क अपनी परिस्थियों से तंग था परंतु उसे अहसास था कि एक दुःखी इंसान किस तरह से किसी ऐसे को खोजता है जो उसकी मदद कर सके। भले ही ऐसा कोई उसे ना मिला हो मगर वो मेघा को मिल गया था और अब वो हर तरह से उसकी मदद करना चाहता था।

मेघा के कहने पर धनंजय द्वारा चिता को आग लगा दी गयी। आग की लपटों से उठ रहा धुआँ पश्चिम की तरफ ऐसे बढ़ रहा था मानो आज सूरज को असात करने की ज़िम्मेदारी उसी ने उठाई हो। मेघा के आँसू रोके नहीं रुक रहे थे। धनंजय ने मेघा को ढाढस बंधाया और शाम का हवाला दे कर उसे चलने को कहा। अजीब विडंवना है जगत की, हमारे ही आस पास एक ही तरह के चेहरे, एक ही तरह की बनावट मगर सोच सबकी अलग अलग। मेघा अपने पति को पुरुष कह कर कोसती भी तो कैसे, आज उसकी मदद भी तो एक पुरूष ने ही की थी। वो भी ऐसा पुरुष जो शायद खुद किसी विकट परिस्थिती में फंसा हुआ था।

"अब आप जाओ मैं पीछे से आती हूँ। कहीं हमें किसी ने साथ देख लिया तो बात बिगड़ जाएगी।" धनंजय का मन था कि वह मेघा को साथ ले कर जाए मगर उसे मेघा की बात भी सही लगी।

"आप ही आगे जाईए, अंधेरा बढ़ने लगा है आपका अकेले आना सही नहीं होगा।" धनंजय ने मेघा की आँखों में देखते हुए कहा।

मेघा ने धनंजय की बात मान ली और धीरे धीरे ठंडी पड़ रहीं आग की लपटों को एक ममता भरी नज़रों से निहार कर अपनी रस्ते निकल पड़ी। मेघा के जाने के बाद धनंजय कुछ मिनटों तक उसके ही बारे में सोचता रहा। उसे इस समय अपनी किसी परेशानी का ख्याल नहीं था अंदर से अजब सी स्फूर्ति महसूस कर रहा था। अब उसकी आँखों के सामने मेघा का चेहरा था। कुछ देर में जब उसका ध्यान टूटा तो उसने देखा सुनहरी शाम को अँधेरे ने अपनी काली चादर ओढ़ा दी है, चिता की आग भी अब ठंडी पड़ गयी है। नदी का पानी बढ़ते ही उसकी धार अस्थियां जो अब रख बन गयी हैं को अपने साथ बहा ले जाएँगी। धनंजय ने मोबाईल में टार्च जलाई और में सड़क की और निकल पड़ा। उसे पूरा विश्वाश था कि मेघा वहीं उसका इंतजार कर रही होगी और वो कुछ देर और मेघा के चहेरे को निहारता हुआ अपनी आँखों और मन को सुकून पहुंचा लेगा।

मगर ऐसा हुआ नहीं मेघा जा चुकी थी। धनंजय कुछ देर मायूस हुआ मगर फिर होनी को प्रबल मन कर बस में बस में चढ़ गया। घर पहुंचा तो गाँव से चिठ्ठी आई थी उसके पिता जी की जिसमें लिखा था कि उनकी विवादी जमीन का फैसला अपने हक़ में आया है और उसे चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं, इस ज़मीन को बेच कर उसकी माँ का इलाज हो जायेगा। अब उसे दिन रात इस बारे में सोचने की कोई ज़रुरत नहीं और हो सके तो तीन चार दिन के लिए छुट्टी ले कर घर आजाए।

चिठ्ठी पढ़ कर धनंजय की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वो सोचने लगा कल वो मेघा को मुस्कुरा कर मिलेगा और इशारे में बता देगा कि अब उसकी परेशानी ख़तम हो चुकी है। ख़ुशी के मरे उसे देर रात तक नींद ना आई। अब उसकी माँ ठीक हो जाएगी और उसके ईलाज के लिए उसे सोच सोच कर अंदर ही अंदर जलना नहीं पड़ेगा। यही सब सोचता हुआ वो सो गया। सुबह तैयार हो कर जब वो बस स्टॉप पर पहुंचा तो उसे मेघा कहीं नहीं दिखी। उसकी एक झलक पाने के लिए धनंजय ने अपनी दो तीन बसों को निकल जाने दिया मगर आज मेघा ना आई थी। थोड़ी मायूसी के साथ उसने अंत में अपनी बस पकड़ ली और अपने ऑफिस पहुँच गया। उसने मन को कल का वास्ता दे कर समझाया मगर कल भी मेघा नहीं दिखी, इसी तरह मन को कल की आस में टालते हुए उसने 20 दिन बिता दिए मगर मेघा उसने ना दिखी।

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आज मायूस सा वो अपने ऑफिस पहुंचा तो उसे मालूम पड़ा कि ब्रांच हेड “निरंजन” जो पिछले कई दिनों से बीमार थे की हालत बहुत ख़राब हो चुकी है। डॉक्टर ने बताया है की उन्हें आखरी स्टेज का लीवर कैंसर है जो बहुत ज्यादा शराब पीने से हुआ है और अब ये कुछ दिनों के मेहमान ही हैं। सारा स्टाफ़ आज उन्हें उनके घर देखने जा रहा था। धनंजय भी सबके साथ उनके घर गया। धनंजय सहित बाक़ी सबके हाथों में फूल थे। निरंजन सर बिस्तर पर पड़े हुए थे। कुछ महीने पहले तक हट्टे कटते निरंजन सर आज मुठ्ठी भर हड्डी में बदल चुके थे। सबको देख कर मुस्कुराना चाह मगर मुस्कुरा भी न पाए।

धनंजय साफ़ दिल इंसान था किसी की तकलीफ़ देख कर पिघल जाता था, निरंजन की ऐसी हालत देख उसका मन पिघलने ही वाला था की उसकी नज़र सामने टंगी तस्वीर पर गयी। शायद यह तस्वीर निरंजन सर की शादी की थी। धनंजय ज्यों ज्यों तस्वीर में अपनी नज़रें गड़ाता गया त्यों त्यों आश्चर्य के भाव भावुकता के भावों को मार कर उसके चेहरे पर अपना कब्ज़ा ज़माने लगे। उसके आश्चर्य का कारण था तस्वीर में निरंजन सर के साथ मेघा का दुल्हन के रूप में खड़ा होना। सब लोग निरंजन सर के लिए दुखी थे मगर धनंजय को अब निरंजन सर का ज़रा ध्यान नहीं था, वो तो अब यहाँ रहा ही नहीं था। धनंजय के बगल में निशांत बैठा था उसे धनंजय की ये हरकत अजीब लगी इसी लिए उसने धनंजय को कुहनी से टोका। धनंजय को उसके टोकते ही ऐसा लगा जैसे पानी में डूबा आदमी एक दम से पानी से बाहर आने पर महसूस करता है होगा।

“निशांत वो तस्वीर में निरंजन सर के साथ कौन है?” स्थिति की नाजुकता की परवाह किये बिना धनंजय ने निशांत से पूछा।

“वो निशांत सर की पत्नी हैं?” निशांत से ये सुनते ही जहाँ उसका मन निरंजन के लिए क्रोध से भर गया वहीं वो एक पल के लिए यह सोच कर स्वार्थी भी हो गया कि इसी बहाने उसे मेघा को देखने का मौका मिल जायेगा।

“वो नज़र नहीं आरही हैं?” धनंजय ने उत्सुकता से पूछा ।

एक पल के लिए धनंजय को घूरते हुए फिर उसकी बात का जवाब दिया निशांत ने “पांच छः महीने पहले वो अचानक से लापता हो गयीं, निरंजर सर ने बहुत हाथ पैर मारे उन्हें ढूंढने के लिए मगर उनका कहीं पता नहीं चला। काफ़ी दिनों बाद पुलिस को उनके कपड़े और कुछ सामान मिला जिससे ये साबित होगया कि किसी ने उनका खून कर दिया है। सब कहते हैं निरंजन सर उन्ही के दुःख में इतनी शराब पिने लगे की उन्हें कैंसर होगया।” इसके बाद भी निशांत ने काफ़ी कुछ बोला मगर धनंजय के कानों तक अब कोई आवाज़ कहाँ पहुँच रही थी।

वो तो अब एक दम सुन्न था यह सोच कर कि अगर महीनों पहले वो इस दुनिया से जा चुकी हैं तो भला वो कौन थी जिसे महीनों से वो देख रहा था और 20 दिन पहले जिसके साथ उसने सुबह से शाम तक समय बिताया। सब लोग अब निरंजन के घर से चलने को तैयार थे। निशांत ने धनंजय को भी उसके खयालों से जगाया। धनंजय ने एक नज़र निरंजन पर डाली और सब भूल कर मन ही मन कहा “भले ही दुनिया कुछ भी समझे मगर तुम जानते हो कि ये तुम्हारे कर्मों का फल है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर अपने अपराध का बोध करा रहा है। तुम्हें तुम्हारी सज़ा मुबारक हो मिस्टर निरंजन दीक्षित।” जाते जाते धनंजय ने वो फूल जो वो निरंजन के लिए जाया था, कचरे के डिब्बे में फेंक दिए।

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घर आकर जब वो बिस्तर पर लेटा तो उसके आँखों के आगे उसकी हर वो बात सामने आ रही थी जिस पर धनंजय ने तब गौर नहीं किया था। मेघा ने कहा था कि वो चाह कर भी आत्महत्या नहीं कर सकती, साथ ही साथ उसे ये भी समझ आ गया कि वो शव जो मेघा ने अपनी बेटी का बताया था वो बड़ा क्यों था, असल में वो उसका और उसकी बेटी का शव था जिसे एक साथ ही दफना दिया गया था। असल में मेघा मेरे हाथों अपना और अपनी बेटी का दाहसंस्कार करवाना चाहती थी। यही कारण था कि जब मैं बस स्टॉप पर उसे देखा करता था तो आने जाने वाले लोग मुझे अजीब तरह से देखते थे। मगर उसने मुझे ही क्यों चुना? अगर वो जिंदा नहीं थी तो उसके चहरे पर लगी चोट रोज़ बदती कैसे जाती थी?

ऐसे ही कुछ अनसुलझे सवालों का जवाब ढूंढते हुए धनंजय सो गया। आधी रात के समय उसे लगा जैसे कोई उसके सामने हाथ जोड़े खड़ा है। उसने सामने देखा तो मेघा खड़ी थी। धनंजय जानता था कि वो मेघा की आत्मा है फिर भी वो न जाने क्यों घबराया नहीं बस उसे देखता रहा।

“इस संसार में हर तरह का रिश्ता वो नियती जोड़ती है, मैंने आपको नहीं चुना था, ये आपके भाग्य का निमंत्रण था मेरे भाग्य को इसीलिए मैं इस पुरे संसार में सिर्फ आपको ही दिखी। मेरा गति आपके ही हाथों लिखी थी। मुझे तो पता भी नहीं था आप मुझे देख सकते हैं। पहले दिन जब आपकी निश्छल आँखों ने मेरी आँखों में झाँका तो मैं खुद हैरान रह गयी कि ये कैसे संभव हुआ। फिर मुझे समझ आगया कि नियती ने ही आपको मेरे लिए चुना है। वो जो घाव मेरे रोज़ दिन बढ़ते जाते थे वो मेरे अंदर का कोलाहल था, मेरे अंदर की बेचैनी थी क्योंकि ये संसार अब मेरे अनुकूल नहीं रह गया था। मुझे इस बात का अफ़सोस है कि अपनी और अपनी बेटी की मुक्ति के लिए मुझे आपको अपनी तरफ आकर्षित करना पड़ा मगर मेरा यकीन मानिये ये सब भावी था और मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। मुझे आप भले ही माफ़ ना करें मगर मुझे यकीन है कि एक माँ की पीड़ा को समझते हुए उसे ज़रूर माफ़ कर देंगे।” मेघा अपनी पूरी बात कह कर चुप चाप हाथ जोड़ मेरे सामने खड़ी रही। धनंजय बहुत कुछ बोलना चाहता था मगर उसे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे होंठों पर किसी ने हाथ रख के दबा दिया हो। मैं नम आँखों के साथ मुस्कुराने के सिवा कुछ न कर पाय । आखरी बार उन दोनों की साढ़े तीन ऑंखें मिलीं। धनंजय ये महसूस कर रहा था कि मेघा की आधी आंख अब पूरी हो चुकी है क्योंकि उसकी आँखों के धुंधलेपन की जगह अब उसके मन की संतुष्टि ने ले ली है।

“आपकी सारी कठिनाइयाँ दूर हों।” इतना कहते ही मेघा जाने लगी और धनंजय कुछ देर अभी और उसकी आँखों में झांकना चाहता था मगर समय निकल चुका था। मेघा जा रही थी, अचानक से धनंजय को लगा उसके मुंह पर रखा हाथ अब उठ चुका है, वो अब बोल सकता है। धनंजय ने जोर से मेघा को पुकारा और इसी के साथ धनंजय की आंख खुल गयी। मेघा जा चुकी थी। वो तो बस धनंजय को शुक्रिया कहने आई थी।

आंसुओं के पास बड़ी क्षमता होती है, ख़्वाब हकीक़त में आते ही टूट जाते हैं मगर आंसुओं में इतनी क्षमता है कि वो ख़्वाब से हकीक़त का सफ़र करते हुए भी अपना वजूद बनाये रखती है। धनंजय ने अपनी आँखों को पोंछा और मन ही मन कहा “तुम माफ़ी की नहीं धन्यवाद की अधिकारी हो मेघा। भगवन तुम्हारे तुम्हारी आत्मा को शांति दें।”

धीरज झा



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