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@dawriter

लघुकथा- रिश्तों की नीलामी

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पूरे गाँव में एक ही चर्चा का विषय चल रहा था कि सेठ लाभचंद जी के घर कब शहनाई की गूंज उठेगी? और ये बात हो भी क्यूं नहीं, सेठजी का छोटा बेटा जयंत 35 पार जो हो चला था और कहीं कोई रिश्ता बैठ नहीं रहा था। दूसरी बात ये कि बड़े बेटे की पत्नी भी दिमागी बुखार से पिछले वर्ष चल बसी, अब सेठानी के बहु का सुख है कि नहीं ये भी चिंता सता रही। आखिर एक वर्ष बाद छोटे बेटे जयंत के लिए सेठजी दूर-दराज के इलाके से गरीब परिवार की बहु ले ही आए और एक मामूली रस्म निभा कर गाँव वालों को भोज निमंत्रण भेज दिया गया। हम भी गए वहाँ, देखा बड़े ठाठ-बाट से भोज चल रहा पर बहु परदे में दिखी। मैंने तो सेठानी से बात कर उनकी बहु को देखने की इच्छा जताई तो वे खुद मिलवाने ले गई, बहुत सुंदर -सी बहु लाए थे सेठजी, नाम सुनैना तो रूप भी वैसा। उम्र में कम लगी पर सेठजी का परिवार खुश तो किसी काे कुछ कहने की कहाँ जरूरत।

अब गाँव की बैठकों में सेठजी के पोते-पोती की बात ही चलती। सब सेठ जी के अच्छे भाग्य की बात करते रहते पर मेरे दिमाग में चल रहा कि कभी-कभार मंदिर या बाजार में सेठानी के साथ दिखने वाली सुनैना आजकल नज़र ही नहीं आती, जाने क्या हुआ, कहीं कोई खुशखबरी तो नहीं? ये विचार चल ही रहे थे मन में और मै छत पर कपड़े सुखाने चल दी, अचानक मेरी नजर सेठ जी के घर की छत पर पड़ी, देखा कि छत पर एक औरत सिर पर हाथ रखे बैठी थी, उसने घुंघट-सा कर रखा था कि जैसे कोई देख ना ले। पिछली गली में जरा़ दूर घर होने के कारण मुझे ज्यादा साफ दिखाई नहीं दिया पर कद-काठी और पहनावे से यही लगा कि हो ना हो पर सुनैना ही हो सकती थी। मैं नीचे आ गई पर उस दिन सारा ध्यान सोच में ही रही और रात को यही चिंतन में रही कि सुनैना को क्या हो सकता है जो इस तरह बैठी दिखी। अगली सुबह मैं फटाफट अपना काम समेट सब्जी के बहाने घर से निकली और सेठ जी के घर पहुँची, बाहर ही सेठानी दिख गई मैनें उनका हाल-चाल पूछ सुनैना के बारे में बात शुरू की। सेठानी तो जैसे प्रशंसा की झड़ी लगा बैठी कि "लाखों में एक है हमारी सुनैना, बहुत मान रखती है हमारा, कभी पलट के जवाब तक नहीं देती, बहुत समझदार बहु मिली है हमें". मैनें सुनैना से मिलने की इच्छा जताई तो सेठानी ने भीतर की ओर इशारा किया और खुद मंदिर की ओर चली गई.

मैंने सुनैना को आवाज़ लगाई, वो आई और बोली "दीदी नमस्ते! चाय या ठंडा क्या लाऊँ आपके लिए? " मैंने कहा " कुछ नहीं ..बस तुम पास बैठो मेरे, मैं तुमसे मिलने आई हूँ, ...कहो कैसी हो? "

वो बोली.."किस्मत अच्छी है दीदी, जो इस घर की बहु बनी, रानी जैसे रखते है सब मुझे, ना काम ना अपमान और आराम ही आराम" पर उसके चेहरे के भाव कुछ और कहानी कह रहे थे, उसकी नज़रें मुझे दूर करना चाह रही थी।

मैनें अचानक से उसका हाथ पकड़ा और कहा, "तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूं, बताओ क्या हुआ? मैं छत पर तुम्हें उस दिन देख चुकी, क्या तकलीफ है तुम्हें ? शायद तुम्हारी मदद कर पाऊँ, मैं किसी से नहीं कहूंगी...तुम्हारी कसम" और मेरे इतना कहते ही उसकी फफक कर रोना शुरू हुआ, मैनें उसे सम्भाला, अपने पास बिठा कर पानी पिलाया और कहा " क्यूं रोती हो, मैं हूं ना, बोलो क्या हुआ?"

उसने कहा, " पाँच लाख रूपए बाबुजी को दिए थे सेठ जी ने और मुझे इस घर की बहु बनाकर लाए, मुझसे शादी का नहीं पूछा गया और सबकुछ दोनों ने तय कर लिया. मेरी माँ ने मुझसे कहा, बड़े पैसे वाले सेठ है, नौकर चाकर सब हैं.. तू बैठी राज करेगी। मैं माँ से कुछ नहीं कह पाई क्युंकि उनको जो रूपए मिले उससे मेरे परिवार काे बहुत सहयोग मिला था। यहाँ आए मुझे एक-दो महिने सही बीते लेकिन बाद में मुझे जोर-जबरदस्ती से हर दो रात बात जेठ जी के कमरे में भेजा जाने लगा। मेरे विरोध करने पर ये कहा, ...तुझे खरीद कर लाए हैं, हमारे दोनों बेटों को सुख देगी तो यहाँ टिकी रहेगी और अगर किसी से भी बच्चा हो जाए..होगा तो इस घर का वारिस ही..पोता-पोती तो हमारे ही कहलाएंगे।"

ये सुनने तक मेरी आँखे भर आई थीं, पर कुछ भी बोलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रही थी।

फिर उसने कहा, " ना तो मै पढ़ी-लिखी ज्यादा कि कोई नौकरी कर पाऊँ, मायके भी वापस कैसे जाऊँ ..कहीं बाबुजी से रकम माँग ले तो वे कैसे लौटाएंगें...फिर से परिवार के भूखे मरने की नौबत आ गई तो।"

...और सुनैना रोने लग गई, मैं उसे जैसे-तैसे चुप करवा के घर आ गई। पर प्रश्न आज भी मन में कि " क्या औरत इतनी निर्बल हो जाती है कि ससुराल की दी हर सजा आजीवन किस्मत मानकर काटनी पड़ती है?

क्या सुनैना जैसी लड़कियाँ किस्मत का नाम ले अपना शारीरिक शोषण भी करवाती रहे और मानसिक रूप से प्रताड़ित होकर जीवन जीए?

 #रश्मि



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