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@dawriter

तन के घाव से भारी मन के घाव जिनकी पीड़ा न समझे कोई

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नहीं सुमन, वो कहती है मेरी कोई आवाज़ ही नहीं है। तो फिर चीखना तो बहुत दूर की बात है। मै सोच में पड़ गयी कल ही तो मैने उसके चीखने की आवाज़ सुनी थी। जब उसके पति ने दाल में थोड़ा सा नमक ज्यादा होने पर सुमन को सात पुशते याद दिला दी थी। उसे दिए जाने वाले बाहरी जख्मों की चीख की दस्तक मेरे घर तक आ रही थी। मन किया कि जाऊँ पूछूं उसके पति से की किसने तुम्हें ये अधिकार दिया जो औरत अपने सारे सपनो का गला घोट कर घर को स्वर्ग बनाने मेंं जुटी रहती है तुम क्यो उसके जीवन को नक्र बनाने मे लगे रहते हो। पर रुक गई। ऐसे पता नहीं कितने बार मै रुक चुकी हूँ। नहीं जानती क्यो।

शायद सुमन सब कुछ भूल जाती है क्योंकि याद रखने का काम तो उसके जख्म करते हैं। उसकी आत्मा करती है जो घुट घुट कर मर रही है। तन के घाव सब को दिखते हैं पर मन के घाव किसी को नहीं। ऐसा नहीं है कि महिलाओं के साथ केवल शारिरिक हिसां होती है। हर तरह का शोषण उसे सहना पड़ता है मानसिक तो कभी भावात्मक। कभी अपने घाव देते है तो कभी पराये।

तुलना व्यक्ति का स्वभाव है जैसे पत्निया पतियों से शिकायत करती हैं कि फला के पति ने उसे ये गिफ्ट दिया है वैसे ही कुछ पति ऐसे भी है जो अपनी पत्नियों से ये कहते है कि फला पति की तरह मै तुम्हें रोज तो नहीं मारता।

जब पति मारता है या अत्याचार करता है तो शुरू में हर औरत चुप रहती है सह लेती है कभी अपनी गृहस्थी के लिए, कभी माता पिता के सम्मान के लिए, तो कभी बच्चों के लिए। आधुनिक युग में सहना शब्द बदलकर समझदार कर दिया गया है। और जुमला हो गया है कि तुम तो समझदार हो। समझदार होने की कीमत औरतो को चुकानी ही होती है। घाव पे घाव सहने ही पड़ते हैं । चाहे हम जितनी ही आधुनिक समाज की बात कर ले आज भी यदि लड़की अपने ससुराल से शोषण सहने के बाद मायके वापस आ जाए तो समाज की भुकृटि तन जाती है।

एक कहावत है "डोली में जाना और अर्थी में आना" चाहे तुम्हारे शरीर को कितनी ही मार खानी पड़े। चाहे तुम्हारे मन को कितने ही ताने सहने पड़े। चाहे तुम्हारी आत्मा को पल पल घुट घुट कर मरना पड़े लेकिन अर्थी में ही आना क्योंकि ...तुम समझदार हो।

ऐसा नहीं है कि समझदार केवल औरतें ही होती हैं कुछ पुरुष भी समझदार होते हैं जिन्हे अपनी समझदारी की भारी कीमत शोषण सह कर चुकानी पड़ती है ये अलग बात है कि पुरुषों के साथ शारिरिक अत्याचार नहीं होता। पर मानसिक और भावनात्मक शोषण उनका भी होता है महिलाओं की अपेक्षा संख्या कम है ....लेकिन है। “पति” और “बेटे” की दोहरी भूमिका निभाते पुरुष के मानसिक तनाव का अंदाजा लगाने की कोई जहमत ही नहीं उठाता | पुरुष की "मौन पीड़ा" और दुखदायी होती है जीवन में "एक के चुनाव" की बाध्यता पर अग्नि साक्षी मान कर कन्यादान की कसमे और व्यवहारिक जिम्मेदारी को सर्वोपरी रख भारी मन से माता पिता से जब उस पुरुष को अलग होना पड़ता है | उसके बाद वो अपने मन के घाव लेकर पूरी तरह से अपनी पत्नी का भी नहीं हो पाता। और उसके बाद सहानुभूति तो दूर “जोरू का गुलाम” जैसे तानो के साथ भी नवाज़ा जाता है |

कभी मानसिक घाव शारिरिक घाव को भरने से रोकता है तो कभी शारिरिक घाव मानसिक घाव को और गहरा कर देते है। तन के घाव को तो समय भर देता है,पर मन के घाव और गहरे होने लगते हैं। घाव ओर ज्यादा दुख देने लगते है जब समाने वाले को अपनी गलती का अहसास ही नहीं होता।

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#stopdomesticviolence



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