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@dawriter

गोपाल फ़िर से जी उठा stopdomesticviolence

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hema by  
hema

गोपाल के बड़े भाई फ़ौज में थे। इस बार जब वो गाँव आये तो उन्होंने घर में अपने एक फौजी दोस्त की बहन से गोपाल की शादी की बात की। फौजियों के तबादले होते ही रहते हैं आज इस चेक पोस्ट पे तो कल किसी और पे। गोपाल ने देखा था फौजियों की बेटियाँ बहुत स्मार्ट होती हैं क्यूंकि वो शहर शहर घूमी हुई होती हैं। गोपाल मन ही मन बहुत खुश हो गया और न जाने पल भर में ही 21 साल के गोपाल ने क्या क्या सपने बुन डाले। गोपाल देखने में बहुत आकर्षक और अपने आस पास के कई गाँवों में से पहला ग्रेजुएट है, पहला लड़का जो यूनिवर्सिटी जानता है और हॉस्टल में तीन साल रहकर आया है। हालाँकि अभी वो बेरोज़गार है लेकिन सभी को विश्वास है कि उसे नौकरी जल्दी ही मिल जायेगी।

बड़े भाई की बात पे अभी पूरी तरह खुश भी न हो पाया था गोपाल कि उसकी माँ ने कहा “ मुझसे अकेले इतनी खेतीबाड़ी नहीं संभलती। तू तो अपनी बीवी को साथ लिए घूमता है। मुझे छोटी बहू ऐसी चाहिए जो घरबार संभाल सके। ” पापा भी बोले “ हाँ, हमने पड़ोस के गाँव में एक लड़की देखी है। बहुत ही कुशल है खेतीबाड़ी और घर संभालने में। गोपाल, सालाना मेले में वो आती है अपने डांस ग्रुप के साथ। तुम उसे देख लेना और बताना। ”

गोपाल बहुत अच्छी तरह जानता था कि उसके माँ पापा ने कितने प्रयासों से उसकी पढाई जारी रखी थी। माँ ने अपने गहने गिरवी रखे थे और हर महीने पापा लकड़ी काटकर मिले रुपये उसके हॉस्टल देने आते थे... मीलों पैदल चलकर। बड़े कष्ट उठाये थे उन दोनों ने गोपाल के लिए। तो क्या गोपाल से मदद की उमींद करना ग़लत था उनका ? परिवार में सभी एक दूसरे का संबल होते हैं और ऐसी अपेक्षा करना ग़लत तो नहीं है।

गोपाल लड़की देखे बिना ही शादी के लिए तैयार हो गया। क्यूंकि उसका मानना था कि कोई भी हो.... गाँव की लड़की होगी तो अनपढ़ देहाती ही। फ़िर देखने का क्या मतलब ? किस्मत में यही लिखा है। चलो घर पे कुछ मदद हो जाएगी यह सोचकर गोपाल ने उसी समय शहीद होने का फ़ैसला कर लिया और बिना लड़की देखे शादी के लिए हाँ कर दी।

दूसरी तरफ वो लड़की आनंदी जिसे उसके मेहनती होने की वजह से गोपाल जैसा अनन्य वर मिल रहा था जिसके जैसा आस पास के गाँवों में कोई न था। आनंदी मात्र 17 साल की थी तब। दुनियादारी से बेख़बर और शादी ..इसके बारे में तो सोचा ही नहीं कभी। लेकिन जब बात चली शादी की तो उसके किशोर मन में प्रेम के बीज पल्लवित होने लगे। गोपाल में उसे अपना प्रेम दिखने लगा हालाँकि यह बात और है कि अब तब उसने गोपाल को बस कानों से ही देखा था।

आनंदी ढेरों सपनों की डोली में सवार गोपाल की ज़िंदगी में आई और शोकाकुल अश्रुपूरित गोपाल अपने सपनों की लाश पर खड़ा आनंदी को देख ही नहीं सका। विवाह के फ़ौरन बाद नौकरी की बात पर आनंदी को अपने माँ पापा के पास छोड़कर शहर चला गया। और जो कुछ घट चुका था उसे भूलने की कोशिश करने लगा।

इधर आनंदी ने पूरी खेतीबाड़ी संभाल ली। जेठानी तो जेठ के साथ नगर नगर घूमती और सास कुछ बूढ़ी हो गयी थी और कुछ बुढ़ापा शादी में दहेज़ के तौर पर आनंदी के पीहर से मंगवा लिया था उन्होंने। आनंदी नवयौवना थी उसने कभी काम से जी चुराने की कोशिश नहीं की और न कभी बहुत सा काम होने की शिकायत की। वो काम काज करते हुए बस यही सोचती कि गोपाल की नौकरी लग जाये तो वो गोपाल को देख सकेगी और शायद उसके साथ कुछ समय के लिए रह भी पायेगी। उसकी सुबह शाम की पूजा में बस एक ही प्रार्थना होती कि हे शिव शंभू गोपाल को नौकरी दिला दो। एक दिन माँ पापा का त्याग, आनंदी की प्रार्थना और गोपाल की मेहनत रंग लायी। गोपाल को नौकरी मिल गयी थी वो भी सरकारी नौकरी। आनंदी का मन झूम उठा और गोपाल से मिलने की कल्पना से वो खिलती ही जा रही थी।

उधर गोपाल को जब तक नौकरी नहीं मिली थी तब तक वो अपना सारा मन और मेहनत नौकरी ढूँढने में खपा रहा था। इसका एक फायदा था कि उसे एक बुरे सपने सी हुई अपनी शादी इतनी याद नहीं आती थी। अब नौकरी लग जाने के बाद यह बुरा सपना उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। वो गाँव कभी लौटकर जाना ही नहीं चाहता था। मिटा देना चाहता था अपना अतीत। एक पल में उसने निर्णय तो कर लिया शहीद होने का मगर यह न समझ पाया कि शहादत जान ले ले तो आसान होती है कम से कम शहीद के लिए। लेकिन ऐसी शहादत जो जान भी न ले और जीने भी न दे वो भयावह होती है। शहीद का गुणगान होता है लेकिन जो जीता जगाता शहीद हो उसका क्या गुणगान ? कई बार तो लोगो को पता ही नहीं होता कि सामने एक शहीद है वो तो उसे अपने जैसा साधारण व्यक्ति समझकर ही व्यवहार करते हैं। तो हमारा गोपाल शहीद भी हुआ और किसी ने न तो शहादत को श्रद्धा सुमन ही न चढ़ाये और न ही कोई जिक्र किया उसकी महानता का।

गोपाल को दुनिया की यह उदासीनता और भी चिढ़ा गयी और हँसता खेलता गोपाल पहले शहीद गोपाल और फ़िर चिढ़ा हुआ हिंसक गोपाल बन गया। उसकी हिंसा की बलि चढ़ गयी निर्दोष आनंदी और उसके सपने। गोपाल ने अब शराब पीना भी शुरू कर दिया और नशे की आड़ में वो रोज आनंदी को सुनाता कि कहाँ गोपाल और कहाँ आनंदी ?  नशे में गोपाल ने आनंदी को बताया कि जब वो उसे शहर नहीं लाया था तब जहाँ किराये पे रहता था उस मकानमालिक की सुन्दर पढ़ी लिखी बेटी से उसे प्यार हो गया था और वो लड़की गोपाल का सच जानते हुए भी उससे प्यार करती थी। नशे में गोपाल ने आनंदी को यह भी बताया न जाने कितनी बार कि वो आनंदी को कभी स्वीकार नहीं कर पायेगा और उसे वो केवल माँ पापा की सेवा के लिए लाया है। नशे में गोपाल ने आनंदी को यह भी कहा कि उसने अपने माँ पापा के लिए अपनी जिंदगी, अपने सपने कुर्बान कर दिए। नशे में कहते कहते कभी गोपाल रो पड़ता तो कभी सारी दुनिया का गुस्सा आनंदी पे उतारता।

आनंदी कुछ न कहती आखिर वो नशा जो नहीं करती थी। उसकी बातें, उसका दर्द और उसकी बलि उसके मन में जमा होती गयी। कोमल भावनाएँ पथराने लगी। खुद के दुर्भाग्य के लिए वो किसे कोसे ? माँ पापा ने तो सबसे योग्य वर ढूँढा उसके लिए। गोपाल को भी कैसे कोसे ? गोपाल तो श्रवणकुमार का अवतार है। आज की दुनिया में कौन अपने माँ पापा के लिए ऐसा करता है ? जो कुछ आनंदी के साथ हुआ और हो रहा था आनंदी ने उसे अपने पूर्वजन्म के पापों का फल समझकर स्वीकार कर लिया। पढ़ी लिखी होती या शहर की लड़की होती तो शायद कुछ क़ानून और कुछ बात बनाकर कहने की समझ होती। लेकिन वो तो बिल्कुल साफ़ और सीधी थी। उसे गोपाल पे दया भी आती लेकिन वो क्या करे यह समझ नहीं आता था। नशे में रात को जब गोपाल उसे पीट पीटकर अधमरा सा कर देता था तब मन में आत्महत्या का विचार ज़रूर आता था। लेकिन अपने बच्चों की सूरत देखकर वो उस विचार को भी लात मार देती थी।

इस बेमेल विवाह ने दो लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया और उन बच्चों का बचपन भी जो इन दोनों के थे। बच्चे अपने पापा के केवल इस हिंसक अवतार को ही समझ सके कभी उस हिंसा के पीछे दर्द से बिलबिलाता हुआ गोपाल उन्हें नहीं दिखा। उसके बच्चे अपनी माँ पे होते अत्याचार को देखकर उससे नफरत सी करने लगे। उसकी बेटियाँ शादी के नाम से भी कांपती थी और कोई खुलकर गोपाल से बात नहीं करता था।

गोपाल को बहुत दुःख होता था और न जाने क्यूँ उसे यह उम्मींद थी कि जो बात पूरी दुनिया न समझ सकी उसे उसके अपने बच्चे समझ सकेंगे। अब गोपाल के माँ पापा भी संसार से विदा ले चुके थे और जिस खेतीबाड़ी के लिए यह सारा काण्ड हुआ वो अब ठेके पर चल रही थी। गोपाल अवसाद का शिकार होने लगा। उसे लगा सारी दुनिया उसके खिलाफ हो गयी है और सब उससे नफरत करते हैं। धीरे धीरे उसे भी पूरी दुनिया से नफरत होने लगी और यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि खुद से नफरत करने लगा था गोपाल। अपने हिंसक अवतार और सहनशील आनंदी के सामने खुद को छोटा महसूस करने लगा था। एक-एक कर उसके सारे किले ढह रहे थे अब अभिमान करने को कुछ ढूंढें नहीं मिल रहा था।

लेकिन गोपाल का एक दूसरा रूप उसके बच्चों ने तब देखा जब उसकी बेटी को अपनी जाति के बाहर और आर्थिक तौर पे कमज़ोर परिवार के लडके से प्यार हो गया। सारी संभावनाओं के विपरीत गोपाल ने एक बार भी विरोध नहीं किया और सहर्ष विवाह के लिए अपनी सहमति दी। सारे बच्चे और आनंदी सुखद आश्चर्य में थे और अब गोपाल से उसके दूसरे बच्चे भी मित्रता की कोशिश करने लगे। इस प्रकरण के बाद गोपाल धीरे धीरे अवसाद से बाहर आने लगा और ऐसा लगा जैसे अपनी बेटी को अच्छा मनचाहा वर दिलाने से उसकी वर्षों पुरानी कोई इच्छा पूरी हो गयी हो। नियति ने यह मौका देकर उसके तपते मन पर मानो हल्की मीठी फुहार बरसा दी हो। उसने शराब पीना छोड़ दिया और आनंदी को एक माँ के रूप में देखा तो उसका सम्मान किये बिना न रह पाया। अनपढ़ आनंदी ने अपने सभी बच्चों की देखरेख में कभी कोई कमी न की और आज सारे बच्चे अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं। अब गोपाल में छुपा हिंसक गोपाल और दबा हुआ शहीद गोपाल दोनों उसे छोड़ चुके हैं। वो फ़िर से गोपाल हो गया है एक साधारण सा खुश व्यक्ति गोपाल।

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