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@dawriter

कभी कभी लड़की वाले भी दहेज के दोषी होते हैं

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ऐसा हर बार ज़रूरी नहीं है, कि दहेज केवल लड़के वाले ही माँगे। "चड्डा साहब" जिन्होने अपनी बड़ी बेटी की शादी में बेहिसाब दहेज दिया। जबकि! लड़के वालो ने ऐसी कोई फरमाइश भी नहीं की थी, वो तो बस चाहते थे कि बारात की खातिरदारी अच्छे से हो। ताकि, वो भी अपने रिश्तेदारों और सगे सम्बन्धियों से नज़रें मिला सके। क्योंकि! अपनी बेटी की शादी भी उन्होने बहुत साधारण ढंग से की थी इसीलिये उन्होने पहले ही से बहु (ज्योति) के पापा को साफ कर दिया था, कि उनके घर के किसी भी सदस्य को या किसी रिश्तेदार को लेने देने के फेर में ना पड़े। जिसे जो भी देना है उसे वो खुद ही दे देंगे। पर ज्योति के पापा कहाँ मानने वाले थे! उनकी इज्जत का सवाल जो था बेटी को भारी भरकम कपड़े और ज्वेलरी देना उनके हिसाब से उनका फर्ज था साथ ही घर के हर सदस्य के कपड़े, उनके लिये एक एक अँगूठी लड़के के लिये सोने की चेन वगर्ह, बड़ी लम्बी लिस्ट उन्होने तैयार कर रखी थी। जबकि उनकी बेटी को भी इन सबमें कोई रुचि नहीं थी वो भी यही मानती थी कि जब उसके माँ बाप ने उसे पढ़ा लिखा कर काबिल बना दिया है तो इन सब चीजो का क्या मतलब ? पर वो अपने पापा को ये सब समझाने में नाकाम थी उस पर घर में शादी के बाद उसके प्रयोग की हर चीज़ पापा उसे देना चाहते थे जैसे -बेड, सोफा, टी.वी., फ्रिज, कार वगर्ह वगर्ह। ज्योति ये बात भली भाँति जानती थी कि उसके पापा ने ये सब बड़ी मेहनत से जोड़ा है और फ़िर उसके बाद उसकी बहन पूजा और भाई अंकुर भी तो है, और जिस हिसाब से पापा उसकी शादी पर खर्च कर रहे थे उसमें कहीँ भी उसके छोटे भाई बहन की शादी या पढाई की गुंजाइश नहीं थी।

पर पापा ने तो अपना फर्ज अदा कर दिया था। ज्योति शादी के बाद अपने परिवार में काफी खुश थी घर में सभी लोग काफी अच्छे थे।

ज्योति की शादी को लगभग 3 साल हो चुके थे। अब उसकी बहन पूजा की शादी के लिये रिश्ते आने शुरू हो गये थे। पिछले तीन सालो में चड्डा साहब अपने व्यापार में काफी नुकसान झेल चुके थे पर उन्होने अपने घर के लोगों के अलावा किसी बाहर के आदमी को इसकी भनक भी नहीं लगने दी थी। यहाँ तक की अपनी बेटी ज्योति को भी उन्होने इसके बारे में नहीं बताया था। यही वजह थी की ज्योति के ससुर उसकी बहन पूजा के लिये अपने दोस्त के बेटे का जो रिश्ता लाये थे यही कह कर लाये थे कि " आप बिल्कुल चिंता ना करे, आपके बेटे रोहन के लिये अच्छी लड़की तो है ही साथ ही साथ लेन देन में भी कोई कसर नहीं रहेगी "! क्योंकि वो जानते थे कि उनके दोस्त को लेन देन में विशेष रुचि है, लड़के के पिता भी इस बात से काफी संतुष्ट थे क्योंकि वो भी ज्योति की शादी में, शादी की ठाट बाट से अच्छी तरह वाकिफ थे। ज्योति ने अपने पापा से इस बारे में बात की चड्डा साहब अच्छा रिश्ता सुन कर खुश तो हुए, पर साथ ही उनके माथे पर चिंता की लकीरे आसानी से देखी जा सकती थी और पूजा इस सब से अच्छी तरह वाकिफ थी।

इसलिये उसने ज्योति को अपने कमरे में चलकर बात करने को कहा और ज्योति को घर की आर्थिक स्थिति के बारे में बताया। ज्योति ये सब सुनकर सन्न रह गयी वो पापा से ये पूछना चाहती थी " कि क्यों? उन्होने इतने दिनो से उससे ये बात छुपाये रखी ", पर शायद! उसकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी पापा से इस बारे में कुछ भी पूछने के लिये। क्योंकि! जब उसने पीछे मुड़ कर देखा तो पापा बाहर ही खड़े सब सुन रहे थे।

ससुराल पहुँच कर उसने अपने ससुर से कहा कि आप अंकल जी से बात कीजिये, मेरे पापा की आर्थिक स्थिति सही नहीं है, और वो पूजा की शादी बिल्कुल साधारण ढंग से करना चाहते है। पर " अंकल जी " तो अपने बेटे के लिये बहुत अरमान सजाये बैठे थे, उन्होने साफ साफ रिश्ते के लिये मना कर दिया। ज्योति के ससुर ने उन्हे समझाने की लाख कोशिश की, पर सब बेकार ...। हालाँकि! उनका बेटा शायद लेन देन में विश्वास ना करते हुए शादी से कभी इनकार ना करता पर दूसरे शहर में रहने के कारण उसे इस रिश्ते की कोई जानकारी नहीं थी।

ज्योति समझ ही नहीं पा रही थी, कि पापा को क्या जवाब दे पर वो अगले दिन घर गयी तो चड्डा साहब ने उससे केवल इतना ही पूछा " बेटी कुछ बात बनी ", पर ज्योति की खामोशी सब कुछ कह चुकी थी। घर का हर सदस्य खुद को दोषी मान रहा था ज्योति अपनी बहन का रिश्ता ना करा पाने के कारण और पूजा अपने रिश्ते के ना होने के कारण!

चड्डा साहब बिना कुछ कहे लॉबी में जाकर आराम कुर्सी पर बैठ गये और सोचने लगे कि काश! उन्होने ज्योति की शादी में थोड़ा सोच समझ कर खर्च किया होता तो आज ऐसा बिल्कुल ना होता। हालांकि! वो अब दहेज से तौबा कर चुके थे, पर एक अच्छी शादी करने का हक तो रखते ही थे।

वैसे भी आजकल दहेज की माँग एक दूसरे को देख कर, खुद को और बेहतर दिखाने के कारण ही तो बढ़ रही है। मेरा बेटा इतना पढ़ा लिखा तो उसे तो शर्मा जी के लड़के से अच्छी लड़की और अच्छा दहेज भी मिलना ही चाहिये।

गुप्ता जी ने बेटी की शादी में कार दी थी तो हम कौन सा उनसे गरीब है, जो अपनी बेटी को कुछ भी ना दे। " इसी चक्कर में लड़के वाले और लालची हुए जा रहे है और लड़की वाले और भी मजबूर "!

आज कल का सबसे अच्छा चलन तो है की भाई साहब " हमारे घर में सबकुछ है, हमें कुछ नहीं चाहिये, लेकिन फ़िर भी अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो अपनी बेटी और दामाद को बेशक दीजिये "। जिसमे अगर .... आप घर का सामान देते है तो हमारे पास हमारे लिये तो है ..., ये तो आपकी बेटी ही use करेगी और अगर कार देंगे तो आपकी बेटी ही उसमें घूमेगी हमें तो कोई ऐतराज नहीं है।

शायद! अगर दहेज का कीड़ा मर जाये तो लोग खुल के जी सकेंगे,अपनी बेटी को पढ़ा लिखा सकेंगे, (खासकर वो लोग ... जो उनके पैदा होते ही उनकी पढाई, लिखाई या उनकी बाकी जरूरतों के बारे में नही, बल्कि शादी में लेन देन की फिक्र करने लगते है ) क्योंकि! उन्हे उसकी शादी में होने वाले बेहिसाब खर्च की चिंता नहीं करनी पड़ेगी!

#saynotodowry



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