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@dawriter

और मैं मुक्त हो गयी

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आज आप सबके सामने मैं कविता जयंत श्रीवास्तव अपनी दिल के सबसे करीब रहने वाली सखी की कहानी शेयर करना चाहती हूं उसकी ही जुबानी....उम्मीद है आपको उसकी ये कहानी अवश्य पसंद आएगी....

 दोस्तों मेरा नाम रश्मि मल्होत्रा है... आज आप सबके साथ में अपने दिल की कुछ बातें साझा करना चाहती हूं...."

आज मैं बेहद खुश हूं क्योंकि, मैं आजाद हो चुकी हूं,          उस वैवाहिक जीवन के बंधन से मुक्त हो चुकी हूं जो मुझे बेड़ियों में जकड़ चुका था ....मेरे वैवाहिक जीवन की शुरूआत अच्छी नहीं हुई ..मन में सदैव अलग हो जाने के ख्याल आते ..' जब भी कोई झगड़ा होता मेरा मन विद्रोह कर उठता ..'यही सोचती -यह क्या किया है ईश्वर ने मेरे साथ? मेरे पति अजय का स्वभाव बेहद अजीब था जब हमारी शादी तय हुई थी, लगता था ऐसा सुयोग्य जीवनसाथी मुझे कभी नहीं मिलेगा। मेरी शादी बहुत ही जल्दी जल्दी में तय हुई थी और उस वक्त क्योंकि मेरी पढ़ाई चल ही रही थी अतः मैं ज्यादा उत्सुक नहीं थी। किंतु ,जब मेरे सास-ससुर पति व ननद मुझे देखने आए तो इन्हें देखकर मैंने भी विवाह के लिए 'हां' कह दी..। देखते ही देखते हमारी मंगनी एवं उसके बाद विवाह भी हो गया। समय अच्छा चल रहा था करीब 1 माह का वक्त तो रस्मो-रिवाज ओर रिश्तेदारों, मंदिरों और घरेलू समारोह के मध्य बीत गया ... ! इसके बाद मेरे कांच के सपनों के टूटने का क्रम प्रारंभ हो गया...*! ...वह पहली घटना जब मेरी परीक्षाएं चल रही थी ,और मुझे इसी कारण मायके जाना पड़ा था वहां आने पर भी मेरे पति चाहते थे कि ,जिस प्रकार में विवाह के पूर्व एवं सगाई के बाद उनसे फोन पर बातें करती थी उसी प्रकार अब विवाहोपरांत भी करूं जो कि अब संभव नहीं था ..! एक तो परीक्षाओं के कारण मैं घर आई थी दूसरे इतने दिन पति के घर में रहते एवं साथ समय बिताने के कारण अब मेरे मन में भी यह इच्छा थी कि मैं अपनी मां पिताजी एवं सहेलियों के साथ समय बिताऊँ..!  जिसे यह अपनाने को तैयार नहीं थे। इनका फोन यदि किसी कारणवश मैं ना उठा पाऊं तो उसके बाद हमारे बीच ऐसा झगड़ा होता कि लगता कि, इस से बेहतर तो यह होता कि फोन ही नहीं आता। कभी बातें करते वक्त मेरी कोई सहेली या रिश्तेदार आ जाए तो मैं फोन काट कर यदि चली जाऊं तो भी बेहद झगड़े होते..!  मैं किसी सहेली या पास पड़ोस किधर भी नहीं जा सकती थी यदि कहीं चली जाऊं तो उसके बाद पुनः वही सब..! और जाऊं भी तो कैसे?  हर वक्त फोन आने का डर होता..! स्थिति इतनी बिगड़ गई, कि जैसे तैसे परीक्षाएं समाप्त हुई ..और उसी दिन मैं ससुराल चली गई ..! वापस आने के बाद इतना अधिक मतभेद हुआ की क्या बोलूं..!!  मेरी रात और मेरे दिन रोते हुए गुजरते ..अपने घर पर किसी से यह सब बातें शेयर नहीं कर सकती थी मैं। फलत: धीरे धीरे मेरे रिश्तेदार सहेलियां सभी यह बातें महसूस करने लगे कि 'अब रश्मि बहुत बदल गई है ..मुझे अक्सर मेरी सहेलियां कहती कि-" तू तो बहुत बदल गई है यार! तुझे हमारी याद ही नहीं आती.." ...और मैं इस बात को लेकर चुप रह जाती हंसकर टाल देती कि- " हां यार टाइम नहीं मिल पाता कि कॉल करूं...! "" धीरे धीरे सभी मुझसे कटने लगे।  मैंने यह सब बातें किसी से शेयर नहीं की और सब से बात करना धीरे धीरे छोड़ दिया। मिलना तो बहुत ही दूर की बात थी।... 

 मेरी जिंदगी सिर्फ ससुराल की चारदीवारी में कैद हो गई जिसके कारण मैं थोड़ी चिड़चिड़ी सी हो गई क्योंकि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि शादी के बाद मुझे अपने घर और अपने लोगों के बीच जाने का मौका नहीं मिल पाएगा.. मेरी मां मुझे अवश्य फोन करती ..किन्तु मेरे साथ फोन पर औपचारिक बातें हो पाती..!  कभी-कभी एक दो दिन के लिए मैं मायके आती भी तो पति के साथ..!  और वहां भी डरती ही रहती थी किसी बात पर उनका मूड खराब न हो जाए।  किंतु इन परिस्थितियों में मुझे अपना जीवन दुसह: लगने लगा था ...इस तरह कैसे जीवन बीतेगा मैं यही सोचती...!  यदि उस वक्त मैं गुमसुम रहने लगती तो भी मेरे पति का मूड खराब हो जाता कि क्या मैं खुश नहीं हूं ? एक दिन उन्होंने मुझे उदास देखकर कहा कि :"रश्मि क्या बात है क्या तुम खुश नहीं हो? सब कुछ तो है तुम्हारे पास..।  जो कुछ तुम चाहती हो वह सब मैं देता हूं तुम्हें। कौन सी जरूरत तुम्हारी पूरी नहीं होती?मैं इस बार भी चुप रही क्यों कि ..उनसे कुछ कहने का कोई मतलब नहीं था.

 समय बीतता गया और मैंने खुद को उनके अनुरुप ढाल लिया था हम कहीं घर से बाहर जाते तो भी बहुत नाटक होता ( मुझे घूमना फिरना पसंद भी नहीं था क्योंकि इनकी आदत बहुत खराब थी) एक बार मार्केट में मैंने एक व्यक्ति को देखकर कुछ जवाब दे दिया था तो उन्होंने इस पर भी बवाल मचाया था ..! "..यह क्या?  तुम दूसरे पुरुषों से बात करना ही पसंद करती हो..!  इसलिए मैं घर में किसी दूर के रिश्तेदार के आने पर..' जो मेरे देवर या जेठ लगते थे, उनके सामने भी यदाकदा मजबूरी में ही आती ..अन्यथा कभी सामने न आती ...! 

अपनी कॉलेज लाइफ में मैं अत्यंत प्रतिभाशाली छात्रा रही थी जो हर चीज में आगे रहा करती थी पढ़ाई-लिखाई, वाद विवाद, गायन ,नृत्य, संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन सबमें मैं निपुण थी किंतु , मेरे ससुराल में मेरी इन कलाओं को "व्यर्थ के शौक" की उपाधि दी गई.. इनके घर में लड़कियों को मर्यादा में रहने की और बहू को बहू या औरत बनकर रहने की सलाह दी जाती थी कुल मिलाकर विधाता ने मेरे साथ अन्याय की पराकाष्ठा कर दी थी।

पर समय बीतता गया और धीरे-धीरे मेरे विद्रोह ने आत्महीनता का रूप ले लिया.. मैंने परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया और मैंने स्वयं को उसके अनुरुप ढाल लिया ...(फिर भी मैं खुश नहीं थी...)

 धीरे-धीरे समय बीतता गया मैं एक नई जिम्मेदारी के पड़ाव पर पहुंच गई और मेरे भीतर एक नन्ही सी जान पलने लगी अब मुझे एक जीने की नई आशा मिल गई थी किंतु, ईश्वर का प्रकोप देखिए कि मुझे एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। और जैसा की मुझे आशा थी इन सब का शिकार मेरे साथ साथ अब मेरी बेटी भी बनने लगी। पिता के इस व्यवहार की यातना मेरी नन्ही सी बच्ची सहती तो मेरा हृदय फट जाता। धीरे धीरे वो बड़ी हो गयी और पिता की शंका का कारण बनने लगी ..! ऐसे ही एक दिन मेरी बेटी सलोनी, की सहेली घर आई थी और उस दिन अजय घर पर थे दोनों सहेलियां कमरे में गाने की धुन पर थिरक रही थी कि वह गए और जोर-जोर से भद्दी भद्दी गालियां देने लगे और भद्दी बातें बोलकर उन्हें डांटने लगे और सलोनी की सहेली रोते हुए अपने घर की तरफ भाग गई उन्होंने उसका कॉलेज जाना बंद करा दिया इस घटना से सलोनी ने मुझसे प्रतिकार किया कि, माँ आप कुछ बोलती क्यों नहीं ?मैंने बचपन से देखा है आपको.. पिताजी का दुर्व्यवहार झेलते हुए। आपने सबको छोड़ दिया ...नाना नानी अपनी सहेलियां, घर ,परिवार,रिश्तेदार पढ़ाई लिखाई अपना कॅरियर भी...।... 'सबको छोड़ दिया यदि, वह कहेंगे तो क्या मुझे भी छोड़ देंगी आप? 

 बेटी की इस बात ने मुझे अंदर तक हिला दिया...रात भर सोचती रही मैं.. ! और मैं जो अपने लिए नहीं कर पाई वह इस बेटी के लिए ,उसके उज्जवल भविष्य के लिए,करने की ठानी। एक कठोर निर्णय लेने के लिए मैं मजबूर हो गयी

 और दूसरे ही दिन सुबह मैं अपनी बेटी को लेकर अपने मायके चली गई और वकील से बात करेंगे तलाक का नोटिस भिजवा दिया.. जिससे कि, यह सकते में आ गए उन्हें लगा नहीं था कि खूटे में बंधी हुई गाय भी सीग दिखाने की हिमाकत कर सकती है। और बहुत ही प्रयास किया इन्होंने किंतु इस बार में उनके प्रलोभन में नहीं आई ...क्योंकि इस बार सवाल मेरा नहीं... मेरी संतान का था और आज मैं मुक्त हो गई हूं उस जेल से...उस यातना की कोठरी से ... और उस डर से मुक्त हो चुकी हूं ...

और उस पिंजरे से निकल कर आज मैं बहुत खुश हूं बहुत खुश ...

दोस्तों मेरी यदि कहानी आपको पसंद आई हो तो इसे लाइक और शेयर अवश्य करें। 



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