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@dawriter

मैं और पलाश

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ज़िन्दगी भी कितने दांव पेंच खेलती है। कोई नहीं जानता,कब, किससे,कैसा गुनाह करवा दे। एक गुनाह हमसे भी हो गया और ऐसा गुनाह जिसकी हमें कोई सज़ा नहीं हुई परन्तु आज भी, जब वो गुनाह याद आता है तो एक कसमसाहट सी होती है, क्या सच में वो एक अपराध था या किसी को मुक्त कर दिया था मैंने इस नरक से।आज भी जब फूलते हुए पलाश के वृक्षों को देखता हूँ तो न चाहते हुए भी वह पलाश और कॉलेज का आखरी साल याद आ ही जाता है--

    फेयर वेल पार्टी चल रही थी। जूनियर्स मस्ती कर रहे थे,मैं कुछ खोया हुआ सा था। तभी एक धक्का लगा, मेरे दोस्त अंकित ने मुझसे कहा- भाई कॉलेज ख़त्म अब आगे क्या? मैंने कहा- अगर कैंपस प्लेसमेंट नहीं हुआ तो एम.बी.ए. कर लेंगे, आज कल जो कोई कुछ नहीं करता वो एम. बी. ए कर लेता है, कहकर मैं हंस पड़ा। प्रतीक ने कहा और पलाश की कोई खबर?  मैंने हैरानी से उसे देखा और कहने लगा- नहीं, तुम्हें है क्या, मरे हमें क्या। कुछ देर बाद मैं मंदिर के अन्दर था। मैंने आंखें बंद कर लीं और प्रार्थना करने लगा। हम सरस्वती विद्या मंदिर के लड़कों के साथ ये एक बड़ी समस्या है साला हम प्रार्थना बहुत करते हैं।

           मेरे ज़हन में कॉलेज का पहला साल याद आ रहा है।जब मैं,मास्टर जी का बेटा,घर से स्टेशन के लिए निकला नर्मदा एक्सप्रेस पकड़ने।बचपन से मेरे अन्दर मैथ्स का कीड़ा था, सो चल पड़े हम भोपाल इंजीनियर बनने। कॉलेज पहुंचे,पहली मुलाकात चौकीदार से की उसके बाद काउंटर पर फीस भरने के बाद चेहरे पर एक मुस्कराहट थी। कैंपस से क्लास तक आने में कई बार सीनियर्स के हत्थे चढ़े,बड़ी मुश्किल से क्लास तक पहुंचे। क्लास में काफी भीड़ थी।भीड़ में हमें एक जोड़ी नीली आंखें दिखाई दी,जिसे अभी तक फिल्मों में ही सुना और देखा था। पहली बार झीलों के शहर में आकर समंदर सी नीली आंखें देखी। बेंच से टकराते बचा मैं और परस्थिति को सँभालते हुए चुपचाप बैठ गया।

             इंट्रो शुरू हुआ। हमने जब अपना इंट्रो दिया तो सर ने ऐसे घूरा जैसे कोई गुनाह कर दिया हो हिंदी में इंट्रो देकर। हमें तो बड़ा गर्व था की सरस्वती विद्या मंदिर से 12 वी बोर्ड में 88 प्रतिशत में पास होकर हम अपनी क्लास में अव्वल आए थे। पर प्रोफेसर की प्रतिक्रिया ने फिजिक्स याद दिल दी 'क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया।'मुझसे ध्यान हटाकर सर का ध्यान क्लास में सो रहे तीन बन्दों पर पड़ा।गुप्ता जी ने चॉक मारी तो हडबडाते हुए एक लड़के ने कहा- 'चिड़ी की बेगम।' दुसरे लड़के ने कहा तुमने चिड़ी क्यों बोली? तो तीसरे सोते लड़के ने कहा भाई साहब को चिड़ी पसंद है। सब हंसने लगे तो उनकी नींद खुली और सर को सामने देख वह कहने लगा- हमें माफ़ कीजिये सर, हमने रात भर ताश खेली तो सुबह आधी नींद में चिड़ी निकल गया। साला सरपट अंग्रेज़ी में पूरा इंट्रो दे गया।उसके बाद जब उसने कहा सी बी एस ई बोर्ड से 90 प्रतिशत, तल्खी सी हुई अपने आप से, पहली बार हिंदी माध्यम से पढने पर अफ़सोस हुआ जो कि सर के चेहरे पर आयी मुस्कराहट देखकर और पक्का तब हो गया जब उन्होंने उसे डांटा नहीं। उसके पूरे इंट्रो में बस मुझे एक ही बात याद रह गयी 'माइसेल्फ पलाश।'

         धीरे-धीरे क्लासेस आगे बढ़ने लगी। मैं उसे अपना प्रतिद्वंदी समझने लगा था, मैंने भी अंग्रेज़ी सीखनी शुरू कर दी। वी भी कभी कभार मुझसे बात करने की कोशिश करता था।चिढ होती थी मुझे उससे, वो किसी आई ए एस का बेटा था। माँ-बाप दोनों ही अच्छे पदों पर थे।पढने में भी आगे रहता मुझसे।उसके माँ-बाप के रुतबे के सामने कॉलेज की फैकल्टी भी सरेंडर रहती।उससे तो कई गल्तियाँ हुई थीं पर सबसे बड़ी गलती उसने की नीली आँखों वाली से मोहब्बत करने की। भाई को हर वो चीज़ चाहिए होती थी जो मुझे पसंद थी।

                 एक दिन पलाश ने उस नीली आँखों वाली को रोका तो वह बडबडाते हुए चली गयी। रात भर गार्ड रूम में ही सोता रह गया वह। अगली सुबह फिर उसने उन नीली आँखों का रास्ता रोका ये कहकर की अपॉइंटमेंट मिलेगा।नशे में धुत्त था वह, मैं वहीँ मौजूद था मैंने किसी फ़िल्मी हीरो की तरह बीच में पड़कर उसे रोका तो घायल हो गया। वो कई बार बातें बड़ी अच्छी करता पर पता नहीं क्यूँ मुझे पसंद नहीं था। मैं उससे नफरत करने लगा।पलाश पूरा बेवडा हो गया था मोहब्बत के चक्कर में ये कहें कि आर एच टी डी एम् का मैडी बन गया था।

        मेरे साथ उसका पंगा हो गया।वो साला हर बार टॉप करता और हम शर्मा जी के बेटे फेल हो गए। एक दिन उसने मेरा रास्ता रोक कर सिगरेट बढ़ाई। मैंने मना किया तो कहने लगा तुम और तुम्हारे संस्कार शर्मा जी। मैं क्या करता मास्टर जी का बेटा था शराब नहीं पीना सिगरेट नहीं पीना आदर्शवादी बहुत था।इसी बीच घर से एक बुरी खबर आई भाई के पेट में इन्फेक्शन बढ़ गया था जिसका असर किडनी तक हो गया था।माँ पापा भैया को मुंबई ले गए मैं भी जाना चाहता था तो मुझे पढाई पर ध्यान देने को कहा गया।भाई की किडनी फेल हो गयी थी उसे प्रत्यारोपित करवाना था। कहते हैं की खून के रिश्ते में किडनी मैच हो जाती है पर मेरे भाई से मेरी और माँ पापा किसी की किडनी मैच नहीं हुई। हम सब बहुत परेशान थे कि अब क्या होगा। उसी हॉस्पिटल में एक बन्दे का इलाज चल रहा था वो ड्रग एडिक्ट था। जब भैया की खबर उसके कानों में पड़ी तो माँ पापा से मिलकर वो भैया को किडनी देने को तैयार हो गया। उसकी किडनी मैच भी हो गयी।पापा ने जब फ़ोन पर बताया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। वह लड़का हम सबकी ज़िन्दगी में किसी देव दूत की तरह आया था। अब भैया भी ठीक होने लगे थे।

       मैंने भी मन लगाकर पेपर दिए, छुट्टी थी तो नीली आँखों वाली से मिला। उसके पास स्कूटी थी उसमें बिठाकर उसने मुझे भोपाल दिखाया।स्कूटी चलाते समय उसकी जुल्फें आँख कान और नाक में चुभती थीं।जब कान में जाती तो संगीत बजता नाक में जाती तो शैम्पू की खुशबू आती। अच्छा वक़्त बिताया मैंने उसके साथ।

          कुछ दिनों बाद पता चला कि पलाश ने उसे दोबारा छेड़ा तो मैं गुस्से में पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराने पहुँच गया। पलाश को वहां लाया गया। मुझे देख कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी। इंस्पेक्टर से बात की उसने उसके हाथ में पुलिस वाले ने सिगरेट थमाई और मुझे अन्दर ले जाया गया। बल भरहा मारा मुझे। मैं जब बाहर आया तो नीली आँखों वाली को मुझसे हमदर्दी थी और पलाश से नफ़रत। इसी बीच मुझे पता चला कि उनकी सेटिंग मेरे ही एक दोस्त से हो गयी। उस दिन अपनी और पलाश की हालत पर बहुत हंसी आई ये सोचकर कि मुफ्त में बदनाम हुए हम दोनों।

        मेरे घर के पास ही बाज़ार था।मैं नीचे उतरा तो देखा बाज़ार में कुछ लड़कों का गिरोह पलाश को बड़ी बेरहमी से पीट रहा था।नशे की वजह से पलाश का जीवन नरक के समान हो गया था।जब उसे तलब होती वो किसी के भी पैरों पर गिर जाता। माँ बाप का मान सम्मान सब कुछ दांव पर लगा दिया था उसने।वह मेरे पास भागता हुआ आया भाई बचा ले आज। मैं किनारे हो गया उसे पिटता देख मुझे सुकून मिल रहा था। उन लड़कों के जाने के बाद मैंने उसे हाथ का सहारा देकर किनारे किया अपनी बाटा की चप्पल उतारी।एक के बाद एक न जाने कितनी चप्पलें मारी मैंने उसे।मैं उसे मारता जा रहा था और मेरी ढीठ चप्पल भी टूटने का नाम नहीं ले रही थी।  जब थोडा मन हल्का हो गया तो उसे वहीँ छोड़ अपने रूम पर लौट आया मैं।       

                     आँखें खोली पुजारी जी ने प्रसाद दिया मैं मंदिर से बाहर आ गया। कुछ दिन बाद पता चला पलाश हॉस्पिटल में है। मन नहीं माना उसे देखने चला गया। उसके पापा से पता चला कि वो अल्कोहल के साथ साथ ड्रग एडिक्ट भी हो गया था।मुंबई में उसका इलाज चल रहा था। उसका जीवन एक बोझ की तरह ही हो गया था।उसके पिता ने बताया कि पता नहीं क्या सोचकर मुंबई में इसने अपनी एक किडनी डोनेट कर दी थी किसी लड़के को।उन लड़कों ने जब उसे रॉड और हॉकी स्टिक से मारा तो उसकी हालत ख़राब हो गयी पर डॉक्टर समझ नहीं पा रहे कि ऑपरेशन वाली जगह पर तो कहीं भी किसी हथियार के निशाँ नहीं है फिर कैसे उसके टाँके खुल गए। मैं कुछ नहीं कह पाया। उन्हें ख़ामोशी से देखता रहा। पलाश की हालत गंभीर थी।मैंने घर पर फ़ोन किया और पूछा भैया को किडनी किसने दी। माँ ने कहा उस लड़के ने हमें अपना नाम नहीं बताया बस इतना पता है कि उसका नशा छुड़ाने के लिए उसे भर्ती कराया गया था। मेरे पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। मैं हॉस्पिटल से आया और कॉलेज के लिए निकल गया हम सबकी ग्रुप फोटो हुई पर कुछ अधूरापन सा था। कुछ दिन बाद ग्रुप फोटो हाथ में थी।फोटो देखते हुए पता चला, पलाश नहीं रहा, उसके साथ उसकी मौत का कारण उसे उस जगह पर मारा जाना था जिस जगह उसे टाँके लगे थे। मैं फोटो देखते हुए सोच रहा था कि इसका फ्रेम बदलता रहेगा पर मन में बस एक ही ख्याल था कि क्या अब कभी ये फोटो भी बदल पायेगा।

             मेरा प्लेसमेंट हो गया था आज मैं एक अच्छी नौकरी में हूँ पर आज भी जब पीछे देखता हूँ तो उस तस्वीर के साथ यही सवाल मन में आता है कि क्या कभी ये बदल पायेगी। मास्टर जी के बेटे के मन से क्या कभी पलाश का बोझ उतर पायेगा।लाख अपराध किये पलाश ने पर जाते-जाते किसी को जीवन दान दे गया था। उसके सारे गुनाह माफ़ हो गए थे।मैंने लाख पुण्य के काम किये पर उस दिन मेरे अन्दर का दानव जाग गया था, जिसने मेरे हाथों एक अक्षम्य अपराध करवा दिया। मुझे शायद सज़ा हो जाती तो मन से अपराधबोध चला जाता परन्तु मुझे तो उम्र भर इस अहसास के साथ जीना है। जब भी अपने भाई को मुस्कराता देखता हूँ तो लगता है कि पलाश की किडनी मुझ पर हंस रही है ये कहते हुए- 'क्यूँ शर्मा जी बहुत अच्छे बनते थे न यहाँ भी हरा दिया मैंने तुम्हें।' मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा विलेन अपने अंत तक आते आते हीरो बन गया था और मैं तो कभी हीरो था ही नहीं और अब शायद कभी बन भी नहीं पाऊँगा। जाते जाते पलाश मुझे अपनी सारी बुरी आदतें जो दे गया था।

‌                                                अभिधा शर्मा।।



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