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@dawriter

मेरी और नियती के बीच की लड़ाई

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

इन दिनों मैं खुद को मजबूत कर रहा हूँ क्योंकि आने वाले वक्त में मुझे इस मजबूती की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली है दरअसल मुझे नहीं ये ज़रूरत मेरी ज़िम्मेदारियों को पड़ने वाली है । कुछ सालों पहले ऐसे ही दौर से गुज़रा था मगर तब डर नहीं था किसी बात का डर नहीं ना मरने का ना मेरे मरने से माँ बाप को होने वाले उस भयंकर दुख का । मैं आज़ात था उन दिनों कुछ भी करने के लिए क्योंकि मैं हर तरह के दायित्व से मुक्त था । मुझे लगता था मेरे होने ना होने से किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा । मुझे ना पिता जी की बातें समझ आती थीं ना माँ के आंसू दिखते थे । लगता था जो दुःख मुझ पर टूटा है उसका इलाज बस मौत ही है । मगर वक्त बदला जिस दौर से गुज़र रहा था उससे भी बुरा दौर आया पिता जी चल बसे और एकाएक मैने पाया कि मेरे कंधों पर कुछ भारी रखा हुआ है । मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर ये भारीपन्न किस वजह से है । फिर जब निराश हो कर मन के किसी कोने में खुद को मिटाने जैसी हल्की सी आवाज़ उठी तब मेरे कंधों पर महसूस हो रहा वो भारीपन्न बोला "क्या तुम इतने कायर हो कि हमसे डर कर अपनी ज़िंदगी ही खत्म कर लोगे ?" मैं सोच में पड़ गया कि मेरा मरना भला इनसे डरना कैसे हुआ । बहुत सोचने के बाद मुझे वो बोल याद आए जो माँ ने कहे थे पिता जी के चले जाने के बाद "बेटा मैं तो उनके साथ ही समाप्त हो गई । अब तो बस तुम लोगों की माँ ज़िंदा है । तम सबको देख कर ही जीने की हिम्मत जुटा पाई हूँ ।" माँ के इन शब्दों ने याद सहसा अहसास कराया कि वो भारीपन्न जो मैं अपने कंधों पर महसूस करता हूँ वो ज़िम्मेदारियाँ हैं जिनसे मैं अब चाह कर भी मुंह नहीं मोड़ सकता । उसे पाने का हर रास्ता अब बंद होता नज़र आ रहा है । उसके अपने उसे समझेंगे नहीं और मर्यादाओं को मैं तोड़ नहीं सकता । कभी कभी मन करता है उसे भगा ले जाऊं कहीं दूर जहाँ इन बंदिशों की इन सड़े गले रिवाज़ों की भनक तक हमारे आस पास ना रहे । मगर क्या करूं मेरे ख़यालात थोड़े पुराने हैं । पिता जी से ही सीखा था कि कभी किसी का मन दुखा कर हम खुशियों का भोग नहीं लगा सकते । फिर भला मैं एक बाप की इज्ज़त को नीलाम करके अपने सपनों का महल कैसे खड़ा कर सकता हूँ । अंततः मैने ये निर्णय ले ही लिया कि मैं नियती का कहा मानूंगा वो अगर मुझे विरह की ज्वाला में जलता देख खुश है तो मैं ऐसा ही करूंगा । नियती ने अपने इस खेल के लिए मुझे जान बूझ कर चुना है क्योंकि वो जानती है कि मैं जलता रहूंगा मगर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर मौत को गले नहीं लगाऊंगा । हाँ मुझे दुःख उसका जिसकी कोई गलती नहीं जिसके आंसू जिसकी पीड़ा सिर्फ मेरे और नियती की इस लड़ाई की वजह से है । ज़िम्मेदारियों ने मुझे मजबूत करने की हर संभव कोशिश की है मगर मैं बाहर से ही मजबूत हो पाया अंदर से नहीं और शायद कभी हो भी ना पाऊं । अब बस नियत से यही प्रार्थना है कि वो उसे इस खेल का हिस्सा ना बनाए उसकी इसमें कोई भागीदारी नहीं उसका आने वाला कल खुशियों से भर दे । नियती अगर मुझ पर यह उपकार कर दे तो मैं हमेशा उसका ऋणि रहूंगा ।

धीरज झा



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