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@dawriter

पश्चाताप: अंतरआत्मा की आवाज

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anonymous dawriter by  
Anonymous

बात उन दिनों की है जब मैं ..... कक्षा का विद्यार्थी था। मेरी आयु .... वर्ष की थी। गर्मी काम मौसम था। मैं अपनी परीक्षा दे चुका था। जैसे नयी नवेली दुल्हन अपने पति के इंतजार में घर की चौखट से रास्ते को निहारती है। ठीक वैसे ही मुझे भी अपनी परीक्षा के परिणाम का इंतजार था। छुट्टियों का अधिकतर समय मै दोस्तों के साथ ही बिताता था। हम 6 दोस्त थे, सब आपस में मजे से रहते थे। गर्मी काफी ज्यादा थी, जिस कारण हम दिन के समय घर में ही रहते थे। छुट्टियों का आनंद लेने के लिए हम सब दोस्तों ने जम्मू-कश्मीर जाने की योजना बनाई। सकारात्मक परीक्षा परिणाम की आशा ने हम सभी के मन मे यह विचार उत्पन्न किया कि मां वैष्णो देवी के आशिर्वाद से सब अनुकूल होगा और हम सभी चलने को तैयार हो गए। कठिन कार्य तो अब यह था कि अपने-अपने तरीके से अपने-अपने घरवालों को मनाना, क्योंकि यात्रा बहुत लंबी थी और हम सभी लगभग 17-18 वर्ष के ही थे। किसी तरह घरवालों को मना लिया गया। यात्रा की विधिवत योजना के बाद हमने अपना रेल टिकट बुक करा लिया। अंततः वह दिन आ ही गया जब हमें यात्रा के लिए प्रस्थान करना था। सभी आवश्यक वस्तुओं को सूचीबद्ध कर मैंने अपना बैग तैयार कर लिया। सभी दोस्त एक स्थान पर मिले जो पहले से निश्चित था और तब हम सब एक साथ रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए। स्टेशन पहुंचने के कुछ ही देर बाद घोषणा हुई कि ट्रेन आने वाली है। इंतजार समाप्त हुआ ट्रेन आई और हम सब अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। ट्रेन चले 1-2 घंटे हुए ही थे कि मन मे यह विचार आया कि ट्रेन का सफर लंबा है क्यों न कुछ ऐसा किया जाये जिससे सफर में आनंद मिले। रात के तकरीबन 8 बज रहे थे, कुछ देर बाद हमने यह निर्णय लिया कि अगले स्टेशन पर उतर कर एल्कोहल ले ली जायेगी। कुछ दोस्तों ने इस बात का खंडन करते हुए यह कहा कि धार्मिक स्थल की यात्रा करने जा रहे है और एल्कोहल पीना सही नहीं है। काफी देर हां ना के बाद हम सब तैयार हो गए। मैं पाठकों को बता दूं कि मैं एल्कोहल के पक्ष में था। कुछ समय के बाद ट्रेन रुकी, चेहरे पर मुस्कान आ गई लेकिन ट्रेन स्टेशन पर नहीं स्टेशन से लगभग 200 मीटर पीछे रुकी थी। शायद यह संकेत था कि जो हम लोग करने जा रहे है, वो गलत है। इन संकेतों को नजरअंदाज कर दो दोस्त तुरंत ट्रेन से उतर गये और उनके तेज कदम स्टेशन की ओर बढ़ने लगे। हम सब के चेहरे पर इंतजार था। ट्रेन ने अावाज दी और चल पड़ी। ट्रेन छूटने के डर ने उन्हें दुसरी बोगी में चढ़ा दिया। हम परेशान थे कि वे दोनों अभी तक आये नही, मैंने उन्हें फोन किया तब उन्होंने बताया कि वे दुसरी बोगी में है, दिल को सूकून मिला। फिर वे किसी तरह बोगी बदलते हुए अपनी बोगी में आ गए। दिल और दिमाग के बीच का संघर्ष समाप्त हुआ और हम लोगों ने एल्कोहल लिया। रात का सफर तो आनंद से कट गया। अगले दिन हम जम्मू पहुच गये और अपने दोस्त के घर पर आराम किया। दैनिक कार्य के बाद हम लोगों ने यात्रा प्रारंभ की। हम जम्मू में 5-6 दिन तक रुके और पहाड़ों की सुंदर वादियों का आनंद लिया।

आज वर्तमान में मेरी उम्र 30 वर्ष की है और मै DAWRITER के माध्यम से अपने द्वारा पूर्व में किए गए कार्यों का समाज के समक्ष पश्चाताप कर रहा हूं। मुझे स्वयं पर शर्म आती है कि मैंने ऐसा कार्य किया। भगवान मुझे संकेत देकर रोक रहे थे किंतु मैंने उन संकेतों को नजरअंदाज कर दिया। शायद भगवान आज भी मुझे मेरे उस कार्य की सजा दें रहे है। मैं किसी भी कार्य का आगाज तो करता हूं किंतु वह अंजाम तक नहीं पहुंचता, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता है। मुझे जीवन में सफलता नहीं मिल रही, हर बार वो मुझसे एक कदम आगे रहती है, मैं डाल-डाल रहता हूं वो पात-पात रहती है। मेरा जीवन बोझिल हो गया है, मैं मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहा हूं। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करू? किस ओर जाऊं? किससे कहूं अपने दिल की बात।


मैं गलत हूं या सही? क्या जो मैं सोच रहा हूं वो सही है? क्या वास्तव में मुझे मिल रही असफलता मेरे उस कार्य की सजा है? क्या भगवान भविष्य में मुझे कभी क्षमा करेंगे? इन सवालों के जवाब को मैं पठाकों पर छोड़ता हूं। आप टिप्पणी करें कि सही क्या है।
"भगवान मुझे क्षमा कर देना"।



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