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@dawriter

दूघ का कर्ज

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शहर में आजकल खुशी का मतलब होता है धनीराम के लड्डू । यूं धनीराम तकरीबन बावन सालों से लड्डू बेच रहे हैं लेकिन ये प्रसिद्धि जब से बेटा गल्ले पर बैठने लगा है तब के बाद ही मिली है।

धनीराम आज भी जबतब बेटे को याद दिलाते रहते हैं " देख मेरा तुझे इटली जाकर वो दर्जीगिरी की पढ़ाई न करने देने का फैसला कितना सही था। "
बेटा सुनकर मुस्कुरा देता। एक स्थायी मुस्कान उसके चेहरे पर चिपकी रहती है। जो तब से है जब माँ के मरने के बाद उसने गल्ले पर बैठना शुरू किया। बहुत ही हँसमुख और पॉजिटिव सोच का व्यक्ति। गल्ले पर बैठते ही उसने दो अहम व्यापारिक फैसले लिए पहला धनीराम के लड्डू सिर्फ खुशी के मौके पर ही सप्लाई किये जाएंगे। रईसों के मृत्यु भोजों में नहीं। इससे बिक्री पर कोई खास फर्क तो न पड़ा लेकिन उसके इस सोच की चर्चा बहुत हुई और थोड़े समय में ग्राहकी में जबरदस्त इजाफा हुआ।

दूसरा धनीराम के लड्डुओं पर स्माईली ट्रेडमार्क की तरह चित्रित किया जाने लगा।
शहर में जितने प्रसिद्ध धनीराम के लड्डू थे उससे थोड़ी अधिक ही प्रसिद्धि उनके बेटे की पितृभक्ति थी।

आज धनीराम बंधु बांधवों से घिरे मृत्यु शैय्या पर लेटे थे। युवा पोत्र ने ठिठोली की "दादा अब तो जाने का टाइम आ गया कोई अंतिम इच्छा हो तो बता दो।"
धनीराम ने उसका हाथ पकड़ लिया और बेटे की तरफ नजर घुमाई "नहीं कोई इच्छा शेष नहीं है मेरे बेटे ने मेरी हर इच्छा पूरी की। बस चाहता हूं उसके बाद तुम उस गल्ले पर बैठो और धनीराम के लड्डुओं को दुनिया भर में पहुंचाओ। "
"नहीं ये नहीं बैठेगा गल्ले पर ?", एक तीव्र विरोध का स्वर उभरा ।

धनीराम की आँखें हैरत से फैल गई। नजर मिलते ही उसने नजरें झुका ली आवाज धीमी हो गई " नहीं बाबूजी ये नहीं बैठेगा गल्ले पर, इसको जो करना होगा। ये वही करेगा। आप मेरा जीवन तो बर्बाद कर ही चुके हैं इसको तो बख्श दीजिए। "

उनकी आँखें छलछला उठी "बेटा इतनी तकलीफ थी तो कभी कहा क्यों नहीं ?"
उसकी भी रूलाई फूट पड़ी " माँ ने मरते समय वचन लिया था मुझसे कि जीवन भर आपका ख्याल रखूंगा।"

Image Source: dailydosemd



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