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@dawriter

एग्जाम स्ट्रेस

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nis1985 by  
nis1985

#एग्जाम स्ट्रेस

परीक्षाओं का मौसम आ गया है, सारी बोर्ड और लोकल परीक्षाओं की डेट भी आ चुकी है, ऐसे में विद्यार्थियों पर प्रेशर होना स्वाभाविक सी बात है, एक तो उन्हें क्लास में अव्वल आने की चिंता, बोर्ड परीक्षा में विद्यार्थियों को टॉप करने की चिंता, परीक्षा की तैयारियों के साथ-साथ उनके अनगिनत सपने, महात्वाकांक्षाये, आगे बढ़ने की ललक, अभी से न जाने कितना कुछ सोच रखा है उन्होंने भविष्य के लिए, कि मुझे तो आगे डॉक्टर ही बनना है, या मुझे सी.ए. ही बनना ह, मुझे तो अब जी तोड़ मेहनत करनी ही होगी, तभी इन सपनो के बारे में मैं सोच सकता/सकती हूं!

ह्म्म्म अच्छी बात है सपने देखना, आगे बढ़ने के सपने देखना, कुछ कर गुजरने के सपने देखना, पर दिमाग पर इतना ज्यादा स्ट्रेस लेकर, , , , बाप रे, ऊपर से उनके माता-पिता जो हद से ज्यादा उम्मीद लगाकर बैठ जाते हैं, कि तुम्हे तो इस बार टॉप करना ही है, ये तुम्हारे पिता की इज्जत का सवाल है, या फिर कुछ माता-पिता बच्चे से ये भी उम्मीद कर बैठते है कि देखो हमने तुम्हारी ट्यूशन में कितना ख़र्च किया है, शहर के सबसे बेस्ट और टॉप ट्यूशन क्लास में तुम्हे भेजा है, अब तो सवाल ही नही उठता की तुम टॉप न करो, बेचारा बच्चा परीक्षा की तैयारियों में कम बल्कि उसका आधे से अधिक समय तो ये सब सोचने में ही निकल जाता हैं कि, मुझे तो टॉप करना ही है, पापा का इतना पैसा जो लगा है, या फिर मैने टॉप नही किया तो सब मुझपर हँसेंगे, क्योंकि मैने शहर की टॉप ट्यूशन क्लास जॉइन की थी!

बाप रे! इतना टेंशन , आखिर बच्चे तैयारी करे भी तो कैसे करे, माता-पिता तो बेफिक्र मन ही मन ये सोच रहे कि हमारा बच्चा दिन-रात एक करके पढ़ाई कर रहा है, हमारा नाम जरूर रौशन करेगा, उसे इस कदर प्रेशर में पढ़ता देख वे न जाने खुद को कितना गौरवान्वित महसूस कर रहे है, पर बच्चे के मनोभावों को समझ नही पा रहे हैं, कि बच्चा कितने दबाव में जी रहा है, हा दूसरा पहलू ये भी है कि वे माता -पिता है बेहद प्यार भी करते हैं अपने बच्चे से, पर अभी सिर्फ उसे तैयारियों में डूबा देख रहे हैं, और सोच रहे कि बड़ी मेहनत कर रहा हमारा बच्चा, पर उसकी मनः स्थिति तक वे पहुंच नही पा रहे, या फिर पहुँचना ही नही चाहते, हा वे ये स्वीकार नही करना चाहते बिल्कुल भी, की हमारा बच्चा कमतर हो किसी भी मामले में, उन्हें तो बस एक ही शब्द जो उन्हें पसन्द है

"टॉप"इसके अलावा कुछ दिख ही नही रहा न ही वे देखना चाह रहे!

बच्चा माता-पिता की इन उम्मीदों को पूरा करने की जद्दोजहद में अंदर ही अंदर घुटता चला जाता हैं, कभी अकेले में रोता भी है, कभी उसका सर भारी होकर फटता भी होगा, कि अगर मैं टॉप नही किया या कम नम्बर लाये तो क्या होगा, कैसे मुँह दिखाऊंगा अपने माता-पिता को, सारे दोस्तो को, , बस अब जो समय उसे शांति से परीक्षा की तैयारी में लगानी थी, अब सारा समय उसने सोचने में ही लगा दिया, अब बस वो कल्पनाओं में ही जी रहा है, इतना ज्यादा स्ट्रेस आ गया है उस बच्चे में, कि वो बस खुली आँखों से ही सपने देख रहा है, की उसने तो टॉप कर दिया, सारा स्कूल उस पर गौरवान्वित हो रहा है, और उसके माता-पिता भी अचानक फिर उसका सपना टूटा और वो फिर उदास हो गया, फिर किताबो के पन्ने पलटता, फिर पढ़ाई करता, फिर कल्पनाओं में डूब जाता, कभी हंसता, कभी रोता, कभी कल्पनाओं में खोता, और फिर पढ़ाई में डूब जाता!

क्या इतना प्रेशर सही है विद्यार्थियों के लिए, सभी माता-पिता से मेरी यही अपील है, कि उम्मीदें करे अपने बच्चों से पर किसी प्रकार का दबाव न डाले, ये जो परीक्षा का समय होता हैं न ये विद्यार्थियों के जीवन का बेहद अहम पल होता है, तो अपने सपनो को उनपर लादकर उन्हें दबाव देने के बजाए उन्हें प्रेम, सहानुभूति और हौसला दे, कि तुम कर लोगे, तुमसे हो जाएगा, कोशिश करते रहो, अपना बेस्ट देने की कोशिश करो, फिर जो भी आये कम या ज्यादा कोई बात नही हम तुम्हारे साथ है, देखना फिर वो अपने माता-पिता के ऐसे सहानुभूति, प्रेम और बल देने वाली बातों को सुनकर जरूर अच्छा ही करेगा, उसे उम्मीदों के बंधन में न जकड़े, उसे आजाद छोड़ दे, उसे करने दे खुद से, प्रेशर में तो वो कुछ भी नही कर पायेगा बल्कि दबाव में आकर कही ऐसा न हो कि वो अपनी योग्यता से और भी ज्यादा नीचे आ जाये, तो आप ही सोचिए कि बच्चे टेंशन फ्री होकर पढ़े या किसी प्रकार के दबाव में आकर, या इस बात से डरकर कि अगर वो नही कर पाएंगे बेस्ट, डिप्रेशन में डूब जाएं और कोई बड़ा कदम उठा ले या अपना जीवन खत्म ही कर दे!

परीक्षा के समय बस उन्हें स्वच्छ, शांत, प्रेम और सहानुभूति वाला वातावरण दे, ये बिल्कुल भी जरूरी नही है कि, कम अंक लाने वाला बच्चा योग्य नही होता या कम योग्य होता है, मैंने खुद कई उदाहरण ऐसे देखे हैं, कि टॉप करने वाले बच्चे को अब तक उसकी मंजिल न मिल सकी और वही कम नम्बर लाने वाला बच्चा ऊंचे मुकाम पर पहुच गया है, तो किसी भी बच्चे को कमतर न समझे, और सबसे बड़ी चीज ये कहना चाहूंगी कि, अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से कदापि न करे, कि फलां के बच्चे ने ये कर दिया, या फलां का बच्चा कितना होशियार ह, नही तो बच्चा हीन भावना से ग्रसित हो अवसाद में चला जायेगा, उसे बस एक अच्छा प्रेम से परिपूर्ण माहौल दे!

©निशारावल✍
छत्तीसगढ़

Image Source: indianexpress



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