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@dawriter

Acid Attack ( तेजाब से हमला)

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समाज के चंद दूषित विचार धारा वाले लोगों की कुत्सित कुंठित मानसिकता का परिचायक

प्यार इश्क मुहब्बत आशिकी और पता नहीं ऐसे कितने पर्याय और होंगे इस लफ़्ज़ के.... कहने को तो इंतेहा मुहब्बत करते हैं, और नाकाम रहने पर एसिड अटैक जैसी घिनौनी वारदात को अंजाम देते हैं।

अरे मजनू दाश जी कन्या के भी कुछ अपने मौलिक अधिकार, व्यक्तिगत आकांक्षाएं है। प्रेम तो सत्य और साश्वत है, कुछ समय जिस चेहरे की तुलना चांद से कर रहे थे, अचानक क्या हुआ? कि उसी चांद से चेहरे को तेजाब से जला दिया, कि वो खुद अपना ही अश्क आइने में देखने से डरे।

सिंधु घाटी सभ्यता यहां तो समाज मात्र सत्तात्मक था, इसके बाद वैदिक काल से पुरुष प्रधान समाज का आगाज होता है, और पुरुषवादी मानसिकता ने तो हज़ारों सालों तक महिलाओं का मन मुताबिक इस्तेमाल किया और जब मन भर गया तो किसी बेकार सी वस्तु समझकर अपने जीवन से निकालने के लाखों तरीकों को भी ईजाद कर लिया! हजारों साल के शोषण के बाद 18वीं सदी के आते-आते दूर कहीं दूसरे देशों में महिलाओं की आज़ादी की आवाजें बुलंद होना शुरू हुईं। 19वीं और 20वीं शताब्दी ने महिलाओं के हकों की लड़ाई को और रफ़्तार दी और 21वीं सदी के आते-आते महिलाओं के लिए किताबों और आदालतों में बहुत कुछ बदला पर नहीं बदली तो लाखों साल पुरानी कुंठित सभ्यता की विचारधारा! शायद इस कुंठित सभ्यता ने बहुत सोच-विचार कर महिलाओं पर अत्याचार के लिए तेज़ाब जैसे नवीन तरीके को चुना।

इस समाज के चंद बुद्धजीवियों ने एसिड अटैक पीड़ितों पर लेख लिखकर, टीवी प्रोग्राम करके सिर्फ टीआरपी और स्पोंसरशिप बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया है, क्योंकि अगले दिन फिर एसिड अटैक विक्टिम महिला कहीं अपना इलाज कराने के लिए जूझ रही होती हैं, कहीं कोई महिला एक और एसिड अटैक का शिकार बन रही होती है तो कहीं एसिड हमले का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह रही होती है।

हमारी महान संस्कृति जहां स्त्रियों को देवी स्वरूपा, लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है, वहां इस तरह की घटनाओं का घटित होना वाकई में हमारी महान संस्कृति गौरवपूर्ण सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह अंकित करता है। एक ओर मनुस्मृति जहां "यंत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता:" अर्थात जिस कुल में नारियों कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में देवता निवास करते हैं। इन सबके बावजूद भी स्त्री शोषण, तेजाब से हमला उन पर अत्याचार एक घिनौनी सोच वाले समाज को प्रतिबिंबित करता है।

अब कुछ सरकारी आंकड़ों पर जरा नजर डालते हैं,.....

--NCRB यानी National Crime Records Bureau के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2012 में जहां 85 महिलाएं एसिड अटैक का शिकार हुईं थीं। वर्ष 2013 में आंकड़ा बढ़कर 128 और 2014 में 137 तक पहुंच गया।

- -सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में एसिड की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने की बात भी कही थी लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि आज भी पूरे देश में बिना किसी रोक-टोक के एसिड की बिक्री हो रही है।

- सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि एसिड अटैक की पीड़ित को ना केवल मुफ्त इलाज मिले बल्कि उसे कम से कम 3 लाख रुपए का मुआवज़ा भी दिया जाए।

- एसिड अटैक के मामलों से निपटने के लिए Indian Penal Code में सेक्शन 326A और 326B शामिल किया गया है जिसके तहत कम से कम 10 साल जेल की सज़ा का प्रावधान है जिसे उम्र क़ैद में भी तब्दील किया जा सकता है।

- गृह मंत्रालय एसिड की बिक्री पर नज़र रखने के लिए एक web based application पर भी काम कर रही है।

- आपको ये जानकर हैरानी होगी कि कंबोडिया के बाद एसिड अटैक के मामलों में बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत का नाम आता है।

एसिड अटैक पर न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को अब ऐसे कुछ सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक ट्रेंड सेटर साबित हो साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें एसिड हमलों की शिकार महिला को सभी तरह की सुरक्षा और सुविधाएं सुनिश्चित हो जाएं जैसे कि पीड़िता को मुफ्त इलाज के साथ साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा के लिए 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट फंड' या फिर 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट सोसाइटी' आदि संस्थाओं का गठन भी होना चाहिए ताकि एसिड अटैक की पीड़ित को कहीं से कुछ तो राहत मिल सके।

#stopacidattacks



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