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@dawriter

द ब्यूटीफुल फेस (पहला अंक)

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ujbak by  
ujbak

#द_ब्यूटीफुल_फेस

शीनम ने शीशा देखा और खुद अपने ही चेहरे पर रो पड़ी। पहली बार नहीं था ऐसा जब वह ऐसा करती रोई थी। बाहर से वह सबको दिखाती थी कि वह मजबूत है लेकिन यह आईना निर्दय था, कम्बख्त हमेशा उसकी जिजीविषा को एक झटके में चुनौती दे जाता था, और उसकी मजबूती थर-थर कांप देती थी। किसी पुराने मकान की अधगिरी दीवारें जैसे जलजले की हल्की सी आहट से खुद का अस्तित्व खो देती हैं वैसे ही वह दर्पण उसके लिए जलजला था।

'सुनो शीनम! मैं तुम्हें सच में बहुत चाहता हूँ।' चाय में डूबा बिस्कुट टूट कर चाय में मिल चुका था, लेकिन वह बेख़बर बस सोच रही थी।

गिर जाने के बाद उठना आसान नहीं होता, खासकर तब जब सहारे न हों।

'प्रेम हल्का शब्द नहीं है किसलय! हमारी परिस्थितियों में अंतर है, तुम जानते हो न?' लाइब्रेरी के बाहर उसने इतना ही कहा था। 

'मैं नहीं जानता शीनम! बस मैं यह जानता हूँ कि मेरा प्रेम परिस्थितियों के सामने समर्पण करने वाला नहीं है।' किसलय अवरुद्ध गले से बोलता चला गया।

वह उसे क्या बताती कि वह परित्यक्ता माँ की आखिरी उम्मीद है? वह यह भी कैसे बताती कि उसकी माँ की पीठ अभी भी उस मार से लाल है जो कभी किसी शराबी ने उनकी पीठ पर दिए थे? वह यह भी कैसे बताती कि खुद उसके पिता उसकी माँ को अपने ही मित्रों से संबंध बनाने को कहते थे? बहुत था जो किसी से नहीं कहा जा सकता था।

जहां किसलय का प्रथम चुम्बन हुआ था वह जगह अब संवेदनाविहीन हो चुकी थी। वहाँ के तंत्रिका-तंतु अब स्पर्श का अहसास नहीं देते थे। शीनम के हाथ वहां चले गए। उसका मस्तक अब ज़र्द पड़ चुका था।

'मां, नई बेटी आई है।' 

शीनम के विचारक्रम में व्यवधान पड़ा। नई बेटी का इस घर में आना मतलब, एक और शीनम का बढ़ जाना। इस हॉस्टल में सारे इनमेट्स के चेहरे एक जैसे ही लगते थे। सब के सब जले हुए, बल्कि जला दिए गए, चेहरे। इस हॉस्टल के सारे इनमेट्स एक जैसी ही आत्मा के भी थे। पारदर्शी सफेद-पीले अम्ल की जलन की जीवन भर छपी हुई दर्द वाली आत्माएं। 

इस हॉस्टल में वे लड़कियां थीं, जिनके स्वप्न सिरफिरे आशिक़ों, दारूबाज मनचलों, बेदर्द मनबढ़ों और उन जैसे लोगों ने जला दिए थे और जिनका धुआं उनके भविष्य को काला कर गया था। उन लड़कियों से उनका सौंदर्य, आत्मा सब इन लोगों ने छीन लिया था।

शीनम इन लड़कियों की 'माँ' थी। वह अपने स्वप्नों के जल जाने से लड़ रही थी। वह अपने जैसी और शीनमों के लिए लड़ रही थी।

'चलो!' उसने लड़की से कहा। 

नई लड़की का नाम प्रज्ञा था। वह उपचार के बाद अब ठीक थी। ना, ऐसी दुर्घटना के बाद कोई ठीक तो क्या ही हो सकता है लेकिन यह जरूर था कि अब उसे शारीरिक दर्द नहीं था।

'माँ!' प्रज्ञा ने अपना सारा कष्ट समेकित करते हुए कहा।

'आपके पास आई हूं। बाहर रहना मेरे लिए कष्टकर है। जिन लोगों के बीच मेरे सौंदर्य के चर्चे होते थे अब वे मुझसे डर कर दूर भागते हैं। मेरे स्वप्न मर गए हैं माँ।'

शीनम ने उसे बच्चों सा गले से लगा लिया। 

'किसलय हमारे कितने बच्चे होंगे?' उसने कभी पूछा था और किसलय ने शरारत से कहा था, 'मोहतरमा! आप मौका तो दें, पूरी क्रिकेट टीम खड़ी कर दूंगा।' वह हँस पड़ी थी और उसके गाल किसलय के निहितार्थ से लाल हो गए थे। 'देखो! देखो! कैसे टमाटर उग आए हैं।' किसलय ने उसके शर्म को और कुरेदा था।

लेकिन अब उसके गाल नहीं हैं। वे भी अम्ल में घुल गए, लेकिन शीनम के अंदर बसी 'माँ' का हृदय वह अम्ल भी न जला पाया था।

'रोते नहीं बेटा! देखो हम सब एक ही जैसे हैं। सबके सपने टूट गए हैं, लेकिन जीना तो है न? जब जीना ही है तो खुद को क्यों कोसना?' शीनम ने सांत्वना पता नहीं खुद को दी या प्रज्ञा को?

प्रज्ञा के सर के बाल आधे उड़ गए थे। नाक इस तरह जल गई थी जैसे वहाँ हमेशा से केवल दो छेद ही रहे हों। 

शीनम हर बार नई बेटी के आने के बाद रोती थी।

'बेटा! याद रखना, हम समाज की गंदगी के जीते-जागते प्रमाण हैं, लेकिन हमें गंदा नहीं होना है। हम क्यों शर्माएं? हम क्यों छुप कर बैठें? हमें साबित कुछ नहीं करना, हमें बस अपनी सामान्य जिंदगी जीनी है......और....यही हमारी जीत है।'

सारी इनमेट्स शीनम की बातों से एक बार फिर जोश में आई।

सब जानते थे यह बातें सुनने में अच्छी हैं, लेकिन इन बातों को जी पाना?

आसान नहीं होता।

शीनम खुद भी यह जानती थी।

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'तुम आख़ीर में जीत ही गए न?' किसलय उसके बालों में उंगलियाँ डाल कर उनसे खेल रहा था।

'हूँ?????' शीनम के प्रश्न ने शायद कुछ खलल पैदा की।

'कहाँ खो जाते हो तुम भी?'

'कहीं नहीं... बस सोच रहा था तुम्हारे बाल कितने सुंदर हैं?'

'तुमसे झूठ में तारीफें चाहे जितनी करवा लो, है न?' और वह हँस पड़ी। उसकी दंतपंक्ति झक सफेद थी और होंठ लाल अमरूद की तरह लाल।

'नहीं, सच में तुम बेहद खूबसूरत हो।' किसलय ने कहा था। उसकी आंखें शीनम की सुन्दरता के नशे में डूबी हुई थीं।

'अगर मैं सुंदर न रही तो?' शीनम ने पूछ लिया। घर से चलने से पहले आज उसने कई निर्णय किये थे, मसलन वह किसलय को सब बता देगी, क्योंकि माँ ने कहा था, 'रिश्तों की बुनियाद का सच पर टिका होना बेहद जरूरी है। तुमने जिसका चुनाव किया है वह तुम्हारे बारे में और तुम उसके बारे में सब....सब मतलब सब....जानते हो तो ही बेहतर।'

वह डरी हुई भी थी और जोश में भी। उसके मन को अगर पढ़ा जा सकता तो सहज ही उसमें भविष्य की सुखद कल्पना के चित्र भी आराम से उकेरे हुए मिल जाते।

'तुम! मेरे लिए हमेशा खूबसूरत रहोगी.....हमेशा।' किसलय ने रुमानियत में कहा था।

'नहीं रह पाई मैं सुंदर किसलय।'...विवश शीनम ने एक भारी सा, विषाद की चादर में लिपटा, गर्म उच्छवास बाहर फेंका।

'माँ, प्रज्ञा रो रही है।' किसी बेटी ने शीनम से कहा।

'चलो आती हूँ।'

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क्रमशः

द ब्यूटीफुल फेस(द्वितीय अंक)

द ब्यूटीफुल फेस(तृतीय अंक)

द ब्यूटीफुल फेस (अंतिम अंक)

 #stopacidattacks



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