51
Share




@dawriter

द ब्यूटीफुल फेस(तृतीय अंक)

2 106       
ujbak by  
ujbak

 

 

‘क्या नाम था उसका प्रज्ञा?’ शीनम ने एकांत में उससे पूछा।

‘प्रथम।‘

प्रज्ञा का उत्तर सुन कर शीनम बिना चौंके न रह सकी।

वह दिन उसके जीवन का सबसे खुशनुमा दिन था। माँ इस संबंध को आगे ले जाने के लिये अपनी स्वीकृति दे चुकी थीं। कहीं कुछ कमी नहीं थी। किसलय सब जान भी गया था और उसका प्रेम कहीं न कहीं सब जान कर कुछ बढ़ा ही था। पहले केवल प्रेम था, सब जानने के बाद संवेदना भी जुड़ गई थी।

वे उस दिन झगड़ रहे थे। प्रेम में ऐसे झगड़े प्रेम को बढ़ाते ही हैं।

‘पहला बच्चा अगर बेटा हुआ तो नाम रखेंगे प्रथम।‘ शीनम ने कहा।

‘क्यों?’

‘क्यों का क्या मतलब? पहले का नाम प्रथम नहीं रखेंगे तो द्वितीय रखेंगे?’

‘अरे ये क्या बात हुई? कुछ और रख लेंगे। जैसे राम प्रसाद, राम खेलावन...’ निश्चित ही किसलय शीनम को चिढ़ाना चाहता था। वह जानता था शीनम को ओल्ड-फैशन्ड नाम बिल्कुल पसंद नहीं है।

‘धत।‘

उसका यह धत बोलना, किसलय के सर पर डंडे के वार से उसका एक ओर गिरना और ‘उसका’ शीनम की आंखौं के सामने आना तीनों एक साथ हुआ था।

'वह' शीनम के प्रेम में जुनून की स्थिति तक पहुँच चुका सरफिरा था। नाम शीनम ने कभी पूछा नहीं उसने कभी बताया नहीं। किसलय, शीनम को लेकर काफी सेंसिटिव था। शीनम यह जानती थी कि किसलय का यह स्वभाव एक सामान्य पुरुष की ही तरह है। न जाने वह यह सब सुन कर क्या कर बैठता? शीनम ने किसलय को कभी नहीं बताया कि उसे ऐसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उसने सोचा था कि बार-बार नजरंदाज होकर वह सरफिरा खुद-बखुद ऐसा करना छोड़ देगा।

समस्याएँ सामना करने पर ही समाप्त होती हैं। अगर व्यक्ति उन्हें नजरंदाज करने की सोचता है तो वे अपना आकार बढ़ा कर पहले से भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाती हैं। शीनम नहीं जानती थी कि सभी व्यक्ति एक सी मानसिक अवस्था वाले नहीं होते।

शीनम के जीवन का सबसे खुशनुमा दिन एक झटके में ही सबसे दुसह्य दिन बन गया था। वह दिन उसके सपनों के जल जाने का दिन था।

माँ से शीनम ने फिर कभी किसलय की चर्चा नहीं की। माँ ने अगर चर्चा करनी भी चाही तो शीनम ने वह विषय हमेशा टाल दिया था।

वह नहीं जानती थी कि किसलय आया था। जब वह आखिरी बार मिलने आया था तब वह भी सर पर लगी उस चोट से पूरी तरह उबरा नहीं था। वह यह भी नहीं जानती थी कि वह कुछ पूछने आया था। वह यह भी नहीं जानती थी कि बदली परिस्थिति में वह उन चीजों की दोषी बना दी गई थी जिनपर उसका कोई वश नहीं था। अब किसलय की माँ उसे किसलय के जीवन पर एक प्रश्नचिह्न मानती थीं, वह यह भी नहीं जानती थी। वह नहीं जानती थी कि किसलय के सामने एक चुनाव की चुनौती है। चुनाव भी कैसा? एक असुंदर हो चली प्रेमिका और माँ में से किसी एक को चुनने का सवाल आसान नहीं होता, यह शीनम नहीं जानती थी। इस चुनाव में वह शीनम की सहमति चाहता था। शीनम नहीं जानती थी कि उसकी माँ ने अपने दिल पर हिमालय रख कर किसलय को उसकी माँ को चुनने का लगभग आदेश दिया था।

शीनम ने भी उसकी प्रतीक्षा की। वह देखना चाहती थी कि उसका प्रेम क्या उतना वास्तविक था जितना वह समझती थी? वह किसलय की चर्चा टाल देती थी, ताकि लोग उसके मनोभावों की रत्ती भर भी भनक पाएँ और उसे स्वार्थी समझें। वह भी कितने प्रतिमान झेलती? लोग उसे कहीं न कहीं दोष देते ही थे, जब वे पीठ पीछे कहते थे, 'किसी और के साथ ऐसा क्यों नहीं हो गया?' 

वह यह भी नहीं जानती थी कि जब उसने लड़ने का आखिरी फैसला लेकर उस अवलंबनविहीन शहर को छोड़ दिया था, तब कोई आ कर उस घर के सामने फूट-फूट कर रोया था।

कई वर्ष तक वह बहुत लोगों को ढूंढती रही थी और ईश्वर ने जिसे यह सब सुलझाने के लिये भेजा वह स्वयं अपना न्याय चाहती एक और शीनम ही थी।

‘उसके पिता का नाम बता सकती हो बेटी?’ शीनम ने प्रज्ञा से पूछा। उसके मन में यह चाह जरूर थी, ‘काश! यह सब उससे संबंधित न हो। काश!’

लेकिन शीनम आज भी नहीं जानती थी कि भाग्य निष्ठुर होता है।

‘जी! जानूंगी कैसे नहीं? शहर के सबसे बड़े वकील हैं, उनका नाम सुनते ही सुना है जज लोग भी दंडवत हो जाते हैं।‘

कभी शीनम ने किसलय से उसकी भविष्य की रूपरेखा पूछी थी। तब उसने कहा था, ‘वकालत ऐसा पेशा है, जिसमें न्याय दिलाने की सर्वाधिक शक्ति होती है। मैं गरीबों को न्याय के लिये लड़ते देखता हूँ तब मेरा हृदय रोने को होता है।‘ शीनम समझ गई थी कि किसलय को काला-कोट पहनना पसंद है। वह उसे कभी-कभी ‘काला-कोट’ कह कर चिढ़ाती भी थी।

उसकी प्रार्थना गलत होने की एक और संभावना धराशायी हुई।

‘क्या नाम है उनका?’

‘किसलय मनोहर।‘

शीनम की मुट्ठियाँ अज्ञात की सोच न जाने क्यों भिंच गईं? वे मनोभाव जिनको उसने हमेशा दबा कर रखने का प्रयास किया था आज बेकाबू होकर बाहर आने को मचल रहे थे। वह चीख कर उन मनोभावों को बाहर आने का रास्ता देना चाहती थी, लेकिन वह विवश थी, क्योंकि वह मजबूत महिला मानी जाती थी।

‘तुम्हें न्याय मिलेगा प्रज्ञा। वह न्याय जो तुम चाहती हो।‘ प्रज्ञा ने देखा शीनम के चेहरे पर रोष की रेखाएँ वह पढ़ सकती थी।

शीनम आज रात सो नहीं सकी। अब वह थोड़ी शांत थी। रोष कम हो चुका था। ‘प्रथम! क्यों रखा होगा उसने यह नाम?’

उसने निश्चय किया वह अपने भूतकाल के प्रेम को अपनी कमजोरी नहीं बनने देगी। वह समझना चाहती थी प्रारब्ध के खेल के उस रहस्य को जिसके बीच वह भी फँसी थी।

‘मैं मिलूंगी उससे। क्या वह अब मुझे पहचान भी सकेगा? कैसे पहचानेगा, सभी जले चेहरे एक जैसे ही तो होते हैं?’

शीनम को लगा, जैसी मनः-स्थिति आज उसकी प्रज्ञा को लेकर है, वैसी ही शायद उसकी माँ की भी रही होगी।

‘मुझे मिलना होगा उससे, न्याय के लिये।‘

न जाने कब नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया।

 

(अगला अंक अंतिम होगा।)

द ब्यूटीफुल फेस (पहला अंक)

द ब्यूटीफुल फेस(द्वितीय अंक)

द ब्यूटीफुल फेस (अंतिम अंक)

#stopacidttack



Vote Add to library

COMMENT