50
Share




@dawriter

दंभ और तेज़ाब

1 39       

 

मुबारक हो , मुबारक हो भाई

लड़की हुई है, हाँ, हाँ, लड़की हुई है

उजली, सलोनी, सुंदर लड़की हुई है

माँ ने मुझको नैन भर देखा

पापा ने हजारों मुझपे वारे

छाई थी एक ख़ुशी की मुस्कान हर तरफ

हाँ , हाँ लड़की हुई है।

 

दिन बदले, साल बदले

माँ की छवि निराली थी मुझमे

पापा का गुरुर सजता था मुझपे

हर नज़र, हर नज़र

करती थी मुझसे एक ही सवाल

कहाँ से लायी हो रूप कमाल।

 

मेरे लिए तो मेरा रूप

मेरे माँ पापा की छाया था

पर शायद किसी मदमस्त भवरे को बड़ा भाया था

आया एक दिन वो अपनी ही मस्ती में मदमस्त सा

बोला मुझसे इश्क़ फरमायो ना

मैं भवरा तुम प्रेम रस बरसायो ना।

 

डरी सहमी मैं कहाँ समझती उस प्रेम को

मैं कलि न तैयार थी अभी खुलने को

कर अनदेखा मैं सहज भाव से चल पड़ी

शायद उसे उसने मेरी तड़ी समझ ली

भवरा फिर से आसपास मंडराया

अगले दिन वो फिर से आया।

 

कभी करता वो मिन्नतें हज़ार

कभी करता वो जिस्म पे वार

मैं रोज़-रोज़ रोती थी

शायद इसी से उसकी हिम्मत बढ़ती थी

हिम्मत बड़ी उसकी और

जब किया मैंने उसके दंभ पे वार

वो ले आया तेज़ाब, किया मुझपर पलटवार।

 

हा! हा! हा! उसकी हँसी गूँजी ज़ोर

वो बोला, ‘करले अब अपने हुस्न पर गुरुर और’

मैं रोती, बिलखती, तड़पती रही

आह! हाय!आह! मुँह से निकलती रही

बस जिन्दा थी, पर आत्मा तो मेरी आहत थी

अब तो आईना देखने से भी डरती थी

क्या होती है सुंदरता एक पाप

जो बन गयी वो मेरे लिए श्राप।

 

जो समाज कल तक पुचकारता था

अब वो दुत्कारता, नकारता था

माँ पापा भी अब दिल हारे थे

कभी लगता मैं अब बस एक बोझ हूँ

कभी लगता मैं निर्दोष हूँ

कभी लगता मर जाऊँ

कभी लगता किसी और की करनी की सज़ा मैं क्यूँ पाऊँ।

 

चेहरा तो अब बिगड़ चुका है

खोने को बस अब हौसला बचा है

क्या करूँ भिड़ जाऊँ?

क्यूँ न इस समाज को भी आईना दिखाऊं

कैसे करता है वो एक निर्दोष पे अत्याचार

करता आया वो सदा ही पाप को माफ़।

 

बस! अब और नहीं, अब और नहीं

ज़ुल्म को सहना अब और नहीं

अब फिर बनेगा एक चेहरा पहचान

हज़ारों दाग, फिर भी बेदाग़

अब फिर होगा किसी के दंभ पर वार

अब मैं फेकूँगी स्वाभिमान का तेज़ाब

बस! अब और नहीं, अब और नही।।

#stopacidattack



Vote Add to library

COMMENT