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@dawriter

क्या इतना ही था प्यार ? (कहानी)

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dhirajjha123 by  
Dhiraj Jha

"मैम जी सुनिए तो, इतना भी क्या गुस्सा जी। एक बार बात तो सुन लो।" निलिमा ने बीस से ज़्यादा बार इस आवाज़ को सुना होगा। हर बार वो इतना सुनते काट देती और उधर से हर बार नए नंबर से फोन आ जाता। हालांकि उस अंजान शख़्स के इतना तंग करने के बाद भी निलिमा के चेहरे पर कोई चिंता का भाव नहीं दिख रहा था। वो हर बार बिना बोले फोन काट कर अपने काम में लग जाया करती। उसके साथ कौन सा यह पहली बार हो रहा था। सब जानते थे इस शहर में अकेली रहती है, ना ये किसी के यहाँ जाती है ना कोई इसके यहाँ आता है। इसीलिए सब अपनी बपौती समझ कर चांस मार लेते थे। ऑफिशियल नंबर था चेंज भी नहीं कर सकती थी। इसीलिए ज़्यादा ध्यान ही नहीं देती इन सब पर।

मगर इस बेशर्म ने हद कर दी थी। इतना तंग किसी ने नहीं किया था। मगर निलिमा को फर्क नहीं पड़ता था। वो तो जैसे भूत थी। किसी से फालतू बातचीत नहीं, किसी के यहाँ आना जाना नहीं। वो तो शायद खुद से बात करना भी भूल गयी थी। चार साल हो खये थे मुंबई आये। उसके बाद से बस यहीं है।

"मैडम जी इतना भी क्या भाव खाना।" ये वही था।
नीलिमा फिर से फोन रखने ही वाली थी कि तब तक वो आगे बोल पड़ा "देखो फोन मत काटना। मुझे ज़रूरी बात करनी है।"
नीलिमा ने बिना कुछ बोले फोन कान पर लगा लिया। वो बोलता रहा "देखो मेरा इरादा आपको तंग करने का नहीं है। मैं आपकी ही बिल्डिंग में रहता हूँ। मुझे आप बहुत अच्छी लगती हैं। आपसे बस दोस्ती करना चाहता हूँ ।"

नीलिमा उसकी बात सुन कर दंग नही हुई बस मुस्कुराई मगर इस मुस्कुराहट में ज़हर भरा हुआ था। शायद यह ज़हर दोस्ती नाम सुन कर उभर आया था उसके होंठों पर। नीलिमा ने चुप्पी तोड़ी "दोस्ती या और कुछ भी।"

"हाँ बहुत कुछ, असल में प्यार करता हूँ आपको।" उसकी आवाज़ से ही लग रहा था कि वह मन ही मन अपनी विजय पर इतरा रहा है। जैसे कह रहा हो कि "बड़ा भाव खा रही थी, अब आगयी ना लाईन पर।

"कितना प्यार करते हो ?" नीलिमा ने बात को खींचते हुए पूछा ।

"बहुत ज़्यादा, जान से भी ज़्यादा।" उधर से वो खुशी से फूला नहीं समा रहा था। खुश भी क्यों ना होता भला, मुंबई में रह कर भी भरे पूरे कपड़े पहनने वाली, किसी से एक टुक बात ना करने वाली लड़की ऐसी निकलेगी कौन जानता था। हाँ नीलिमा अब 'ऐसी' लड़की ही थी क्योंकि उसने इस बंदे से बात कर ली थी।

"ठीक है तो आज रात दस के बाद मेरे फ्लैट पर आ जाओ। तभी तय होगा कि कितना प्यार है तुम्हें।" नीलिमा ने इतना कह कर फोन काट दिया और इस तरह से फिर अपनी फाईलों के बीच खो गयी जैसे कुछ हुआ ही नहीं, जैसे घंटों से वो ऐसे ही बैठी थी।

इधर वो अजनबी यह सोच सोच कर खुश होने लगा कि ये तो सच में वैसी ही निकली। आज रात पूरी मौज लूटी जाएगी। घड़ी के कांटे भागने लगे, अजनबी अपने ख़यालों में खोने लगा। साढ़े नौ बज गये थे। अजनबी अपने आप को पूरी तरह तैयार कर चुका था।

दस बजने वाले थे

"मैं एक पार्टी में जा रहा हूँ। तुम और नमन खाना खा कर सो जाना।" संजय साहेब (काॅलोनी के वाॅईस सेक्रेटरी, पेशे से वकील) इतना कह कर अपने फलैट से निकले और लिफ्ट में सवार हो गये। संजय साहेब को बाहर पार्टी में जाना था मगर लिफ्ट नीचे जाने की बजाए ऊपर जाने लगी और रूकी दसवें माले पर। गायकवाड को पता था यहाँ बस दो फ्लैट में ही लोग रहते हैं। एक में वो पारसी अंकल आंटी जो नौ बजे ही सो जाते हैं और दूसरी नीलिमा। इसीलिए संजय बेधड़क नीलिमा के फ्लैट की तरफ बढ़ा। शायद यही था वो अजनबी आदमी।

नीलिमा के फ्लैट की बैल बजी। अंदर से नीलिमा दरवाज़ा खोला। संजय को देखते ही बोली "तुम तो सच में आ गये।"

संजय थोड़ा घबराया "तुमको मालूम था कि मैं हूँ।"

"आवाज़ से ही बू पहचान लेती हूँ सैक्रेटरी साहेब। पहली बार में ही पहचान गयी थी मगर सोचा शायद आप अपने बीवी बच्चे का ख़याल कर के भूल जाएं ये सब।" नीलिमा दरवाज़ा खोल कर अंदर आ गयी और संजय उसके पीछे पीछे।

"तुम हो ही इतनी सुंदर कि हमको प्यार हो गया। अब प्यार हो गया तो भला मैं क्या करता।" बेशर्मी से लबालब भरी मुस्कान बिखेरते हुए संजय बोला।

"अच्छा, इतनी पसंद हूँ मैं तुमको? इतना प्यार करते हो?" नीलिमा ने फ्रिज से एक बियर उसे पकड़ाते हुए कहा।

"पहिले दिन से ही मैडम। और प्यार तो इतना कि पूछो मत।" संजय एक घूंट भरता हुआ बोला।

कुछ देर संजय से बात करते करते जब नीलिमा ने यह जान लिया कि वह पूरी दो बोतलें खाली कर चुका है और उसे अब नशा होने लगा है तब नीलिमा ने कहा "तब क्या इरादा है।"

नीलिमा के इतना कहते ही संजय के अंदर का वहशी जाग गया। संजय ने उसे बाहों में भरते हुए कहा "अब तो बस सब कुछ तुम्हारा है जान।"

नीलिमा मुस्कुराई और संजय को सोफे पर धक्का देते हुए अपने कपड़े उतारने लगी। संजय सोफे पर बैठा खुद को तैयार करने लगा। नीलिमा अपने सारे कपड़े उतार चुकी थी और संजय के सामने निवस्त्र खड़ी थी। उसे निवस्त्र देख संजय को उत्तेजित हो जाना चाहिए था मगर ये क्या संजय बार बार अपनी आँखें मल रहा था। उसे लग रहा था जैसे नीलिमा की छातियों से नीचे तक का माँस सुकुड़ कर हड्डियों को चिपका हुआ था। जैसे वो बुरी तरह जल गया हो।

"क्या हुआ संजय? आओ ना, प्यार करते हो ना मुझे तो आओ ना मुझे गले से लगाओ मुझे चूमो।" नीलिमा धीरे धीरे संजय के पास जा रही थी और संजय अपने आप में सुकुड़ता जा रहा था जैसे उस से बच रहा हो। नीलिमा जैसे ही संजय के एकदम करीब आई संजय ने वहीं उल्टी कर दी।

नीलिमा ज़ोर ज़ोर से हंस पड़ी "संजय मेरी जान, देखो कैसे तुम्हारा प्यार उल्टी बन कर बह रहा है। संजय मैं तो बहुत सुंदर थी, पहले दिन से ही तुम मुझे चाहते थे ना। अब क्या हुआ।"

"मैडम गलती हो गयी, जाने दो मेरे को, मैं नहीं जानता था आप ऐसी !!!!

"क्या ऐसी, तुम नहीं जानते थे ना कि मेरी जिन उभरी छातियों से तुम्हें प्यार हुआ था उन पर का माँस तुम जैसे किसी दरिंदे ने ऐसिड डाल कर झुलसा दिया है । तुम नहीं जानते थे ना कि मेरी जिस बार्डी पार्ट में तुम्हारा सारा प्रेम समाया था वो भी तेजाब से झुलसी हुई है। उस दरिंदे ने बहुत शराब पी थी जैसे तुमने आज पी है इससे भी ज़्यादा मुझ पर ऐसिड डालते वक्त उसका निशाना चूक गया और मेरी शक्ल के बदले मेरी देह सारी देह जल गयी। शक्ल जलाई होती तो तुम जान जाते ना, फिर तुमें मुझसे प्यार भी नहीं होता ना।" नीलिमा की आँखों से दर्द बहने लगा और उसकी आवाज़ चीख़ में बदल गयी। ऐसी दर्द से भरी चीख़ मानों पाँच साल पहले जिस्म पर पड़ी तेज़ाब की एक एक बूंद का दर्द हरा हो खया हो।

"मैडम माफ कर दो मेरे को मेरे से गलती हो गया।" संजय रोता हुआ बोला।

"जाओ यहाँ से और याद रखना कि तुम्हारी बीवी है घर पर उसे प्यार दोगे तो परिवार सुखी रहेगा। बाक़ी जगह प्यार बस यहीं तक है। और हाँ उन सबको बताना जो मुझे फोन करते हैं कि नीलिमा की छाती से नीचे तक सब जला है। उसे फोन ना करो कुछ ना मिलेगा।" संजय वहाँ से मुंह छुपाता हुआ भागा। नीलिमा वहीं सोफे के पास घुटनों में सर दे कर बेतहाशा रोने लगी। अच्छा हुआ वो रो रही थी अगर ना रोती तो दिमाग फट जाता। पाँच वर्षों से बस दर्द संजोया था आज वो सारा दर्द इन आँसुओं ने निकाल दिया था। एक दरिंदे की दरिंदगी से लेकर एक ही दुर्घटना से जाने अंजाने माँ बाप पर बोझ बन जाने तक का सारा दर्द बह गया था। नीलिमा अब अपने आप से मिलने के लिए तैयार थी।

धीरज झा

#stopacidattacks

Image Source: wunrn



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