Nidhi Bansal

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नहीं मुझे यह शहर चाहियें

मै गाँव में पली बढी हूँ और पिछले 11सालों से शहर में अपना घर बना कर रह रही हूँ। किन्तु गाँव और शहर के परिवेश मे बहुत फर्क महसूस करती हूँ। बस इन्ही भावनाओं को वयक्त करने की कोशिश है।जरूरी नहीं की सभी मेरे विचारों से सहमत हों।

काश ऐसा होता

थक गई हूँ मै खुद की खोज में,मै खुद से खुद मिल जाती काश ऐसा होता

लाज़मी है

दिल की हर बात कहूं तुमसे ये लाज़मी है।खुशी मे तेरी मै भी खुश रहूं ये लाज़मी है।।

माँ

माँ की ममता उस का प्यार,कोई समझे कैसे उसको,माँ की महिमा है अपार

नारी

अधूरी अभिलाषाओ और अनजानी जिम्मेदारी में उलझी एक नारी का अपनी नई पहचान बनाने की कोशिश

रिश्ते

आज रिश्तो की मर्यादा ,परिभाषा बदल गई है आज हमे अपननो पर नही यकीन क्योकि आशा बदल गई है।

खामोशियों को बोलने दो

कभी कभी शब्दो से अधिक खामोशियाँ असर करती हैं।

मेरे शब्द

शब्द है गीतो की माला ,जो मन को बहकाते है। कभी चुभते नश्तर सरीखे, कभी मनभावन बन बन जाते है।।

पिंजरे का पंछी

अपनी जिंदगी को मनुष्य बाहरी चकाचौंध पाने इच्छाओं मे कैद कर लेता है।

बसेरा मेरा

अनाथ उपेक्षित बचपन जो अपना दिन रात सड़को पर बिताने को मजूर है। उनके जीवन का सच हम नहीं महसूस कर सकते।

बेचारा बचपन

सड़क पर घूमता, जैसे तैसे अपनी भूख मिटाता बचपन।

कोशिश

मझधार मे थक कर बैठे तो नैया पार कहाँ होगी कोशिश करते जाओ गर कभी हार नही होगी

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