Kumar Gourav

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रामरस

गरीब के पेट पर लात पड़ती है तो सांप की तरफ फुंफकारता है गजोधर भी फुंफकारे। लेकिन ढ़ोरबा सांप से कौन डरता है । कुछ ही देर में कुचाकर चोखा बन गए ।

कप्तान/कोच

कुछ ही समय बाद वो फिर से मैदान पर था अबकि बार कोच की भूमिका में।

टूटे रिश्ते

कुछ लोगों की आदत होती है अक्सर टूटी हुई चीज़ों को ढोते जाते हैं। कुछ लोग उससे दूर भागते हैं

रोटी पानी

सुबह सुबह गेट खटखटाने की आवाज से नींद खुली। देखा तो एक सात आठ साल का बच्चा था । "भैया रोटी दे दो "

नशा

नहीं और नहीं पीना और हम तो कहेंगे तुम भी मत पियो , शराब कोई बढ़िया चीज थोड़े है ।

ललक

नाक सिकोड़ते हुए बोली "ठीक है कल से कापी पेंसिल लेकर आ जाना। " बड़े ने प्रतिवाद किया "उसमें बहुत खर्चा है ऐसे ही आप जो बोर्ड पर लिखेंगी वही पढ़ लेगा। ज्यादा नहीं पढ़ना है हिसाब बाड़ी लायक पढ़ जाए बस। "

व्यापार वर्धक यंत्र

इस बरसात में लकड़ियों के खरीदार मिल रहे हैं । पहले तो मुझे लग रहा था श्मशानघाट पर दुकान खोलकर गलती कर दी। लेकिन भला हो उन पंडितजी का अब तो धंधा चौचक हो रहा है पिछले दो घंटे में बारिश के बावजूद लोग घाट की दुकानें छोड़कर मेरे पास आ रहे हैं । "

क्रियाकर्म

एकमुश्त इतनी मौतें प्रशासन की परेशानी की वजह न बन जाए इसलिए रातों रात उन्हें बोरी में भर प्रशासन ने स्टीमर से दूसरी तरफ चोरगांव में फिंकवा दिया और वहाँ के मुखिया को कुछ पैसे देते हुए कहा इन लाशों को चुपचाप ठिकाने लगा दो और मुँह खोला तो गाँव में कोई न बचेगा ।

दधीचि

जमाने से उलट बेटी को कान्वेंट में डाला और बेटे को सरकारी स्कूल में। पत्नी ने आपत्ति की तो उसको समझाया दोनों कान्वेंट में पढ़े इतनी हमारी हैसियत नहीं है और बेटे का क्या है नहीं भी पढ़ेगा तो मजदूरी करके जी लेगा। बेटी जात है समय को देखते हुए उसका पढ़ा लिखा होना जरुरी है।

इश्तहार

इश्तहार तीन दिन से लगातार हो रही बूंदाबांदी से बाजार में कीचड़ ही कीचड़ हो रहा है ग्राहकी तो दूर रहवासी भी दरवाजा खोलकर नहीं झांकते। ऐसे माहौल में ग्राहक का आना किसी देवदर्शन से कम सुख नहीं देता । लेकिन आनेवाले ग्राहक को देखकर बाई एकदम से ठस्स हो गई

डाकटिकट

डाकटिकट शाम की सैर से जब लौटा तो दरवाजे पर कुछ रंगीन लिफाफे रखे थे । उठाकर देखा तो लगभग सभी मेरे द्वारा ही भेजे गए थे । वैसे ही बंद थे जैसे मैंने किया था । हां एक गुलाबी लिफाफा जो कदरन नया था वो मेरे पते पर भेजा गया था ।

तर्पण

वो दौड़कर कटोरी में गंगाजल ले आई । बटेसर सर पर हाथ धड़े वहीं बैठे रहे । भौजाई सुरक्षित दूरी से दुआरी पर खड़े होकर रमेसर से इहलोक से प्रस्थान का आग्रह कर रही थी और वीर रस की कविताओं से दलन के इस कंटक को मिटा डालने का आवाहन ।

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  • Male
  • 01/03/89

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