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सुकून की तलाश

कैसे पकंज को अपनों से अलग होते ही संसार की वास्तविकता समझ आई, और अपनी भूल का एहसास हुआ।

बने ना तुमसे रोटी गोल..

एक लड़की का परीक्षण एक गोल रोटी से ही क्यों..

भद्र पुरुष

कैसे माधुरी दुविधा में फंसी हुई थी,मन में उथलपुथल और बहुत गुस्सा था,समझ नहीं पा रही थी,क्या करे।

हाय रे मोटापा..

मोटापा भोली भाली लक्ष्मी के लिए दुश्मन हो गया था,सब उसके लिए संवेदनहीन हो गए थे,जैसे।

मन की सैर

चलो कुछ पल सुकून के जी लेते है,वक्त से वक्त चुरा लेते है।कुछ दूर क्षितिज तक जाकर आते है,कुछ खुशबुएँ चुराकर लाते है।

सुभागी बस नाम की..

चक्कर घिन्नी की तरह दिनभर घूमती रहती सुभागी,फिर भी कुछ ठीक से ना कर पाती,वैसे भी अभी उम्र ही क्या थी,उसकी..

कैसी भूल..

अपनी शिक्षा के सहज सम्मान की इच्छा लिए शिक्षा सपनों की ससुराल के ख्बाब देख रही थी

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